सिंहामऊ · परगना महोना · जनपद लखनऊप्रथम संस्करण
आत्मजीवनी · An autobiography

दादू वाणी

The handwritten life of Thakur Arjun Singh, written in his ninety-seventh year

लेखक · Author
ठाकुर अर्जुन सिंह
1907 – 2005
लिखा गया · Written
6–18 September 2004
जन्माष्टमी से
किसके लिए · Written for
रज्जू — Dr. Raj Bhanu Singh
and every generation after
मूल · The manuscript
४१ handwritten pages
Devanagari, blue ink, ruled paper
दादू वाणीप्रस्तावना

प्रस्तावनाForeword

यह मेरे लिए अत्यंत गर्व और भावुकता का क्षण है कि मैं हमारे श्रद्धेय दादू बाबा — ठाकुर अर्जुन सिंह जी — द्वारा हस्तलिखित अनमोल संस्मरण दादू वाणी को आप सभी के समक्ष एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

पारिवारिक वंशावली के संदर्भ में, दादू बाबा ठाकुर भारत सिंह जी के छोटे भाई थे, और ठाकुर महेश्वर सिंह व ठाकुर गनपत सिंह के बड़े भाई थे।

यह पत्र उन्होंने रज्जू बाबा (डॉ॰ राज भानु सिंह) के अनुरोध पर लिखा था। इसका उद्देश्य केवल एक कहानी सुनाना नहीं था, बल्कि हमारी पारिवारिक वंशावली, हमारे गौरवशाली इतिहास और उन अथक संघर्षों व कठिन परिस्थितियों को हमेशा के लिए लिपिबद्ध करना था, जिनसे गुज़रकर हमारे पूर्वजों ने इस परिवार को आज इस मुक़ाम पर पहुँचाया है। दादू बाबा चाहते थे कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों को जानें और समझें, और हमेशा साथ मिल-जुलकर रहें।

दादू बाबा की इसी दूरदर्शी सोच को साकार करने के लिए मैंने आधुनिक तकनीक की मदद ली है। उनके मूल हस्तलिखित पन्नों को डिजिटल रूप देकर इस पुस्तक का आकार दिया गया है, ताकि परिवार का हर सदस्य — विशेषकर हमारी नई और युवा पीढ़ी — इसे बहुत ही आसानी से पढ़ सके और अपनी विरासत से जुड़ सके।

मुझे पूरी उम्मीद है कि दादू बाबा के ये शब्द, उनके जीवन के अनुभव और उनका संघर्ष हमारे पूरे परिवार के लिए एक अमूल्य धरोहर और मार्गदर्शक साबित होंगे। आइए, हम सब मिलकर अपने पूर्वजों के इस त्याग और उनकी जड़ों को नमन करें।

विनीत,
विक्रम सिंह परमार पुत्र — श्री विमल प्रकाश सिंह  ·  पौत्र — ठाकुर वीर भद्र सिंह
दादू वाणीइस संस्करण के बारे में

इस संस्करण के बारे मेंAbout this edition

The forty-one pages of this manuscript were photographed, then read at high magnification in overlapping strips. Nothing here was smoothed over, and nothing was invented.

Two books, one voice. The Hindi and the English are kept as separate books rather than run side by side, so that the story holds its line. Choose one at the door, or from the bar above; the print edition binds both together, Book One in Hindi and Book Two in English.

Two kinds of gap, treated differently. Where the meaning of a broken sentence is unmistakable, the missing connective words have been restored so that the story runs — and every such restoration is marked. Where a fact was lost — a name, a village, a number, a date — nothing has been supplied at all.

तब गाँव में एक भाई पानी पिलाने का फ़र्ज़ करता था

That is a marked bridge. Turn सम्पादित अंश off in the bar above and the marks vanish, leaving clean reading text; turn it on to check exactly what was supplied. There are 429 of them in Part One.

Part Two is the control. It is the raw transcript, untouched, with every unreadable word marked where it falls — 1,836 of them. Read it beside Part Three and correct what you recognise. The family can close many of those gaps, because the family knows the names.

४१पृष्ठ · Pages
१२अध्याय · Chapters
७८टिप्पणियाँ · Notes
१८३६चिह्नित अंतराल · Marked gaps
दादू वाणीनाम

घर के नामThe names of the house

He writes as one writes to family — by the name the house used. Each of those names is set here against the name on the record, so that no one two generations from now has to guess who is who. In the story itself, the first time a name appears in a chapter it carries the full form.

भइया · Bhaiya
ठा॰ भारत सिंह · Th. Bharat Singh 1899–1991
लेखक के बड़े भाई · the author's elder brother
लहान · Lahan / लल्लन · Lallan
डॉ॰ जन्मजय सिंह · Dr. Janmajai Singh 1938–2012
लेखक के इकलौते पुत्र · the author's only son
रज्जू · Rajju
डॉ॰ राज भानु सिंह · Dr. Raj Bhanu Singh – 2025
गनपत सिंह के पुत्र; यह पत्र इन्हीं के लिए लिखा गया · Ganpat Singh's son, for whom this letter was written
मुन्नू · Munnu
विजय भानु सिंह · Vijay Bhanu Singh
रज्जू के छोटे भाई · Rajju's younger brother
रामू · Ramu
ठा॰ शील भद्र सिंह · Th. Sheel Bhadra Singh 1941 –
भारत सिंह के पुत्र; गाँव पर एम॰ए॰ शोध-प्रबन्ध के लेखक · Bharat Singh's son, who wrote the MA thesis on the village
मिचू · Michu / मिट्टू · Mittu
ठा॰ मृत्युंजय सिंह · Th. Mritunjay Singh
महेश्वर सिंह के पुत्र, धनंजय के भाई · Maheshwar Singh's son, Dhananjay's brother
धनंजय · Dhananjay
डॉ॰ धनंजय सिंह · Dr. Dhananjai Singh 1944 –
महेश्वर सिंह के पुत्र; अंतिम पृष्ठों की केन्द्रीय आकृति · Maheshwar Singh's son, the central figure of the closing pages
दादा · Dada
ठा॰ गुरुबख्श सिंह · Th. Gurubaksh Singh
लेखक के पिता — अवध में 'दादा' पिता को कहते हैं, पितामह को नहीं · the author's father; in Awadh 'Dada' means father, not grandfather
विमल · Vimal
श्री विमल प्रकाश सिंह · Shri Vimal Prakash Singh
वीर भद्र सिंह के पुत्र; मण्डी परिषद में सेवा, और भारत सदन का निर्माण इन्हीं ने आरम्भ कराया · Veer Bhadra Singh's son; served in the Mandi Parishad, and it was he who began the building of Bharat Sadan
महेश्वर · Maheshwar
ठा॰ महेश्वर सिंह · Th. Maheshwar Singh 1910 –
लेखक के छोटे भाई; धनंजय और मृत्युंजय के पिता · the author's younger brother; father of Dhananjay and Mritunjay
गणपति · Ganpati
ठा॰ गनपत सिंह · Th. Ganpat Singh
लेखक के सबसे छोटे भाई; रज्जू और मुन्नू के पिता · the author's youngest brother; father of Rajju and Munnu
पत्नी — नाम कभी नहीं लिखा · "my wife", never named
धर्मा सिंह · Dharma Singh – 1939
पूरी पांडुलिपि में लेखक उनका नाम एक बार भी नहीं लिखते; वंशावली से मिला · he never once writes her name in forty-one pages; the family tree supplies it
धनंजय की पत्नी · Dhananjay's wife
सत्यभामा सिंह · Satya Bhama Singh
जिनके लिए लेखक ने लिखा कि उन्होंने सेवा की पराकाष्ठा कर दी · of whom he writes that she carried that care to its furthest point
तुम्हारी माता · "your mother"
रंजना सिंह · Ranjana Singh
गनपत सिंह की पत्नी; रज्जू और मुन्नू की माता · Ganpat Singh's wife, and mother to Rajju and Munnu
तुम्हारे बप्पा · "your father"
ठा॰ गनपत सिंह · Th. Ganpat Singh
पत्र रज्जू को सम्बोधित है, इसलिए 'तुम्हारे' सदा रज्जू के सापेक्ष हैं · the letter is addressed to Rajju, so every "your" is measured from him
चन्द्रभाल · Chandrabhal
ठा॰ चन्द्रभाल सिंह · Th. Chandrabhal Singh
जिनसे रामू ने अपने शोध-प्रबन्ध की वंशावली प्राप्त की · from whom Ramu took the genealogy set down in his thesis

बंटी, गुड़िया और अन्य जीवित सदस्यों के नाम जानबूझकर नहीं दिये गये।
Banti, Gudiya and other living members are deliberately left as he wrote them.

दादू वाणीअनुक्रम
भाग एक · Part One

कथाThe Story — contents

दादू वाणीपत्र
अध्याय १ / १२Chapter 1 of 12

पत्र

The Letter
पृष्ठ १–३ · जन्माष्टमी, ६ सितम्बर २००४
ॐ श्री गणेशाय नमः। आत्मजीवनी। अर्जुन सिंह, सेवानिवृत्त तहसीलदार, आत्मज ठा॰ गुरुबख्श सिंह। निवास ग्राम व पोस्ट सिंहामऊ, थाना इटौंजा, जनपद लखनऊ। जन्म ११ अप्रैल १९०७। आज १८ सितम्बर २००४ तक जीवित — अवस्था छियानवे वर्ष साढ़े पाँच मास।
Om, salutations to Shri Ganesha. An autobiography. Arjun Singh, retired Tehsildar, son of Thakur Gurubaksh Singh. Resident of village and post office Singhamau, police station Itaunja, district Lucknow. Born 11 April 1907. Living still, this 18 September 2004 — aged ninety-six years and five and a half months.
प्रिय रज्जू (डॉ॰ राज भानु सिंह), तुम्हारा पत्र पढ़ा। वह तो इतनी जानकारी चाहता है जो अधिक समय लेगी। मैं कुछ अपनी बाबत लिखूँ, फिर जानकारी अपने पुरखों की भी दे दूँ।
Dear Rajju (Dr. Raj Bhanu Singh), I have read your letter. You are asking for so much that it will take a good while. Let me write something of myself first, and then give you what I know of our forefathers.
पंवार लोग यहाँ कैसे आये, पहले उसकी बाबत उल्लेख करता हूँ। मेरी जानकारी के अनुसार विक्रम सम्वत जो अब चलता है वह राजा विक्रमादित्य के नाम से है — उनके बारे में पहले लिखूँ, तब अपनी निजी जीवनी और ननिहाल की बाबत लिखूँ।
How the Panwar people came to be here — let me set that down first. As I understand it, the Vikram Samvat calendar we still keep runs in the name of Raja Vikramaditya. Let me write of him first, and then come to my own life and my mother's family.
दादू वाणीधारानगरी से सिंहामऊ
अध्याय २ / १२Chapter 2 of 12

धारानगरी से सिंहामऊ

From Dhar Nagari to Singhamau
पृष्ठ १–२ · ७ सितम्बर २००४
राजा भर्तृहरि और विक्रमादित्य दो सगे भाई थे। भर्तृहरि बड़े थे, राजगद्दी पर बैठे, और छोटे को गुज़ारे के लिए हिस्सा मिला। भर्तृहरि काफ़ी संस्कृतज्ञ थे — राजकाज के साथ लेखन का कार्य भी करते थे, जैसी पुरातन क्षत्रिय राजाओं की परम्परा थी। उत्तराधिकार तो राजाओं का पुराना है, मगर गुज़ारे में छोटे को जागीर देने की प्रथा बाद में जारी हुई।
Raja Bhartrihari and Vikramaditya were brothers of the same blood. Bhartrihari, the elder, took the throne; the younger was given a portion to live on. Bhartrihari was a considerable Sanskritist — alongside the business of the state he also wrote, as was the old tradition of Kshatriya kings. Succession among kings is ancient enough; but the custom of giving the younger brother a jagir to live on came in later.
उनकी पत्नी बहुत रूपवती थी और वह उसके प्रेम में ही मग्न रहते थे। मगर पुरानी एक कहावत — स्त्रियाचरितं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः — इन दोनों पर घटित होती है।
His queen was very beautiful and he remained wholly absorbed in his love for her. But there is an old saying — the character of a woman and the fortune of a man, not even the gods know these, so how shall a man? — and it came to pass upon them both.
पत्नी का चालचलन ठीक न था; उसका प्रेमी घुड़साल का मुखिया था, और वह प्रेमी रानी के साथ-साथ एक वेश्या से भी प्रेम करता था। एक महात्मा विचरते हुए आये और उस वेश्या के कारण उनका ब्रह्मचर्य भंग हो गयालेन-देन की बात आई तो देने को उनके पास मुद्राएँ न थीं, सो उन्होंने एक अमृतफल दे दिया — कहा, इसे खाकर तुम अमर हो जाओगी।
The queen's conduct was not what it should have been; her lover was the head of the royal stables, and that same man loved a courtesan besides. A wandering ascetic came that way and through her his celibacy was broken. When it came to the question of payment he had no coin to give, so he gave her a fruit of immortality — eat this, he said, and you will never die.
उसने सोचा — मेरा पेशा बहुत ख़राब है, मेरा अमर होना ठीक नहीं; हमारे राजा अच्छे प्रजापालक हैं, उन्हें दे दूँ तो अच्छा होगा। वह दरबार में गई और फल राजा को दे आई।
She thought: my trade is a poor one, it is not right that I should live forever; our king is a good protector of his people, better that he should have it. She went to the court and gave the fruit to the king.
राजा ने वह फल रानी को दिया, रानी ने घुड़साल के इंचार्ज को, और अंत में वह फिर उसी वेश्या के पास पहुँचा — और वह उसे दोबारा राजा को दे आई। इसी बीच छोटे भाई विक्रमादित्य को भाभी के चरित्र की जानकारी मिली और उन्होंने बड़े भाई को बताया। पोल खुलने पर उल्टी तोहमत विक्रमादित्य पर लगाई गई — कि वही रानी से प्रेम करना चाहते हैं, और यह फल आदि की बात मनगढ़ंत है। राजा ने विक्रमादित्य को देश-निकाला दे दिया।
The king gave the fruit to his queen; the queen gave it to the master of the stables; and in the end it came round again to the same courtesan — who brought it back a second time to the king. In the meantime the younger brother Vikramaditya had learned of his sister-in-law's conduct and had told the elder. When the thing was exposed, the accusation was turned upon Vikramaditya instead — that it was he who had wanted the queen, and that this business of the fruit was all invention. The king banished his brother from the kingdom.
दोबारा फल पहुँचने पर भर्तृहरि को सब जानकारी हुई और छोटे भाई का देश-निकाला अनुचित पाया गया। राजा अन्तःपुर में गये ही नहीं — दरबार से ही होकर वन को चले गये, और मंत्रियों से कह गये कि विक्रमादित्य को तलाश कर गद्दी पर बैठा दो। उन्होंने ही नीतिशतक लिखा, और शृंगार तथा वैराग्य शतक भी।
When the fruit came back to him the second time, Bhartrihari understood everything, and found that he had banished his brother unjustly. He did not go back into the inner palace at all; he walked out of the court itself and into the forest, telling his ministers only to find Vikramaditya and seat him on the throne. It was he who wrote the Nitishatak, and the Shringar and Vairagya shatakas as well.
धारानगरी मध्य प्रदेश में है। वहाँ से पंवारों का एक बड़ा दल हाथियों और घोड़ों पर सवार होकर चला और पहला पड़ाव रामगंगा के किनारे, फ़र्रुख़ाबाद ज़िले की अमृतपुर तहसील के पड़ोस में, एक गाँव काल्हापुर में डाला। वहाँ से एक टुकड़ी पूरब की ओर गई, दूसरी सीतापुर ज़िले में, तीसरी हरदोई की ओर — और सब जगह स्थानीय छोटे-छोटे ज़मींदारों पर अपना दबदबा बनाते हुए बसती गई।
Dhar Nagari is in Madhya Pradesh. From there a large body of Panwars set out, mounted on elephants and horses, and made their first halt on the bank of the Ramganga, near Amritpur tehsil in Farrukhabad district, at a village called Kalhapur. From there one party went east, another into Sitapur district, a third towards Hardoi — and everywhere they settled by establishing their weight over the small local landholders.
हम लोगों के पूर्वज एक बड़ी पंवार टुकड़ी के साथ तत्कालीन हथियारों से लैस होकर हमारे पड़ोस के एक गाँव में पहुँचे, जहाँ राजभर जाति का राजा था। वहाँ हमारे पूर्वज उस राजभर राजा के यहाँ सेनानायक बन गये, और अपने बड़े भाई राम सिंह को काल्हापुर सूचना भेजी कि सैनिकों सहित आ जाओ, यहाँ बड़ा राज्य है।
Our own forefathers came with one such large Panwar party, armed with the weapons of that day, to a village near ours where the king was of the Rajbhar caste. There our ancestor became commander of that Rajbhar king's forces, and sent word to his elder brother Ram Singh at Kalhapur: come with your soldiers, there is a large kingdom here.
इटौंजा से नौ मील पर धावा बोला गया और हमारे पूर्वज ने भीतर से फाटक खोल दिया। राजा मारा गया और सब राजभर पूर्वी ज़िलों में पलायन कर गये। आज उस जाति का एक भी गाँव यहाँ नहीं है।
The attack was made nine miles from Itaunja, and our ancestor opened the gate from within. The king was killed, and all the Rajbhars fled to the eastern districts. Today there is not one village of that caste left here.
राम सिंह राजगद्दी पर बैठे और हमारे पूर्वज को जागीर में सिंहामऊ सहित बारह गाँव मिले। चूँकि यह जीत धोखे से मिली थी, उसका एक प्रभाव हम लोगों पर पड़ा। सिंहामऊ में पूरब की ओर एक टीला है — लोग उसे आज भी हमारे पूर्वजों की गढ़ी के नाम से जानते हैं।
Ram Singh took the throne, and our own ancestor received twelve villages in jagir, Singhamau among them. Because that victory had been won by treachery, something of it came back upon us. In Singhamau, on the eastern side, there is a mound — people know it to this day by the name of our forefathers' fort.
दादू वाणीबारह गाँव और बिरादरी
अध्याय ३ / १२Chapter 3 of 12

बारह गाँव और बिरादरी

Twelve Villages and the Biradari
पृष्ठ २–३
जागीरदारों में हम थानापतियों की चार टुकड़ियाँ हुईं — एक सिंहामऊ, दूसरी खसरांव, तीसरी उनई, और चौथी बनौगा, जो हमारे परगना महोना के अमानीगंज का पुरवा है। उनई वालों को किसी कारण जाति-बाहर कर दिया गया; केवल हमारा गाँव और बनौगा ही थानापतियों में रह गये। हम लोगों के पुरखा बहुत सीधे-सादे थे।
Among the grantees, we Thanapatis divided into four branches — one at Singhamau, a second at Khasraon, a third at Unai, and a fourth at Banauga, which is a hamlet of Amanigunj in our own Pargana Mahona. The Unai branch was put out of caste for some reason; only our village and Banauga remained within the Thanapati fold. Our forefathers were very simple, straightforward men.
अंग्रेज़ों ने जब नवाबों से लखनऊ का राज्य जीता, तब बंदोबस्त कराके मालगुज़ारी और गाँवों की वर्तमान सीमाएँ शजरों में बनवा दीं — और वही अब तक चल रही हैं। राजा इटौंजा के पूर्वजों ने बंदोबस्त के समय हमारे पूर्वजों से लिखवा कर, केवल एक गाँव सिंहामऊ हमारे क़ब्ज़े में रहने दिया और शेष राज्य के गाँवों में शामिल करा लिया।
When the English took the kingdom of Lucknow from the Nawabs, they carried out a settlement, and had the revenue demand and the present boundaries of the villages entered into the record maps — and those are what still stand. At the time of that settlement the ancestors of the Raja of Itaunja got our own forefathers to sign away their claim, left us only the one village of Singhamau in our possession, and absorbed the rest into the estate's villages.
वर्तमान में तो अब बिरादरी का कोई महत्व नहीं। एक रात की बारात; बराती चाहे जिस जाति के हों, एक ही मेज़ पर, एक ही थाली से भोजन की सामग्री निकाल कर प्लेटों में खाते हैं। हँसी में लोग इसे गिद्ध-भोज कहते हैं — जैसे मरे जानवर का गोश्त गिद्ध खाते हैं, तगड़ा गिद्ध अच्छा भाग पाता है और कमज़ोर देखता रह जाता है; उसी तरह अच्छी सामग्री सबको नसीब नहीं होती।
Nowadays the biradari counts for nothing. A wedding party of a single night; the guests may be of whatever caste, and they eat at one table, lifting the food out of a common dish onto their plates. People joke and call it the vultures' feast — as vultures eat the flesh of a dead animal, the strong one getting the good portion while the weak looks on, so too the good food does not reach everybody.
तिलक में भी आमतौर पर केवल एक तरह की मिठाई, लड्डू, मिलती है, और भोजन वैसा ही। पहले जब तिलक होता था तब जवार की बिरादरी और अन्य लोगों को पक्का भोजन कराया जाता था।
Even at the betrothal there is generally only one kind of sweet, laddus, and the food to match. In the old days, when the tilak was performed, the whole biradari of the neighbourhood and others besides were fed a proper cooked meal.
बड़े राजा राम सिंह के वंशजों और हम थानापतियों के बीच जो अंतर था वह यह कि हम थानापतियों का कच्चा खाना राजघराने वाले नहीं खाते थे। केवल बनौगा वालों और हमारे गाँव का ही आपस में सम्बन्ध था। मेरे बड़े भाई ठा॰ भारत सिंह की दिवंगत पत्नी के दसवें में जब वे नहीं आये, तब से आना-जाना बन्द कर दिया गया।
The difference between the descendants of the great Raja Ram Singh and us Thanapatis was this: the royal house would not eat food cooked in our kitchens. Only Banauga and our own village kept relations with each other. When they did not come to the tenth-day rites for the late wife of my elder brother Thakur Bharat Singh, all coming and going between the houses was stopped.
अब तो गाँव तक के लोगों को कोई पूछता नहीं, क्योंकि सभी लोग अपने लड़के-लड़कियों के विवाह वहीं करने लगे हैं जहाँ बसे हों। लखनऊ में कुछ लोग निमंत्रण का कार्ड दे देते हैं, और वह विवाह के दिन ले जाये जाते हैं। बिरादरी की मान्यता रह नहीं गई।
Now nobody so much as asks after the people of the village, because everyone has taken to marrying their sons and daughters wherever they happen to have settled. In Lucknow some people simply hand over an invitation card, and it is carried to the wedding on the day. The authority of the biradari is finished.
भइया (ठा॰ भारत सिंह) के दूसरे लड़के रामू (ठा॰ शील भद्र सिंह) ने एम॰ए॰ में अपने गाँव पर थीसिस लिखी और उसी में प्रथम श्रेणी मिली। उस समय जो एम॰ए॰ स्पेशल होता था वह अब नहीं रहा। उस थीसिस में ठा॰ चन्द्रभाल सिंह की दी हुई जानकारी पर जो वंशावली लिखी है, वह इस समय उस कमरे में रखी है जिसमें जाली लगी है। उसको मैं अंत में लिख दूँगा।
My brother's second son, Ramu (Th. Sheel Bhadra Singh), wrote his MA thesis on his own village and took a first class for it. The MA Special as it then was no longer exists. The genealogy set down in that thesis, on the information given by Thakur Chandrabhal Singh, is at present kept in the room with the grille. I shall write it out at the end.
दादू वाणीपाँच बाबा, और पिताजी
अध्याय ४ / १२Chapter 4 of 12

पाँच बाबा, और पिताजी

Five Brothers, and My Father
पृष्ठ ४, ८–१० · ८–१० सितम्बर २००४
हमारे पिता, जिनको हम दादा कहते थे, उनके पिता चार भाई थे। बड़े ठा॰ बलदेव सिंह — उनको एक पुत्री थी, कोई पुत्र न था। उनका विवाह ग्राम शेषपुर, ज़िला सीतापुर में हुआ था। उनके दो पुत्र, गुरुदेव और वंशीविहारी, यहीं रहकर मिडिल स्कूल — जो अब का जूनियर हाईस्कूल है — पास कर, मास्टरी की ट्रेनिंग करके सीतापुर ज़िले में मास्टर हुए और अंत में प्रधानाध्यापक होकर रिटायर हुए। अभी जीवित हैं।
My father — whom we called Dada — his own father was one of four brothers. The eldest was Thakur Baldev Singh; he had a daughter and no son, and his marriage had been made at village Sheshpur in Sitapur district. His two sons Gurudev and Banshibihari stayed here, passed the middle school — what is now the junior high school — took the teacher's training, became masters in Sitapur district, and retired at last as headmasters. They are living still.
पाँच बाबा लोगों के पुत्र थे — बलदेव सिंह, रामदयाल सिंह, शिवदयाल सिंह, शिवमंगल सिंह और शिवराज सिंह। ठा॰ शिवदयाल सिंह के पुत्र ठा॰ लालता सिंह थे। ठा॰ शिवमंगल सिंह के दो पुत्र थे — ठा॰ शारदाबरन सिंह और सुखदेव सिंह। सुखदेव सिंह मिडिल स्कूल में मेरे सहपाठी थे और सातवीं में ही स्वर्गत हो गये।
The five brothers' sons were Baldev Singh, Ramdayal Singh, Shivdayal Singh, Shivmangal Singh and Shivraj Singh. Thakur Shivdayal Singh's son was Thakur Lalta Singh. Thakur Shivmangal Singh had two sons — Thakur Shardabaran Singh and Sukhdev Singh. Sukhdev Singh was my classmate at the middle school, and died while we were still in the seventh.
ठा॰ शारदाबरन सिंह ने ही मुझे मिडिल स्कूल में नाम लिखा कर पढ़ाया था, और वह उस समय ज़िले के मास्टरों में नम्बर एक पर थे। उन्हीं की बदौलत मुझे मिडिल स्कूल की परीक्षा में प्रदेश में सातवाँ स्थान और छह रुपये मासिक स्कॉलरशिप मिली — और इसी की बदौलत हाईस्कूल की पढ़ाई हुई, जो आगे चलकर भइया (ठा॰ भारत सिंह), गणपति सिंह और महेश्वर सिंह — सबके आगे पढ़ने का सम्बल बनी।
It was Thakur Shardabaran Singh who entered my name at the middle school and taught me, and in those days he stood first among the masters of the district. It was because of him that I stood seventh in the province in the middle school examination and won a scholarship of six rupees a month — and it was on the strength of that scholarship that my high school education happened at all, and became in time the thing that carried my brother Thakur Bharat Singh, Ganpati Singh and Maheshwar Singh forward in their own studies.
पिताजी अपने पिता के इकलौते पुत्र थे; कोई बहन भी न थी। उस मुसलमानी ज़माने में बहुत से ठाकुर लड़की को जन्मते ही मार डालते थे — यह रिवाज इसलिए था कि लड़की के बड़े होने पर उसे छिपाकर रखना पड़ता था। मेरे पिताजी की बहन को मारने का रिवाज हमारे यहाँ न था — क्योंकि अगर होता तो बड़े बाबा बलदेव सिंह की लड़की, उमराव फूफी, न बचतीं।
My father was his father's only son; he had no sister either. In those Mussalman days a great many Thakurs killed a daughter at birth — the custom stood because once a girl grew up she had to be kept hidden. In our house there was no custom of killing my father's sister — for had there been, Baldev Singh's daughter, our aunt Umrao, would not have lived.
पिताजी धार्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे। उनका विवाह उन्नीस वर्ष की अवस्था में हुआ, और उससे पहले वह तीर्थयात्राएँ प्रायः पैदल चलकर ही करते थे। बद्रीनारायण भी गये थे। उस समय लखनऊ से बरेली तक छोटी लाइन थी; आगे कोई रास्ता आज जैसा न था, अलकनन्दा के किनारे-किनारे जाते थे। रास्ते में पंडे लोग आश्रय देते थे और अपनी बही में यात्रियों का पूरा पता और वंशावली लिख लेते थे — और अब भी लिखवाते हैं; लोग इसके बदले दान स्वरूप देते हैं।
My father was a man of religious disposition. He married at nineteen, and before that he made his pilgrimages generally on foot. He went to Badrinarayan too. In those days there was a narrow-gauge line as far as Bareilly from Lucknow; beyond that there was no road such as there is now, and one walked along the bank of the Alaknanda. On the way the pandas gave shelter, and wrote the full address and genealogy of every pilgrim into their ledgers — and they still have it written even now; people give something in charity for it.
गंगाजी भागीरथी कहलाती हैं; देवप्रयाग में ऊपर का संगम अलकनन्दा से हुआ, और नीचे आकर हरिद्वार में गंगा नाम ही रह गया।
The Ganga is properly called the Bhagirathi; at Devprayag she joins the Alaknanda from above, and coming down, at Haridwar, only the name Ganga remains.
सन् १९५० ई॰ में, जब मैं बहराइच में तहसीलदार था, मैं भाभी, चाची, ठा॰ शारदाबरन सिंह और चचेरे भाई ठा॰ चक्रपाल सिंह के साथ यात्रा को गया। काशी तक रेल में, और आगे रुद्रप्रयाग तक बस में। आगे नदी का पुल पैदल पार करना पड़ता था, अतः हम लोग चलकर अगली चट्टी पर रुके, भोजन बनाकर, और केदारनाथ महादेव के दर्शन हेतु आगे पैदल रवाना हुए।
In the year 1950, when I was Tehsildar at Bahraich, I made the pilgrimage myself, with my sister-in-law, my aunt, Thakur Shardabaran Singh and my cousin Thakur Chakrapal Singh. By rail as far as Kashi, and by bus from there to Rudraprayag. Beyond that the river bridge had to be crossed on foot, so we walked on, halted at the next chatti, cooked a meal, and set out on foot for the darshan of Kedarnath Mahadev.
केदारनाथ जाने में मामी घोड़े पर चलीं और सब लोग पैदल। रास्ते में एक बार चाची गिर पड़ीं, मगर उन्होंने कहा कि सवारी पर यात्रा करके पुण्य नहीं मिलेगा।
Going up to Kedarnath my aunt rode a pony and the rest of us walked. On the way one of the women fell — but she said that there would be no merit in a pilgrimage made sitting on a mount.
उस समय कम मेहनती लोग और दमे के रोगी छोटे-छोटे घोड़ों पर चढ़कर जाते थे; कम ख़र्च करने वालों को पहाड़ी लोग पीठ पर एक जीन-सा बनाकर लाद लेते थे। ईमानदारी इतनी थी कि बोझ लादकर वे आगे बहुत पहले पहुँच जाते थे और सामान वैसा का वैसा सौंप देते थे।
In those days those with less stamina, and asthmatics, went up on small hill ponies; those who could spend less were carried on the backs of hill men, who made a kind of saddle of it. Their honesty was such that they would go ahead with the load, arrive long before you, and hand everything over exactly as it had been given.
पैदल यात्रा में पानी छानकर, और गला ठीक रहने के लिए काली मिर्च और शक्कर का मिश्रण फाँक लेते थे। हरिद्वार में ही लोगों को रुई भरी गद्दी, काली मिर्च और शक्कर का मिश्रण, और कपड़े की गठरी मिल जाते थे।
On the walk one strained one's water, and took a mixture of black pepper and sugar to keep the throat right. At Haridwar itself one could get a cotton-stuffed pad, the pepper-and-sugar mixture, and a bundle of cloth.
पैदल यात्रा नौ दिन में पार करते थे — इसी से वह कहावत है, नौ दिन चले अढ़ाई कोस। हम लोग जोशीमठ ठहरकर बस से आगे गये और अगली चट्टी पीपलकोटी पहुँचकर फिर पैदल यात्रा कर लौट आये।
The walk took nine days — which is where the old saying comes from, nine days on the road and two and a half kos covered. We halted at Joshimath, went on by bus, reached the next chatti at Pipalkoti, and walked the rest and came back.
बद्रीनारायण में हम लोग पंडे के यहाँ टिके। वहाँ एक तहसीलदार मिले जो मेरे पहले बहराइच में प्रबंधक थे; मिलने पर उन्होंने कहा — मेरे यहाँ रहो। बात यह थी कि बहराइच में बीज हेतु तकावी, यानी नक़दी क़र्ज़ा, दिया जाता था, और उसके बँटवारे में नायब तहसीलदारों की सहायता ली जाती थी। एक नायब तहसीलदार ने एक फ़र्ज़ी सूची बनाकर कई सौ रुपये ग़बन कर लिये। मामला मेरे सामने आया तो मैंने उसे सँभाल लिया था।
At Badrinarayan we stayed at our panda's house. There I met a Tehsildar who had earlier been a manager at Bahraich; on meeting me he said, stay with me. The matter was this: at Bahraich, taqavi — a cash loan for seed — used to be given out, and in distributing it the help of the naib tehsildars was taken. One naib tehsildar made up a false list and embezzled several hundred rupees. When the case came before me, I settled it for him.
पिताजी बहुत सूझबूझ के थे। नाड़ी-ज्ञान बहुत बढ़िया था; वैद्यकी भी करते थे और गाँव में जो जड़ी-बूटियाँ थीं उन्हीं से ग़रीब लोगों का इलाज करते थे। कुछ लेते न थे।
My father was a man of great understanding. His reading of the pulse was very fine; he practised medicine as well, and treated the poor of the village with such herbs as grew there. He took nothing for it.
दादू वाणीतख़्ती और सरकंडे की क़लम
अध्याय ५ / १२Chapter 5 of 12

तख़्ती और सरकंडे की क़लम

The Wooden Tablet and the Reed Pen
पृष्ठ ५–७
पहले इटौंजा में मिडिल स्कूल न था; वह पड़ोस में महोना क़स्बे में था। १९१३ ई॰ में राजा इन्द्र विक्रम सिंह ने एक मध्यम भवन बनवाकर उसे महोना से इटौंजा ले आये। प्राइमरी स्कूल भी वहीं था
At first there was no middle school at Itaunja; it was in the neighbouring town of Mahona. In 1913 Raja Indra Vikram Singh had a modest building put up and brought the school from Mahona to Itaunja. The primary school was there too.
घर से चबेना — चना, ज्वार आदि — कपड़े में बाँधकर, ग्राम कमालपुर होकर रास्ता था। कमालपुर में बन्दर बहुत थे; वे जंगल से बीच रास्ते में दिखाई देते थे तो डर लगता था। गाँव के मोड़ पर पहुँचकर पटवारी लालता सिंह की सहायता से निकल जाते थे। दोपहर को चबेना चबाने का ही समय होता था।
One tied up one's midday parched grain — gram, jowar and the like — in a cloth, and the road went by way of the village of Kamalpur. There were a great many monkeys at Kamalpur; when they appeared out of the jungle in the middle of the road it was frightening. At the turn of the village we would get past with the help of Lalta Singh, the patwari. Noon was simply the hour for chewing the parched grain.
स्कूल से गाँव निकट था। वहाँ एक भाई पानी पिलाने का फ़र्ज़ करता था और पढ़ने वालों को पानी भर देता था। वही पानी पीकर फिर पढ़ाई होती, और चार बजे छुट्टी मिलती थी — तब घर आकर खेल-कूद में जुट जाते थे।
The village was close to the school. There was a man whose duty it was to give out water, and he would fill it for the boys. Having drunk that water the lessons went on again, and school let out at four — and then one came home and threw oneself into play.
टाट पर बैठ-बैठकर पढ़ा — आज भी मेरे घुटनों में उसका असर है। तब स्लेट पर नहीं लिखा जाता था। लकड़ी की तख़्ती होती थी, जिसे मुल्तानी मिट्टी और शीशे से घोटकर चमकाना पड़ता था, और सरकंडे की क़लम, जिसे मास्टर ही चाक़ू से बनाते थे।
We studied sitting on jute matting — I feel it in my knees to this day. In those days one did not write on a slate. There was a wooden tablet, which had to be rubbed smooth and made to shine with fuller's earth and a piece of glass, and a pen cut from a reed, which only the master would make, with a knife.
तब प्राइमरी और मिडिल स्कूल में मास्टर लोग मेहनत से पढ़ाते थे। उस समय एक सब डिप्टी स्कूल इंस्पेक्टर इटौंजा में डेरा लगाकर, घोड़े पर सवार होकर, पड़ोस के प्राइमरी स्कूलों और एकमात्र मिडिल स्कूल का निरीक्षण करते थे।
In those days the masters in the primary and middle schools taught with real effort. A sub-deputy school inspector would camp at Itaunja and ride out on horseback to inspect the primary schools of the neighbourhood and the one middle school.
पढ़ने वालों में पिछड़े वर्गों के लोग बहुत कम थे — केवल ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ और मुसलमान ही थे। बाद में जब मैं मास्टर हुआ और इटौंजा आया, तो गाँव में चमारों के दो लड़कों — उमराव और मंगल — तथा पासियों के राम अवतार को प्रोत्साहित करके पढ़ाया। उमराव तो मिडिल पास कर मास्टर हो गये; मंगल नहीं हो पाये। राम अवतार आगे चलकर इण्टर कॉलेज में मास्टरी को गये
Very few boys of the backward communities were among the students — only Brahmins, Thakurs, Kayasths and Muslims. Later, when I had become a master myself and came to Itaunja, I encouraged and taught two boys of the Chamars in the village — Umrao and Mangal — and Ram Avtar of the Pasis. Umrao passed the middle school and became a master; Mangal could not. Ram Avtar in time went to teach at an inter college.
आजकल हमारे गाँव के चमार जवार में नम्बर एक पर हैं और ठाकुरों से मान्य लेते हैं।
Today the Chamars of our village stand first in the neighbourhood, and it is from the Thakurs that they now receive respect.
तब केवल हरवाही अथवा पशु चराने का काम था, और खेती के कामों में मज़दूरी करके जो मिलता उसी से गुज़र होता था। पन्द्रह रुपये भी बहुत कम लोगों के पास रहते थे।
In those days there was only ploughing for hire or grazing, and one lived on what one got as a labourer in the fields. Even fifteen rupees stayed in very few hands.
पिताजी ही केवल ऐसे थे जो जवार में इन बातों की पूजा करतेसंस्कारों पर बिरादरी भोज करते थे। पहले एक गुट में ठाकुर भोजन पाते थे; मेरे चचेरे भाई जगदम्बा सिंह और दूसरे गुट में मैं, गणपति, महेश्वर और चचेरे भाई साथ होते थे।
My father alone in the neighbourhood kept these observances — he held the biradari feast at every rite. In the old way the Thakurs ate in one group; my cousin Jagdamba Singh in one, and in the other myself, Ganpati, Maheshwar and the cousins together.
पहले मैं अंग्रेज़ी पढ़ने गया; एक साल बाद गणपति भी, जो मिडिल में प्रथम श्रेणी लाकर चार रुपये मासिक डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का वज़ीफ़ा पाकर मेरे पास रहने लगे। महेश्वर पढ़ने में द्वितीय श्रेणी के ही छात्र रहे; वह भी एक साल बाद पहुँचे।
I went first to learn English; a year later Ganpati too, who had taken a first class in the middle school, won a district board stipend of four rupees a month and came to stay with me. Maheshwar was only a second-class student; he came a year after that.
जब मैं पढ़ता था तब यज्ञोपवीत संस्कार के बाद स्नान करके दस माला गायत्री का जाप अनिवार्य था। लालटेन के उजाले में पढ़कर, सुबह संध्या करके, आधी धोती पहनकर चौका-बर्तन स्वयं करते थे और एक पैसे की लकड़ी से दाल-रोटी बना लेते थे। तरकारी और घी तो कभी-कभी ही नसीब होते थे।
In my student days, after the sacred-thread ceremony, it was obligatory to bathe and tell ten rosaries of the Gayatri. We read by lantern light, said our morning prayers, wore the half-dhoti, did our own cooking and washing-up, and made dal and roti on a paisa's worth of firewood. Vegetables and ghee came our way only now and then.
घर से लाया हुआ चावल श्राद्धों में निपट जाता था, क्योंकि अपनी बिरादरी में खान-पान ऐसा था कि घर भर के लोग एक-दूसरे के घर श्राद्ध में खाने जाते थे। अब तो श्राद्ध का नाम ही नहीं है — एकाध घर में पुरोहित पिण्डदान कराकर भोजन पाता है; बिरादरी भोज समाप्त है।
The rice brought from home went in the shraddha feasts, for the rule of eating in our biradari was such that everyone in a household went to eat at the shraddha in each other's houses. Now the shraddha has no existence at all — in one house or two the purohit performs the pind-dan and gets his meal; the biradari feast is finished.
घर में औरतें चक्की पीसती थीं। माताजी, भौजाई, और मेरा विवाह होने के बाद गौने से आई मेरी पत्नी — नीचे चक्की चलाकर, पन्द्रहवें दिन जब हम लोग घर आते थे, आटा, दाल, हल्दी, धनिया, तेल और घी ले जाते थे। तब कहीं चक्की मशीन से चलने वाली न थी। चूँकि सभी औरतें अपने-अपने घरों में विवाह से पहले इस काम में अभ्यस्त थीं, उनको ससुराल में भी संकोच न होता था।
In the house the women worked the hand-mill. My mother, my brother's wife, and — after my marriage and her coming to the house — my own wife: they ground below, and on the fifteenth day, when we came home, we carried back flour, dal, turmeric, coriander, oil and ghee. There was no mill anywhere then that ran by machine. And because every woman had been used to that work in her own house before her marriage, she felt no awkwardness at it in her husband's.
दादू वाणीघुड़साल वाली कोठरी
अध्याय ६ / १२Chapter 6 of 12

घुड़साल वाली कोठरी

The Room by the Stable
पृष्ठ ५, २०–२२ · १४ सितम्बर २००४
मिडिल स्कूल का रिजल्ट आने पर जब वज़ीफ़ा मिला तो प्रधानाध्यापक ने दादा को बुलाकर कहा कि इस लड़के को हाईस्कूल में पढ़ाओ। उन्होंने कहा — चार रुपये मासिक तो यह पावेगा, मगर अन्य ख़र्चा मैं कैसे कर पाऊँगा, वह मुझे बहुत कठिन मालूम होता है। तब उन्होंने ढाढ़स दिया और कहा — फ़ीस माफ़ी के लिए मैं सिफ़ारिश करूँगा, और रहने के लिए तुम्हारे गाँव के बड़े ज़मींदार की कोठी, मुहल्ला गोलागंज लखनऊ में माँगूँगा; वह तो तुम्हारे ही कुल के हैं, कोठरी दे देंगे।
When the middle school results came and the scholarship with them, the headmaster called my father and told him: send this boy to high school. My father said — four rupees a month he will get, but how am I to meet the rest of it? That seems to me very hard. Then the headmaster reassured him and said: I will put in a recommendation for remission of fees, and for lodging I will ask at the house of your village's great landlord, in Golaganj, Lucknow; they are of your own people, they will give him a room.
हाईस्कूल कैसरबाग के चौराहे पर चर्च मिशन स्कूल के निकट था। पिताजी मुझे राजा इटौंजा, ठा॰ भगवान बख़्श सिंह के पास भी ले गये; उन्होंने वादा किया कि चार रुपये मासिक दे दूँगा — मगर वह वादा निभा नहीं, और आगे पढ़ने के लिए उनसे कुछ नहीं मिला
The high school stood near the Church Mission school, at the Kaiserbagh crossing. My father took me also to the Raja of Itaunja, Thakur Bhagwan Baksh Singh; he promised four rupees a month — but the promise was not kept, and for further study nothing came from him.
पहले साल मैं १९२३–२४ ई॰ में गया। गोलागंज की कोठी में रहने की जगह तो मिली, मगर अलग कोठरी न मिली। मेरे चाचा ठा॰ उमराव सिंह ने मिश्र जी से कहलाकर जगह दिलवाई। खाने-पीने का सामान बड़ी बैठक में रखकर, बरामदे में चौका-चूल्हा लगाकर, बिना नमक के खाने लगा।
I went up in the first year, 1923–24. A place to live was found in the Golaganj house, but no room of my own. My uncle Thakur Umrao Singh spoke to Mishra ji and got me the place. I put my food and things in the big sitting room, set up a hearth in the verandah, and began eating without even salt.
रोटी बनाना जानता न था; चलते समय आटा गूँधना और रोटी थापकर फुलका बनाना सब बता दिया गया था। एक पैसे की लकड़ी में भोजन बन जाता था। तब रुपये में सोलह आने और एक आने में चार पैसे होते थे — आज यह कोई जानता ही नहीं।
I did not know how to make roti; before I left, everything had been explained to me — how to knead the flour, how to pat out the bread and puff it. A paisa's worth of firewood cooked a meal. In those days there were sixteen annas to the rupee and four paise to the anna — today nobody so much as knows it.
संस्कार के कारण नित्य स्नान और संध्या, गायत्री, भजन-पूजन करता था।
By the discipline I had been raised in, I bathed daily and did the sandhya, the Gayatri, and the worship.
रहना नरक था। शौचालय केवल दो क़दम पर था और इतना भरा रहता था कि बिना नाक बन्द किये वहाँ ठहरना दूभर था। ठाकुरों की और अन्त्यजों तथा नौकरों की अलग-अलग थीं, फिर भी ठाकुर ही इतने थे कि वह भरी रहती थी — अतः मैं केवल सवेरे ही जाता था। महतरानी दोनों समय आती थी; फिर भी दिन में भरी ही मिलती थी।
Living there was hell. The latrine was only two steps away, and so full that one could not stand there without holding one's nose. There were separate ones for the Thakurs and for the servants and the low castes, and still there were so many Thakurs that it stayed full — so I went only at first light. The sweeper woman came twice a day; even so, by day one found it full.
मैं नीचे के बरामदे में रात को चौकी डालकर वह दरी बिछाता था जो विवाह में मिली थी। यही दरी कानूनगो की ट्रेनिंग में भी साथ रही। ऊन की चादर न होने के कारण जाड़े में ठीक से नींद न आती थी।
At night I put down a low cot in the lower verandah and spread on it the durrie that had come to me at my wedding. That same durrie went with me through the Kanungo training. For want of a woollen sheet, in the cold I could not sleep properly.
कोठी बहुत ऊँची कुर्सी पर थी। आँगन के बग़ल में दो दालान थे, बीच में बरामदा और भीतर कोठरी। पीछे औरतों के रहने को कोठरियाँ, चौका, बरामदा और चहारदीवारी थी। ऊपर बड़ा हाल था, तत्कालीन कुर्सियों से सज्जित, और दीवारों पर जानकारों द्वारा बनवाई गई चित्रकारी थी।
The house stood on a very high plinth. Beside the courtyard were two dalans, a verandah between them and rooms within. Behind were the rooms for the women, the kitchen, a verandah and the boundary wall. Above was a great hall, furnished with the chairs of that day, and on its walls paintings done by men who knew the craft.
बग़ल में एक ओर पलंग और तख़्त रखा रहता था जिस पर बिछौना डाल लोग रहते थे; दूसरी ओर एक और कमरा था। ऊपर एक नया कमरा, और पूजाघर तथा स्नानघर। नये कमरे में बड़े भाई श्याम बिहारी और महेश्वर जी वकालत पढ़ने को रहते थे।
On one side a bed and a takht stood with bedding spread, where people lived; on the other was another room. Above there was a new room, and the prayer room and the bathing room. In the new room my elder cousin Shyam Bihari and Maheshwar ji stayed, reading for the law.
मेरे रहने की कोठरी कैसे मिली, वह लिख रहा हूँ। एक कोठरी घुड़साल से लगी थी। माली शिवपाल — जो मेरे चाचा ठा॰ लालता सिंह की पहली ससुराल के निकट, गाँव के पश्चिम में रहते थे, और मिश्र जी के जिलेदार थे — उस कोठरी में ताला लगा रखते थे। मैंने उनसे अपनी दिक़्क़त बताई, तो कोठरी मिल गई।
How I came by a room of my own, I shall set down. There was a room adjoining the stable. Shivpal the gardener — who lived to the west of the village, near my uncle Thakur Lalta Singh's first wife's people, and who was Mishra ji's estate overseer — kept it locked. I told him my difficulty, and the room was mine.
बग़ल में दो घोड़े बँधे रहते थे और लीद की बदबू आती थी — मगर कोठरी मिल गई तो जैसे भाग्य खुल गया। बाहर एक बड़ा पत्थर था; उस पर लालटेन रखकर पढ़ने की सुविधा थी। कोठी में बिजली थी मगर माँगने की हिम्मत न थी; माँगता तो शायद मिश्र जी दे भी देते।
Two horses were tied alongside and the smell of dung came in — but when the room was given to me it was as though fortune had opened. Outside there was a large stone; a lantern set on it made a place to read. There was electricity in the house, but I had not the courage to ask for it; had I asked, Mishra ji would very likely have given it.
जाड़ों में चौकीदारों से मिला पयाल कोठरी में बिछाकर तीनों भाई पढ़ने लगे। इसी में बाद में गणपति और महेश्वर भी शामिल हो गये।
In the cold weather we spread in that room the straw got from the watchmen, and all three brothers sat down to study. Ganpati and Maheshwar joined me there later.
तब आजकल की तरह पुस्तकें कमीशन के प्रलोभन में बार-बार बदलती न थीं। वही दुकानों पर आधे दाम में मिल जाती थीं; हम लोग वहीं से कम मूल्य में लेकर पढ़ते थे और फिर आधे दाम में बेच जाते थे। पढ़ाई के विषय थे — हिन्दी, दूसरी भाषा उर्दू, संस्कृत, इतिहास, और गणित तीनों प्रकार का — अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित।
In those days textbooks were not changed over and over for the sake of commission, as they are now. The same books could be had at the shops for half price; we bought them cheap, studied from them, and sold them on at half price again. The subjects were Hindi, Urdu as the second language, Sanskrit, history, and mathematics in all three of its kinds — arithmetic, algebra and geometry.
हाईस्कूल में गणित में मेरे नम्बर डिस्टिंक्शन के ऊपर आये, तो मास्टर ने मेरी कॉपी रोककर सबको डाँट दिया, और मुझे बुलाकर पीठ थपथपाई और कहा — मेरी इज़्ज़त तुम्हारे हाथ है; स्कूल के बोर्ड पर साल सहित तुम्हारा नाम लिखा जाएगा।
In high school my marks in mathematics came out above distinction. The master held up my paper, gave the whole class a scolding over it, called me up, patted me on the back and said — my honour is in your hands; your name will go up on the school board, with the year against it.
मगर ज्यामिति के पर्चे की रात मेरे सिर में दर्द हुआ। ठीक समय पर एक ग्वाला आ गया; उसने हाल सुना तो दूकान से एक पैसे में कुछ लाकर कूटकर सुँघाया, जिससे पीला-पीला बलगम निकला और आराम आया। फिर भी ज्यामिति के दो सवाल, जो मैं दूसरे लड़कों को पढ़ाया करता था, बीमारी के कारण हल करने से रह गये।
But on the night before the geometry paper my head ached. A milkman came by just in time; when he heard, he fetched something from the shop for a paisa, crushed it, and had me breathe it in, at which a yellow phlegm came away and I was easier. Even so, two geometry problems — the very ones I used to teach the other boys — went unanswered because of the illness.
पर्चा दोबारा देखा, उत्तर ठीक पाकर आधा घंटा पहले ही कॉपी दे दी। बाहर निकलने के पहले ही वे दोनों सवाल याद आ गये — और अगर प्रार्थना करता तो मास्टर साहब कॉपी दे भी देते। मगर देहाती तो था; दोबारा माँग न सका, और डिस्टिंक्शन रह गया।
I looked over the paper again, found my answers correct, and handed in the book half an hour early. Before I had even left the room those two problems came back to me — and had I asked, the master would very likely have handed the book back. But I was a village boy; I could not bring myself to ask for it again, and the distinction was lost.
सभी विषयों में प्रथम श्रेणी मिली, और संस्कृत में डिस्टिंक्शन भी — तब प्रथम श्रेणी पाने वाले बहुत कम होते थे। मास्टर साहब गणित का पर्चा होने से पहले, दोपहर बाद हाल में कुछ सवाल दोहरा देते थे; ऐसे अनुभवी थे कि उनके बताये सवालों में ही पूरी कक्षा के पास होने भर नम्बर मिल जाया करते थे — उनकी कक्षा में कभी कोई फ़ेल नहीं होता था।
I took a first class in every subject, and a distinction in Sanskrit besides — and in those days very few came out with a first class at all. Before the mathematics paper the master used to go over a few problems with us in the hall in the afternoon; he was so practised at it that on the questions he had gone over the whole class got marks enough to pass — nobody ever failed in his class.
दादू वाणीबीस रुपये महीना
अध्याय ७ / १२Chapter 7 of 12

बीस रुपये महीना

Twenty Rupees a Month
पृष्ठ ११, १३–१४, २२, २४ · १५ सितम्बर २००४
उसी वर्ष इक्कीस की आयु समाप्त थी, और तब इक्कीस के बाद सरकारी नौकरी न मिलती थी। भगवान की कृपा से पिताजी का बड़े लोगों से मिलने का स्वभाव अपना रंग लाया।
That year my twenty-first was completed, and in those days no government appointment came after twenty-one. By God's grace my father's habit of keeping up with men of consequence bore its fruit.
पं॰ काशीदीन सुकुल, भागवत कथावाचक, जो दादा के गुरुभाई थे, ने मेरे कानूनगो स्कूल में भर्ती होने पर ख़र्च के लिए बीस रुपये मासिक अठारह मास तक दिये — जब तक ट्रेनिंग समाप्त न हो गई।
Pandit Kashidin Sukul, a reciter of the Bhagavat and a disciple-brother of my father's, gave me twenty rupees a month for my expenses when I entered the Kanungo school — for eighteen months, until the training was finished.
ट्रेनिंग समाप्त होने पर पैंतीस रुपये मासिक पर सुपरवाइज़र कानूनगो होकर आगरा ज़िले में नौकर हुआ। माली हालत की तब यह दशा थी कि बिछाने को एक दरी थी — वही दरी जो विवाह में मिली थी। पूरे ट्रेनिंग ज़माने में जीवन में गद्दा तक न मिल सका। चूँकि तुम, रज्जू (डॉ॰ राज भानु सिंह), यह सब जानना चाहते हो ताकि हम लोगों की संतान आजकल की दशा से मिलान कर सके, लिख दिया।
When the training ended I was appointed Supervisor Kanungo in Agra district on thirty-five rupees a month. As to our means, this was the state of them: I had one durrie to sleep on — the same durrie that had come to me at my wedding. In all that time I never once had a mattress. Since you, Rajju (Dr. Raj Bhanu Singh), want all this set down so that our children may measure it against their own condition today, I have written it.
उस समय, जब गाँव में लहान (लल्लन — डॉ॰ जन्मजय सिंह) सात मास का गोद में था, मैं तरबगंज तहसील, ज़िला गोंडा में नियुक्त था। तरबगंज अब तो आबादी से घिर गया है; तब केवल सरकारी तहसील, थाना, डाकघर, रजिस्ट्री, और सुपरवाइज़र कानूनगो के सर्किल का हेडक्वार्टर था, जहाँ कानूनगो का कच्चा मुक़ाम था। कुछ फ़र्लांग पर ढोंढपुरवा बाज़ार में आवश्यक सामग्री मिलती थी।
At the time when my son was seven months old and still in arms in the village, I was posted at Tarabganj tehsil in Gonda district. Tarabganj is surrounded by habitation now; then there was only the government tehsil, the police station, the post office, the registry, and the headquarters of the Supervisor Kanungo's circle, where the Kanungo had his rough quarters. A few furlongs off, at Dhondhpurwa bazaar, one could get what one needed.
तहसील के कर्मचारियों के रहने का कोई प्रबंध न था — एक पुरानी फूस की सराय थी, उसी की कोठरियों में अकेला रहता था। मेरे साथ एक घरेलू नौकर और ब्राह्मण रसोइया रहता था।
There was no arrangement at all for housing the tehsil's staff — there was one old thatched sarai, and I lived alone in its cells. With me lived one household servant and a Brahmin cook.
तहसील में आठ बजे के लगभग तहसीलदार तैयार होकर काम में लग जाते थे — पहले ख़ज़ाने का हिसाब और स्याहा, फिर प्रशासन के कार्य; कर्मचारियों को और ऊपर से आने वाले पत्रों का जवाब लिखवाकर डाक से चपरासी सदर कार्यालय ले जाता था। कर्मचारी साइकिल पर या घोड़े से गाँवों में आते-जाते थे।
At the tehsil the Tehsildar would be ready and at work by about eight — first the treasury accounts and the day-book, then the administrative work; replies dictated to the staff and to letters come down from above, and the peon would carry the post to the headquarters office. The staff went out to the villages by bicycle or on horseback.
मेरे तहसील के क्वार्टर में एक क़ायम-मुक़ाम तहसीलदार रहते थे — बड़े मुसलमान; उनकी कोई संतान न थी। मैंने प्रयत्न किया कि क्वार्टर ख़ाली हो तो घर से पत्नी और बच्चे को लाऊँ।
In the tehsil quarters there lived an officiating Tehsildar — a Mussalman of standing; he had no children. I tried to get the quarters vacated so that I could bring my wife and the child from home.
बाद में जब मैं रामपुर ज़िले में तहसीलदारी में प्रोन्नत होकर पहली बार पूरनपुर-मिलक तहसील में गया, तो एक दिन दौरे पर गाँव में काम देखकर शाम को डेरे पर लौटते समय, पीछे से पेशकार छूट गये थे। मैंने साइकिल से एकाएक उतरना चाहा और पगडंडी पर एक धान के खेत की ओर पैर पड़ा। गाँठ बाहर आ गई और चोट के कारण पसीना छूट गया।
Later, when I was promoted to Tehsildar and went for the first time to Puranpur–Milak tehsil in Rampur district, I was returning to camp one evening after a day's inspection in the villages, the peshkar having fallen behind. I tried to get down from the cycle too suddenly, and my foot went off the path towards a paddy field. The joint came out, and the pain brought the sweat out on me.
दो तगड़े चपरासी मुझे टाँगकर ले गये, और एक स्थानीय व्यक्ति ने खींचकर सीधा कर पट्टी बाँध दी। दूसरे दिन किसी तरह सदर अस्पताल गया; डिप्टी कलक्टर साहब भी आये और सिविल सर्जन ने देखकर मरहम-पट्टी की और धीरे-धीरे मालिश करने को दवा दी।
Two strong peons carried me back between them, and a man of the place pulled it straight and bound it up. The next day I got somehow to the district hospital; the Deputy Collector came too, and the Civil Surgeon looked at it, dressed it, and gave me something to rub in slowly.
यह ठीक नहीं हो रहा था। तब एक कानूनगो ने प्राकृतिक चिकित्सा की एक पुस्तक में लिखी विधि बताई — कटि तक पानी टब में भरकर स्नान करो, और डंडे के सहारे कपड़े पहनकर टहलो। मैंने बरेली से — जिस ज़िले से मेरी तहसील मिली थी — एक सहायक कर्मचारी के ज़रिये टब मँगाया और कटि-स्नान करने लगा, तो चार वर्षों बाद मेरा पैर सीधा हुआ। यह टब आज भी घर में है, और उसी में तेलहन धोकर सुखाया जाता है।
It would not mend. Then a Kanungo told me of a method he had read in a book of nature cure — sit in a tub filled to the waist, bathe, and then walk about dressed, leaning on a stick. Through a junior clerk I had a tub sent up from Bareilly — the district my tehsil had been carved from — and began the hip baths, and after four years my leg came straight. That tub is in the house to this day, and the oilseed is washed and dried in it.
मेरा पैर अब भी कभी-कभी गाँठ पर अटककर मुझे गिरा देता है और पसीना आ जाता है — मगर मैं फिर उठकर सामान्य हो जाता हूँ।
Even now that leg sometimes catches at the joint and brings me down, and the sweat comes out on me — but I get up again and come right.
जब मैं रिटायर हुआ तब ग्रेच्युटी आदि जो अब मिलती है, नहीं दी जाती थी; पेंशन की बिक्री कर ली जाती थी। यह ऐच्छिक थी, परन्तु मेरे रिटायर के साल कम्पलसरी थी। बीमा और प्रॉविडेंट फ़ंड मिलाकर कुल अठारह हज़ार की नक़दी मिली; पेंशन एक सौ सड़सठ रुपये मासिक बनी, और कटौती के बाद केवल एक सौ पच्चीस रुपये मासिक मिलने लगे।
When I retired, the gratuity and such as are given now were not given; the pension was commuted instead. That had been optional, but in the year I retired it was compulsory. With the insurance and the provident fund together, eighteen thousand rupees came to me in cash; the pension came to one hundred and sixty-seven rupees a month, and after deductions I began to draw only one hundred and twenty-five.
तब तहसीलदार का वेतनमान दो सौ सत्तर से छह सौ का था, और मैं रिटायर होते समय दो सौ सत्तर मासिक ही पाता था — उसी पर पेंशन बनी। उस समय तहसीलदार प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट थे, और सज़ा तथा पाँच सौ रुपये तक जुर्माना करने का अधिकार था। तब प्रशासन और न्याय की अदालतें अलग नहीं थीं।
The Tehsildar's scale in those days was two hundred and seventy to six hundred, and at the time I retired I was drawing only two hundred and seventy — and the pension was reckoned on that. In those days the Tehsildar was a first-class magistrate, with power to award sentence and to impose a fine of up to five hundred rupees. Administration and the courts had not yet been separated.
दादू वाणीसन् उन्नीस सौ उनतालीस
अध्याय ८ / १२Chapter 8 of 12

सन् उन्नीस सौ उनतालीस

The Year 1939
पृष्ठ १५–१७, ३१–३३
तरबगंज में जब मैं डेरे पर पहुँचा तो नौकर के आते ही मुझे चिट्ठी — तार — दे दिया गया। पढ़ा तो बहुत दुःखी समाचार था: पत्नी के मरने का। तहसीलदार महोदय को मैंने चिट्ठी थमा दी; वह पढ़कर सुन्न रह गये। सरकारी सराय में रहने वाले सब लोग आ गये।
At Tarabganj, when I came in to camp, the servant was scarcely through the door before a letter — a telegram — was put into my hand. I read it: the news was very grievous. My wife was dead. I handed the paper to the Tehsildar; he read it and sat stunned. Everyone living in the government sarai came in.
घर जाने के लिए तुरन्त प्रस्थान की तैयारी को ताड़कर साहब ने कहा — जो हुआ वह हुआ; अब जाओ। साथ एक सिपाही कर दिया।
Seeing that I was preparing to set off for home at once, he said — what has happened has happened; go now. And he sent a constable with me.
रास्ते में तुम्हारी नानी और ठा॰ पल्टू सिंह भी चले। उन्होंने रास्ते में अपनी लड़की से विवाह कर लेने को कहा। उस समय मेरी अवस्था बत्तीस वर्ष की थी। मुझे बहुत दुःख हुआ, मगर मन मसोसकर रह गया।
Your grandmother and Thakur Paltu Singh travelled with me. On the road they proposed that I should marry their daughter. I was thirty-two years old. It grieved me very much, but I swallowed it and said nothing.
घर आकर पता चला कि भइया (ठा॰ भारत सिंह) डॉक्टर को इटौंजा से लाए थे और उस समय जो इलाज उपलब्ध था किया गया, मगर बचाया न जा सका। मेरी पत्नी को तो बहुत पहले एक देहाती हस्तरेखा देखकर बता चुका था कि क्या होने वाला है
At home I learned that Bhaiya (Th. Bharat Singh) had brought the doctor from Itaunja and given her such treatment as there was, but she could not be saved. A village palmist had told her, long before, what was to come.
वह मरते समय बार-बार यही कहती रहीं कि अगर वह होते तो एक बात याद दिलाती। लोगों ने पूछा भी, मगर उन्होंने बताया नहीं। मैं समझ गया।
As she was dying she said over and over that if he were here she would remind him of one thing. They asked her what it was; she would not say. I understood what it was.
मैंने उससे कहा था कि अगर तुम मर जाओगी तो मैं दूसरा विवाह न करूँगा। और वह कहती थीं — सोने के आभूषण बनवा देना; और जो कुटुम्ब का जवार में नाम है, वह भइया की और मेरी इच्छा की पूर्ति ही है।
I had told her that if she died I would not marry again. And she used to say — have the gold ornaments made; and as for the name our family carries in this neighbourhood, that is my wish fulfilled and my brother's.
मेरी पत्नी को अपने न रहने का पूर्वाभास था। वह कहती थीं कि वह पैंतीस वर्ष की आयु में मर जाएँगी और मैं बुढ़ापे में सेवा से वंचित रहूँगा। मैं उन्हें आश्वासन देता रहा कि परिवार में कोई न कोई तो भाग्यवश सेवा देगा ही। और मेरा वह अनुमान बिल्कुल ठीक रहा।
My wife had a foreknowledge that she would not remain. She used to say she would die at thirty-five, and that in my old age I would be left without anyone to care for me. I kept assuring her that someone in the family would come, by God's grace, to do it. And that reckoning of mine proved exactly right.
मेरी संतान के लिए उस समय यूनानी दवा दी गई थी; फलस्वरूप संतान होने लगी, मगर पत्नी के कमज़ोर स्वास्थ्य के कारण दो पुत्रियाँ मरीं — पहली पैदा होते ही, दूसरी छठी के दिन। वैद्यराज ने कहा कि स्वास्थ्य ठीक न होने से गर्भ में भ्रूण को माँ से उचित ख़ुराक नहीं मिलती, इसलिए ऐसा हो रहा है; जब फिर गर्भ रहे तब बताना। उनकी दवा के सेवन से पत्नी स्वस्थ हुईं, और फलस्वरूप बालक — लहान (लल्लन — डॉ॰ जन्मजय सिंह) — ख़ूब स्वस्थ पैदा हुआ।
For the getting of children we were given Unani medicine at that time; children began to come, but because of my wife's weak health two daughters died — the first as soon as she was born, the second on the sixth day. The vaidya said that when the mother's health is poor the child in the womb does not get its proper nourishment from her, and that this was the cause; tell me, he said, when she conceives again. On his medicine she grew strong, and the boy — Lahan (Lallan — Dr. Janmajai Singh) — was born in full health.
मैंने दूसरा विवाह नहीं किया। एक कारण यह था कि दूसरी शादी करने वालों की पहली शादी की संतान की दुर्दशा का कड़वा सबूत सामने था। और मैंने ध्रुव की कथा सामने रखी — जिनके पिता उत्तानपाद की गोद से सौतेली माता ने उन्हें उतार दिया था, और वह बालक वन को चले गये। उन्हीं की जीवनी से प्रेरणा लेकर मैंने दूसरा विवाह नहीं किया।
I did not marry again. One reason was that the bitter proof lay before me of what becomes of the children of a first marriage when a man takes a second. And I set before myself the story of Dhruva — whom his stepmother lifted off his father Uttanapada's lap, so that the boy went away into the forest. It was from his life that I took the resolve not to marry again.
मैं जानता था कि लहान के जन्म के बाद माता की ममता के बिना जो पालन होगा, वह कठिन होगाफिर भी जानते हुए किया।
I knew that raising Lahan without a mother's tenderness would be hardand even so I did it knowingly.
एक और कारण था — एक विधवा, निःसंतान, घर पर ही रहने को दृढ़ थीं; और गणपति ने यह समझकर कि शायद तुम्हारी मौसी के कारण विवाह न करने का आरोप लगे, बात काट दी।
There was another reason besides — a widow, childless, was set on staying in the house; and Ganpati, thinking that the refusal to remarry might be laid at her door, cut the matter short.
उस ज़माने में मैंने विधवाओं के पुनर्विवाह की प्रेरणा स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज चलाने वालों के ग्रंथ पढ़कर पाई थी, और गणपति को पत्र लिखा था कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में परिवार का जवार में बहिष्कार तक हो सकता है — फिर भी मैंने मन में ठान ली थी।
In those days I had drawn the idea of remarriage for widows from reading Swami Dayanand Saraswati and the books of those who ran the Arya Samaj, and I had written to Ganpati that under the social order as it stood the family might well be put out of the neighbourhood for it — and even so I had settled it in my mind.
पिताजी तो ऐसे व्यक्ति थे कि एक बार लखनऊ में क्षत्रिय सभा की मीटिंग हुई और राजस्थान के मुस्लिम बन चुके क्षत्रियों को सम्मिलित करने का प्रस्ताव उन्होंने हाथ उठवाकर पास कराया। जब उनके हाथ का परोसा कच्चा भोजन खाने का समय आया, जवार के ठाकुर खिसकने लगे — तब पिताजी ने कहा कि जब मैंने हाथ उठाकर प्रस्ताव पास कराने का प्रण किया है तो भोजन किये बिना न उठूँगा। इस दृढ़ निश्चय पर जवार के किसी ठाकुर ने हम लोगों के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं की। उसी से प्रभावित होकर मैंने विधवा के पुनर्विवाह की पहल करने का सुझाव दिया था।
My father was that kind of man. Once there was a meeting of the Kshatriya Sabha in Lucknow, and it was he who got the resolution passed — by a show of hands — to admit those Kshatriyas of Rajasthan who had become Muslims. When the time came to eat food cooked and served by their hands, the Thakurs of our neighbourhood began to edge away. Then my father said: having raised my hand and pledged myself to that resolution, I shall not rise from here without eating. Faced with that, not one Thakur of the neighbourhood said a word against us afterwards. It was his example that moved me to argue for widow remarriage.
लहान डॉक्टरी पढ़ रहे थे और विवाह की उम्र के थे; रिश्ते तो बहुत मिलते थे, मगर लहान ने मुझसे पक्का कह दिया था कि एम॰ए॰ करके ही विवाह करूँगा। मैंने उनसे कहा — रामू (ठा॰ शील भद्र सिंह) तुमसे छोटे हैं, और वह तुम्हारे विवाह हुए बिना विवाह न करेंगे; वह एम॰ए॰ कर चुके हैं, और अच्छी नौकरी न मिली तो विवाह ठीक जगह न हो सकेगा। अतः मना न करो।
Lahan was reading medicine and of an age to marry; proposals came in plenty, but he had told me flatly that he would marry only after his MA. I said to him — Ramu (Th. Sheel Bhadra Singh) is younger than you, and he will not marry before you do; he has finished his MA, and if he does not get a good post the match will not be made in the right place. So do not refuse.
मैंने यह भी कहा था कि पुलिस या आबकारी विभाग के अधिकारी की पुत्री से विवाह न करना — मगर उनका ध्यान उस ओर न गया। विवाह हुआ। उस घर के दोनों के कुसंस्कारों का जो परिणाम होना था, होकर रहा; और लहान को जीवन भर पत्नी की सेवा से वंचित रहना पड़ा।
I had also said — do not marry the daughter of an officer of the police or the excise. But he paid that no heed. The marriage was made. What was bound to come of the bad training of that house came; and Lahan was left, all his life, without a wife's care.
दादू वाणीबाग़, मकान, और दरारें
अध्याय ९ / १२Chapter 9 of 12

बाग़, मकान, और दरारें

The Orchard, the Houses, the Cracks
पृष्ठ १२–१३, २८–३२ · ११ सितम्बर २००४
मिश्र बन्धुओं की जब ज़मींदारी समाप्त हुई, तो कटहरी वाला बाग़ जहाँ कहीं था, वे बेच रहे थे। उस वक़्त प्रबंध पं॰ लक्ष्मीशंकर मिश्र कर रहे थे, जो हैदराबाद हाईकोर्ट, आंध्र प्रदेश के चीफ़ जस्टिस पद से रिटायर होकर कोठी बनाकर रहते थे। उनकी ज़मींदारी में पं॰ जागेश्वर प्रसाद अवस्थी मैनेजर थे — जो एक हज़ार की चीज़ को सात सौ बताते और तीन सौ स्वयं हड़प लेते थे।
When the Mishra brothers' zamindari came to an end they began selling off what they had, the orchard at Katahari among it. The management at that time was in the hands of Pandit Lakshmishankar Mishra, retired Chief Justice of the Hyderabad High Court in Andhra Pradesh, who had built himself a house and was living in it. The manager of the estate was Pandit Jageshwar Prasad Awasthi — who would report a thing worth one thousand as seven hundred, and pocket three hundred of it himself.
जब बिक्री की बात चल रही थी, ठा॰ चन्द्रभाल सिंह ने मना कर दिया। मगर गोलागंज में रहने वाले जज साहब के चचेरे भाई पं॰ प्रताप नारायण मिश्र से किसी ने यह कहा कि — मैं ठा॰ भारत सिंह, मेरे बड़े भाई, का सामना तो नहीं करूँगा, पर जो मूल्य बाग़ का वह देना चाहें, उससे एक हज़ार अधिक दूँगा।
While the sale was under discussion, Thakur Chandrabhal Singh refused. But someone put it to Pandit Pratap Narayan Mishra, the judge's cousin who lived at Golaganj — I will not go up against Thakur Bharat Singh, my elder brother; but whatever price he is willing to give for the orchard, I will give a thousand more.
मैं रिटायर होकर घर आ चुका था। यह सब जानकर, बिना भइया (ठा॰ भारत सिंह) को बताये, रविवार के दिन — जब अवकाश था — गोलागंज में उनके घर पर अवस्थी जी से मिला और उन्हें ढाई सौ रुपये भेंट किये। वह नानुकुर दिखावे भर को करते रहे। मगर मैंने कहा — आप बैनामा ही ले लो।
I had retired and come home. Knowing all this, and without telling my brother, I went on a Sunday — it being a holiday — to Awasthi's own house in Golaganj and made him a present of two hundred and fifty rupees. He made a show of demurring. But I said: take the deed of sale and be done.
फिर वह साइकिल उठाकर फ़ैज़ाबाद रोड जज साहब के पास गये और बताया कि वह लड़का, जो आपकी कोठी में कोठरी में पढ़ता था, बाग़ लेने आया है। तब जज साहब ने कहा — ठाकुर गुरुबख्श सिंह का लड़का! — और कहा कि जाकर गत चार सालों की आय-व्यय का लेखा लाकर पेश करो।
Then he took his cycle to the judge's house on Faizabad Road and said: that boy who used to study in the little room in your house has come to buy the orchard. And the judge said — Thakur Gurubaksh Singh's boy! — and told him to go and bring the accounts of income and expenditure for the last four years.
अब बेईमानी से अवस्थी जी बिक्री कम और मज़दूरी बहुत दिखाते आये थे — फलस्वरूप औसत आय की राशि कम आई। बाग़ निन्यानबे बीघे कच्चा में था; उसमें बहुत पेड़ ठूँठ हो चुके थे और हरे-भरे फल देने वाले कम थे। जज साहब ने हिसाब देखा और कहा — छह हज़ार में दे दो।
Now out of dishonesty Awasthi had been showing the sales low and the labour high — so the average income figure came out small. The orchard ran to ninety-nine bighas in the local measure; many of the trees had gone to stumps and few were green and bearing. The judge looked at the accounts and said: let him have it for six thousand.
मैं दो हज़ार लेकर गया था; वही बयाना वहाँ हुआ और अवस्थी जी ने रसीद काट दी — और भइया को इसकी बाबत कुछ नहीं बताया।
I had gone with two thousand; that was paid there as earnest money, and Awasthi wrote out the receipt — and said nothing of it to my brother.
इसी बीच बाबू बालगोविन्द श्रीवास्तव — पड़ोस के गाँव गण्डोली के — के माध्यम से इरादतनगर में एक बड़ा प्लॉट कानपुर मेडिकल कॉलेज के डॉ॰ सीताराम कपूर से सुनकर, एक को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के सदस्यों में नाम कराकर, मुझे, भइया, गणपति और महेश्वर — चारों भाइयों को शामिल किया गया। मूल्य पंद्रह हज़ार था; डालीगंज स्टेशन के पास रेलवे लाइन से ज़मीन मिली थी। भइया के रिटायरमेंट के प्रॉविडेंट फ़ंड से लिया गया।
About this time, through Babu Balgovind Srivastava of the neighbouring village of Gandoli, we heard from Dr Sitaram Kapoor of the Kanpur Medical College of a large plot at Iradatnagar; names were entered in a cooperative housing society, and all four brothers — myself, my elder brother, Ganpati and Maheshwar — were included. The price was fifteen thousand; the land lay off the railway line near Daliganj station. It was paid out of my brother's retirement provident fund.
गणपति और महेश्वर ने कुछ न दिया, न माँग ही की। पहले महानगर पालिका लखनऊ को नक़्शा पास करने का अधिकार था और एक सदस्य का प्रभाव पर्याप्त था। इस बीच विकास प्राधिकरण का अधिकार बन गया, और सड़क, सीवर पाइपलाइन, पार्क की साज-सज्जा का पूरा अनुमानित धन जमा न होने से नक़्शा पास होना अटक गया।
Ganpati and Maheshwar gave nothing, nor did they ask. At first it was the Lucknow Municipal Corporation that had the power to sanction building plans, and the influence of a single member was enough. In the meantime the Development Authority took over that power, and because the full estimated cost of roads, sewer lines and the laying out of the park had not been deposited, the sanction of the plan was held up.
अंततः चारों के नाम सबसे अधिक क़ीमती सड़क किनारे के दो प्लॉट और उनके पीछे एक — कुल तीन — मिलाकर, भविष्य में सबके मकान बनाने की सोची गई।
In the end three plots — the two most valuable ones on the roadside and one behind them — were taken in all four names, with the thought that in time houses would be built there for everyone.
इसी बीच भाई महेश्वर को प्रोन्नति में हरदोई के ग्रामीण बैंक का अध्यक्ष पद मिला। विमल को मण्डी परिषद में सहायक अकाउंटेंट की नियुक्ति मिली, और उन्होंने उसी को वरीयता दी। निर्माण कार्य — सड़कें आदि — मण्डी परिषद के बहुत चल रहे थे, और पास करने में सीनियर अकाउंटेंट के साथ रहने से कमीशन का धन काफ़ी मिला।
About then my brother Maheshwar was promoted to the chairmanship of the rural bank at Hardoi. Vimal was offered an assistant accountant’s post in the Mandi Parishad, and preferred that. A great deal of construction — roads and the rest — was going on there, and in passing the bills, working alongside the senior accountant, a good deal of commission money came in.
विमल ने विकास प्राधिकरण से नक़्शा प्राप्त किया, अनुमानित धन जमा किया — और सामने वाला प्लॉट भइया के नाम पास हुआ; घर का नाम भारत सदन रखा गया। पीछे वाला प्लॉट छोड़ दिया गया कि गणपति और महेश्वर जब चाहें दो छोटे मकान बना लेंगे।
Vimal got the plan sanctioned by the Development Authority and deposited the estimated sum — and the front plot was sanctioned in the name of Bhaiya — Th. Bharat Singh; the house was given the name Bharat Sadan. The one behind was left, so that Ganpati and Maheshwar might build two small houses there whenever they chose.
विमल की देखरेख में काम शुरू हुआ — उनके अपने हिस्से की पाँच इंच की ईंट की दीवार और बाक़ी एक ईंट की दीवारें बनाकर भवन निर्माण शुरू हुआ।
Under Vimal’s supervision the work began — a five-inch brick wall on his own side and single-brick walls elsewhere, and the building went up.
और तब गणपति ने इच्छा जाहिर की कि मुन्नू (विजय भानु सिंह), जो बिजली विभाग में नौकरी पर हैं, उनके लिए मकान बने — अपने ही आश्वासन को दरकिनार कर। वे बाज़ार मूल्य पर आ गये, और लहान (लल्लन — डॉ॰ जन्मजय सिंह) से कहा गया कि कुछ माँग दो तो मुन्नू को मकान बनवा दें। इसी पर झगड़ा लगा।
And then Ganpati made known his wish that a house be built for Munnu (Vijay Bhanu Singh), who was employed in the electricity department — setting aside the assurance he had himself given. He came round to market rates, and it was put to my son that if he would give something, Munnu's house would be built. On that the quarrel began.
अन्ततः लहान ने निर्मित इमारत का पीछे का हिस्सा दे दिया। इसके बाद एक इंजीनियर को ध्यान में रखकर लहान को योजना दी गई — मगर मकान का नक़्शा बिगड़ गया, और बीच में एक बड़ा हॉल बना दिया गया।
In the end Lahan (Lallan — Dr. Janmajai Singh) gave up the rear portion of the built house. After that a scheme was put to him with an engineer in mind — but the plan of the house was spoilt, and a great hall was made in the middle of it.
उसके बाद मकान के पूरब की ओर किरायेदार की बेदख़ली दायर करने पर व्यय हुआ। लहान की पत्नी मुझसे बहुत रुष्ट हैं और मुझे कोसती हैं कि क्यों मैंने ज़ोर देकर उस प्लॉट में मकान बनवाकर संकट खड़ा किया। यह सब तभी से चालू हुआ, और मैं अपने को कारण मानकर चुप हूँ।
After that there was the expense of filing for the eviction of a tenant from the eastern side of the house. My son's wife is very angry with me and reproaches me — why did I insist on building on that plot and raise this trouble. All of this began from then, and I hold myself the cause of it, and say nothing.
एक और बात। मेरी गाय, जो नई बछिया के ब्याने पर अधिक दूध वाली थी, उसे लहान के यहाँ से मँगाकर एक छोटी, कम दूध वाली गाय से बदल दिया गया। इस छोटी गाय से परिवार को — बंटी और गुड़िया सहित, दोनों पति-पत्नी को — दोनों वक़्त कम पड़ने लगा। गणपति ने अधिक दूध वाली गाय अपने यहाँ भेज दी और कम वाली दिलाकर लहान के परिवार को दूध से वंचित कर दिया।
One thing more. My cow, which had lately calved and was giving well, was fetched away from my son's house and a small one, giving little, put in its place. With that small cow the family — Bunty and Gudiya and their parents both — fell short at both ends of the day. Ganpati sent the good milker to his own house and had the poor one given over, and so left my son's family without milk.
संयोग से वह गाय बछिया को जन्म दे गई। मैंने लहान को दूसरी तलाश करके दे दी थी। यह सब घटनाएँ केवल लहान की पत्नी पर भारी पड़ीं। फिर भी जीवन तब तक ऊपरी तौर पर सामान्य बना रहा।
As it happened that cow calved a heifer. I found another and gave it to Lahan. All of this fell most heavily upon my son's wife. Even so, on the surface, life went on as normal until then.
दादू वाणीरियासतें
१०
अध्याय १० / १२Chapter 10 of 12

रियासतें

The Princely States
पृष्ठ २४–२६ · १५–१६ सितम्बर २००४
रामपुर की तहसील — रामपुर रुहेला मुसलमानों की, अंग्रेज़ी हुकूमत में देशी रियासतों में थी। इन रियासतों में निकटवर्ती लोगों में से ही पदाधिकारी तैनात करने के लिए छोटी-छोटी तहसीलें बनाई गई थीं; वैसे वे ज़िलों के बराबर ही थीं। वहाँ तहसीलदार सर्वेसर्वा होते थे — सभी विभागों के राजस्व की उगाही और फ़ौजदारी मुक़दमे भी करते थे, और दारोगा उनके मातहत रहते थे।
The tehsil of Rampur — Rampur of the Rohillas, a Muslim house, was among the princely states under British rule. In those states small tehsils had been made so that officers could be appointed from among the local people; in effect they were the equal of districts. There the Tehsildar was everything — he collected the revenue of every department and heard the criminal cases as well, and the police inspectors were under him.
अंग्रेज़ों ने राजस्थान तथा अन्य रियासतों को — जो मध्य प्रदेश के जंगली इलाक़ों तक फैली थीं — देशी रियासतें बनाकर अलग रख दिया था। फ़ौज रखने का भी उनको अधिकार था।
The English had set apart the states of Rajasthan and the rest — spread as far as the forest tracts of Madhya Pradesh — as princely states and kept them separate. They had the right to keep armies too.
सबसे बड़ी रियासत वह थी जो अब आंध्र प्रदेश में हैपहले इस बड़े मुसलमानी राज्य को मद्रास के सूबे में मिला दिया गया था। बाद में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो अंग्रेज़ों ने ऐसी चाल चली कि जिस क़ानून से स्वतंत्रता दी गई, उसी के अनुसार भारत और पाकिस्तान बनाकर देशी रियासतों को अधिकार दिया कि जो चाहे भारत में या पाकिस्तान में शामिल हो।
The largest state of all was the one now in Andhra Pradesh. Earlier that great Muslim state had been attached to the Madras presidency. Later, when India became free, the English played this move: under the very law by which they granted independence, they created India and Pakistan and gave the princely states the right to accede to whichever they chose.
यह बड़ी मुसलमानी रियासत भारत के बीचोबीच थी। अगर पाकिस्तान में चली जाती तो कैंसर के मर्ज़ की तरह भारत संकटग्रस्त होता। पटेल नेहरू की तरह न थे — वह बहुत दृढ़ थे। पता पाते ही कि दूसरे दिन हैदराबाद का शासक पाकिस्तान में शामिल होने की स्वीकृति दे देगा, पटेल ने तत्कालीन प्रधान सेनापति को बुलाकर सैनिक कार्यवाही की, और रात ही में हैदराबाद पहुँचा गया।
That great Muslim state lay in the very middle of India. Had it gone to Pakistan, the country would have been stricken as by a cancer. Patel was not of Nehru's kind — he was very firm. The moment he learned that the ruler of Hyderabad would signify his accession to Pakistan the next day, Patel called in the Commander-in-Chief, ordered the military action, and reached Hyderabad that same night.
पटेल के सचिव ने मर्जर के छपे दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये — भारत में ही शामिल रहने की स्वीकृति, और बदले में प्रिवी पर्स, यानी गुज़ारा। बाद में यही आंध्र प्रदेश बन गया।
Patel's secretary got the printed instrument of merger signed — accession to India, and a privy purse, a maintenance, in return. Later this became Andhra Pradesh.
यह प्रसंग मेरी जीवनी से सम्बद्ध नहीं है; केवल रामपुर स्टेट के सर्वप्रथम स्वयं भारत में शामिल होने और नया ज़िला उत्तर प्रदेश में बनने से मेरी तैनाती से सम्बद्ध था। अतः वर्तमान पीढ़ी और तुम्हारी जानकारी हेतु लिख दिया — कि अंग्रेज़ों की कूटनीति यह थी कि स्वतंत्र भारत के बीचोंबीच पाकिस्तान बनाकर वह सशक्त न होने पाये। जूनागढ़, भोपाल और अजमेर जैसी मुस्लिम रियासतें भी इसी में थीं। पटेल ने हैदराबाद को मिलाकर अन्य सभी रियासतों को भारत में शामिल रखने में कूटनीतिक समझ का परिचय दिया।
This passage has nothing to do with my own life; it comes in only because Rampur State was among the first to accede to India of its own accord, and because a new district was made of it in Uttar Pradesh, which is how I came to be posted there. So I have written it down for the present generation and for your information — that the English strategy was to make a Pakistan through the middle of a free India, so that it should never grow strong. Muslim states like Junagadh, Bhopal and Ajmer were part of the same design. By bringing in Hyderabad, Patel showed the political understanding that kept all the other states within India as well.
कश्मीर का मामला जो अब तक चला आ रहा है — और वहाँ सैनिकों और लोगों की जो हत्या आतंकवादियों द्वारा होती है — उस पर थोड़ा प्रकाश डाल रहा हूँ। सरदार पटेल गृह मंत्री थे, मगर जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री होकर कश्मीर का मामला विदेश मंत्री के पोर्टफ़ोलियो में स्वयं लेकर उलझा दिया।
The Kashmir matter, which runs on to this day — and the killing of soldiers and of people there by the terrorists — let me throw a little light on it. Sardar Patel was Home Minister, but Jawaharlal Nehru as Prime Minister took Kashmir into the Foreign Minister's portfolio himself, and there entangled it.
पाकिस्तान ने हमला बोला और कुछ जीत पाई, मगर बाद में भारतीय फ़ौज ने उसे खदेड़ना शुरू किया। तब नेहरू ने कमांडर-इन-चीफ़ से कहा कि केवल यहीं रुको — न कि पूरा कश्मीर वापस ले लो, जिससे पाकिस्तान वाला कुछ भाग मिलाकर कश्मीर पहुँचने का रास्ता सुलभ हो जाता।
Pakistan attacked and made some gains, but afterwards the Indian army began to drive them back. Then Nehru told the Commander-in-Chief to stop where he was — and not to take the whole of Kashmir, by which some part held by Pakistan would have come in and the road to Kashmir been made easy.
नेहरू संयुक्त राष्ट्र में मामला ले गये; अधूरी जीत पर युद्धविराम हुआ और मामला वहीं ठहर गया। यह बड़ी भूल थी — कूटनीति ठीक होती तो जो संकट आज है वह न होता।
Nehru carried the matter to the United Nations; a ceasefire was made upon an unfinished victory, and there it has stood ever since. This was a great blunder — had the statecraft been sound, the trouble we have today would never have come.
सुरक्षा परिषद जो बनाई गई थी — अमेरिका, रूस, फ़्रांस, ब्रिटेन और चीन — उन्हीं को वीटो की पावर मिली, और उसके बाद उन्हीं में से किसी के अड़ जाने पर कोई भी मामला सुलझ न पाया। यह प्रसंग भी मेरी जीवनी का नहीं है, मगर अगली पीढ़ी की जानकारी हेतु इतिहास की बात लिख दी।
The Security Council that was set up — America, Russia, France, Britain and China — it was they who got the power of veto, and after that, if one of them dug in, no matter could ever be settled. This too is no part of my own life; but for the information of the coming generation I have set the history down.
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दादू वाणीगाँव, अब
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अध्याय ११ / १२Chapter 11 of 12

गाँव, अब

The Village, Now
पृष्ठ १८–१९, २३ · १२ सितम्बर २००४
अब गाँव में शहर वाली सभी सुविधाएँ उपलब्ध करा दी गई हैं। बिजली हमारे गाँव में बराबर रहती है, क्योंकि गोमती पर लिफ़्ट कैनाल से पानी उठाकर तराई के गाँवों की सिंचाई हेतु बिजली विभाग को आदेश है। गोबर गैस के हाते में बोरिंग कराकर, पम्प द्वारा छत पर टंकी रखवाकर घर में पानी की सुविधा कर दी है। हर शौचालय और स्नानागार में वाश बेसिन की सुविधा है।
Every convenience of the town has now been brought into the village. Electricity in our village is steady, because the department is under orders to supply the lift canal on the Gomti that raises water for the irrigation of the low-lying villages. In the yard by the gobar-gas plant a boring was sunk, a pump put in and a tank set on the roof, and so there is water in the house. Every latrine and bathing room has its wash basin.
गाँव के सरकारी हैंडपम्पों में जलस्तर घटने से पानी नहीं है। वहाँ प्रधानों के प्रयत्न से कुछ प्रबंध हुआ है।
In the government hand pumps of the village there is no water, the water table having fallen. There some arrangement has been made through the pradhans' efforts.
वर्तमान प्रधान कुलदीप सिंह, एक अविवाहित युवक, प्रधानों की संस्था के अध्यक्ष हैं। गाँव की सर्व-विकास योजना के अंतर्गत उन्होंने निर्बल वर्ग के लोगों को मकान पक्का करने हेतु चेक द्वारा धन दिलाकर शोषण से मुक्ति दिला दी है। मेरे घर में शौचालय, स्नानघर और गोशाला में नल लगवाने में भी उन्हीं ने प्रबंध करा दिया।
The present pradhan, Kuldeep Singh, an unmarried young man, is chairman of the pradhans' association. Under the village development scheme he has had money paid by cheque to the poorer people for making their houses pucca, and so has freed them from being cheated over it. It was he too who arranged the taps in my own house — in the latrine, the bathing room and the cattle shed.
फिर भी शहर में बसने की दौड़ में पूरे परिवार के रिटायर लोग गाँव में न रहकर लखनऊ और अन्य शहरों में रह रहे हैं — और मड़ैया की चिंता से बने मकानों को छोड़कर।
And still, in the rush to settle in the cities, the retired men of the whole family are living not in the village but in Lucknow and elsewhere — leaving behind the houses that were built out of the fear of having no roof at all.
खंड विकास अधिकारी गाँवों में नहीं आते; केवल हर फ़सल में एक दिन सहायक विकास अधिकारी मीटिंग करके जानकारी देते हैं। विकास कार्य, जो गाँवों का मुख्य उद्देश्य है, केवल हवाई है — धन का दुरुपयोग ही अधिक होता है। क्योंकि स्वार्थ-पूर्ति और अर्थ-लोलुपता का हर घर में ही ताण्डव है, तो सरकारी अधिकारी-कर्मचारी भी समयानुसार ही प्रदूषित हैं।
The block development officer does not come to the villages; only once in each season the assistant development officer holds a meeting and gives out information. Development work, which is supposed to be the whole purpose in the villages, exists only in the air — most of the money is misspent. And since self-interest and the hunger for money dance in every household, the government's officers and clerks are no less corrupted than their times.
बीच में कुछ दिन ग्राम विकास हेतु सरकार ने विशेष पद सृजित कर प्रबुद्ध ग्रामजनों का परामर्श लिया था — आज वह पद ही समाप्त हो गया।
For a while the government created a special post for village development and took the advice of the better-informed villagers — today that post has itself been abolished.
मैं तो अब ग्राम-वास की जीवनचर्या में ही रहता हूँ; खेती आदि का हाल-चाल किसी से पूछ लेता हूँ। जब से मैं पैदा हुआ, उस समय की विपन्नता वर्तमान पीढ़ी की जानकारी में नहीं है — उनकी जानकारी हेतु ही मैंने अपनी जीवनी लिखी।
For myself, I keep now to the routine of village living; I ask after the crops and the rest from whoever comes. The poverty of the world I was born into is not within the knowledge of the present generation — and it is for their knowledge that I have written my life.
मैंने कई वर्ष पहले एक वसीयत लिखकर सील बंद लिफ़ाफ़े में दे दी है, कि आगे कुटुम्ब का बँटवारा कैसे हो। गणपति ने १९८९ ई॰ में, मरने से पहले, एक रजिस्टर में मेरी तथा बड़े भाई की सलाह से एक Family Settlement लिखा है — उसका पालन करना होगा।
Some years ago I wrote a will, sealed it in an envelope and gave it over, setting out how the family's property is to be divided hereafter. In 1989, before his death, Ganpati wrote a Family Settlement into a register, on my advice and my elder brother's — and that is to be observed.
अगर बनवारी को जानवरों की सेवा हेतु न भेजा होता तो गाँव के लोगों में कोई सेवक न मिलता। दूध, दही और देशी घी सँभालने और बिक्री के लिए ले जाने का काम उन्हीं का है
Had Banwari not been sent to look after the animals, no servant would have been found among the people of the village. The milk, the curd and the country ghee — the keeping of them and the carrying of them to sell — is his work.
इंजन से चलने वाली चारा मशीन में एक बार उनका हाथ आ गया; अंगूठा बचा, आधी उँगलियाँ कट गईं। तब प्लास्टिक सर्जरी भी न थी। मगर अंगूठे, आधी उँगलियों और गदेरी के सहारे वह पूरा काम निपटा रहे हैं — बखारी में अनाज रखना, धनंजय की पत्नी को दूध पहुँचाना, और तेलहन को धोकर, सुखाकर पिसाने और तेल पेराने का काम।
Once his hand went into the engine-driven chaff cutter; the thumb was saved, half the fingers were cut away. There was no plastic surgery in those days. But with the thumb and what was left of the fingers and the heel of his hand, he does the whole of the work — storing the grain in the bakhari, carrying the milk to Dhananjay's wife, and washing, drying, grinding the oilseed and having the oil pressed.
धनंजय की पत्नी को सफ़ाई बहुत पसंद है, और पछोरकर काम अन्य लोगों की भाँति नहीं करतीं। मैंने देखा है — धोने पर धूल छूटकर पानी गंदला होता है। फिर भी मशीन की चक्की और कोल्हू में पेराई में अन्य लोगों का पिसान और तेल कम बचत वाला निकलता है।
Dhananjay's wife is very particular about cleanliness, and does not do the winnowing carelessly as others do. I have seen it — when the grain is washed, the dust comes away and the water turns muddy. Even so, at the machine mill and the oil press, other people's flour and oil come out with less left in them.
धनंजय को केवल बाग़ात और खेती का काम करने की धुन है। जब से मिचू (मिट्टू — ठा॰ मृत्युंजय सिंह) की असामयिक मृत्यु हुई, शुगर आदि की जाँच और परिश्रम स्वयं करने का काम उन्होंने अपने ऊपर ले लिया है। रात को पहरे के कारण प्रातः वायु सेवन नहीं कर पाते; जुताई-निराई आदि में खेतों में मज़दूर लगाते हैं और नौ बजे तक डटे रहते हैं — आजकल के मज़दूर तो काम ठीक नहीं करते।
Dhananjay has a passion for nothing but the orchard and the fields. Since the untimely death of Michu (Mittu — Th. Mritunjay Singh) he has taken upon himself the sugar tests and the hard work. Because of the watch kept at night he cannot get out for the morning air; at ploughing and weeding he puts labourers into the fields and stands over them till nine — the labourers of today do not do the work properly.
एक बार, जब चमार लोगों ने काम बन्द कर दिया और गोबर उठाने का संकट आया, तो मिचू ने एक आदमी को सपरिवार लाकर जानवरों की सेवा और गोबर उठाने के लिए रख दिया था।
Once, when the Chamars stopped work and there was a crisis over lifting the dung, it was Michu who brought a man with his family and set him to tend the animals and lift the dung.
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दादू वाणीशरीर, पुस्तकें, और अन्त
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अध्याय १२ / १२Chapter 12 of 12

शरीर, पुस्तकें, और अन्त

The Body, the Books, and the End
पृष्ठ २७–२८, ३३–४१ · १७–१८ सितम्बर २००४
जब मैं सर्विस में था तो गोंडा ज़िले में मुझे पहली बार वात-व्याधि का दौरा पड़ा। उपचार आयुर्वेदाचार्य ठा॰ विक्रम सिंह ने किया। यह रोग १९६२ में रिटायर होने तक समय-समय पर होता रहा — मगर भगवान की कृपा और यहाँ के वातावरण के कारण अब चला गया। अब कोई कष्ट नहीं होता।
While I was in service I had my first attack of rheumatic trouble, in Gonda district. Thakur Vikram Singh, the ayurvedacharya, treated it. The complaint came back from time to time until I retired in 1962 — but by God's grace and the air of this place it has gone. It gives me no trouble now.
दूसरी जानलेवा बीमारी मधुमेह थी। मैं बीमार होकर गणपति के पास लखीमपुर गया। वहाँ के डॉक्टरों ने मेरे बुख़ार और तगड़ी खाँसी की दवा की, और कहा कि यह मधुमेह की प्रारम्भिक अवस्था है — साथ ही टी॰बी॰ की सम्भावना भी बताकर चिंता बढ़ा दी।
The second illness that might have killed me was diabetes. I fell ill and went to Ganpati at Lakhimpur. The doctors there treated my fever and the heavy cough, and said it was the beginning of diabetes — and besides that raised the fear of tuberculosis, which added to my worry.
लहान (लल्लन — डॉ॰ जन्मजय सिंह) एम॰डी॰ का पहला वर्ष करके रेलवे सर्विस में पहुँच चुके थे; उनकी पहली पोस्टिंग बनारस के पूर्वोत्तर रेलवे के बड़े अस्पताल में हो गई थी। तार भेजा गया और हम दोनों प्राणी उन्हें ले गये। वहाँ सर सुन्दरलाल मेडिकल कॉलेज — जो महामना पं॰ मदन मोहन मालवीय के स्थापित हिन्दू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है — में जाँच कराई।
Lahan (Lallan — Dr. Janmajai Singh) had finished the first year of his MD and had entered the railway service; his first posting was to the great Northeastern Railway hospital at Banaras. A telegram was sent and the two of us took him there. At the Sir Sundarlal Medical College — attached to the Hindu University founded by Mahamana Pandit Madan Mohan Malaviya — we had the tests done.
संयोग से एक बंगाली सहायक सर्जन ने जाँच की, और लहान से कहा — तुमने मुझे पहचाना नहीं? मैंने भी वहीं एम॰डी॰ किया था। फिर बड़े डॉक्टर साहब को दिखाया गया; उन्होंने कहा कि बिगड़ी खाँसी है, टी॰बी॰ नहीं। और कहा — तुम्हारे पुत्र तो अस्पताल में हैं, दवा के लिए कुछ ख़र्च न करना होगा।
As it happened a Bengali assistant surgeon did the examination, and said to Lahan — don't you know me? I did my MD there myself. Then the senior doctor was consulted; he said it was a cough gone bad, and not tuberculosis. And he said — your son is here in the hospital, you will have nothing to spend on medicine.
प्रयोगशाला की जाँच में पेशाब में नाम मात्र की शुगर निकली। अस्पताल के डॉक्टर ने मुझे Guide for Diabetics नाम की पुस्तक दी, जिसे मैंने पढ़कर हृदयंगम कर लिया।
In the laboratory only a trace of sugar was found in the urine. The hospital doctor gave me a book called Guide for Diabetics, which I read and took to heart.
स्वस्थ होकर घर आने पर मैंने खेती और बाग़ात की तैयारी, बाज़ार और हिसाब के प्रबंध को समय दिया। प्रातः पौ फटते ही सीतापुर राजमार्ग तक लगभग तीन किलोमीटर — आना-जाना — दिन भर दोनों पहर की भाग-दौड़ से मेरा मधुमेह, जो जीवन पर्यन्त रहने वाला रोग है, दूर हो गया।
When I came home well again, I gave my time to the fields and the orchard, the market and the accounts. At first light I walked the three kilometres to the Sitapur highway and back; and with that going and coming at both ends of the day, my diabetes — a disease meant to last a lifetime — went away.
सीतापुर में चिकित्सक के पास, जहाँ लहान रेलवे डॉक्टर रहने से जाँच के लिए पेशाब ले जाया जाता था, प्रयोगशाला में जाँच कराते थे — और शकर का कोई अता-पता न मिलता था। तब तुमने सलाह दी कि अब तुम सब कुछ, शकर भी, ले सकते हो — मगर मैं कम ही शकर रखता हूँ। जाड़ों में तुलसी की पत्ती, काली मिर्च और गुरुच मिलाकर चाय पीता हूँ।
At Sitapur, where the urine used to be taken for testing because Lahan was the railway doctor, they had it examined in the laboratory — and no trace of sugar was ever found. Then you advised me that I could now take anything, sugar as well — but I still keep the sugar low. In the cold weather I take my tea with tulsi leaf, black pepper and giloy in it.
एक बार, बीमार होकर, मैंने इटौंजा रेलवे स्टेशन से लहान को ख़बर भेजी कि मैं सिधौली आ रहा हूँ। वहाँ पहुँचकर पौष्टिक चिकित्सा चली, मगर मेरी हिचकी बंद ही नहीं होती थी। आयुर्वेदिक अस्पताल तक गये, फिर भी रोक न हुई; पूरा शरीर उछलता था, बैठना दूभर हो गया।
Once, having fallen ill, I sent word to Lahan from Itaunja railway station that I was coming to Sidhauli. There a strengthening treatment was given, but my hiccups would not stop. We went as far as the ayurvedic hospital, and still they could not be checked; my whole body jerked with them and it became impossible even to sit.
मैंने लहान से कहा — अब तो शायद जान ही जाएगी। तब रेलवे की मालगाड़ियों की लदान जाँचने वाले एक सज्जन को फ़ोन पर सूचना दी गई। वह तुरन्त आने को कहकर बाज़ार गये, कुछ लाकर, घोंटकर पानी में तैयार करके पिला दिया — और हिचकी तुरन्त बन्द हो गई। आधे घंटे बाद फिर हुई; एक और दवा दी गई और वह भी चली गई।
I said to Lahan — now I think it will take my life. Then word was sent by telephone to a gentleman whose work was inspecting the loading of the railway's goods trains. He said he would come at once, went to the bazaar, brought something, ground it, prepared it in water and gave it to me — and the hiccups stopped instantly. Half an hour later they came again; another dose was given and they went for good.
उनके एक परिचित, जो वहाँ से सात मील पर शाहजहाँपुर में व्यापारी थे, आते-जाते रहे। उन्हीं दिनों मुझे ले जाकर मेरा प्राण बचा और बीमारी का निवारण हुआ। चार बजे अनार का रस आ गया था
An acquaintance of his, a trader at Shahjahanpur seven miles off, kept coming and going. In those days they took me and my life was saved and the illness cured. At four o'clock pomegranate juice had been brought.
सन् १९९४ ई॰ में मैं निजी काम से सीतापुर गया। ट्रेन से उतरकर, हल्की बूँदाबाँदी के कारण कुछ देर रुका। मेरी आदत यह थी कि कम से कम मैं दूसरी सवारी के साथ रिक्शे पर नहीं जाता था — मगर मजबूरी हुई तो रिक्शे पर बैठा, और व्यक्ति और व्यक्तित्व को देखकर ज़्यादा सतर्क होकर बैठा।
In 1994 I went to Sitapur on private business. Getting down from the train, I waited a while because of a light drizzle. It had been my rule never to share a rickshaw with a second passenger — but compelled that day I sat in one, and sat with extra care, having taken the measure of the man and his manner.
एक होम्योपैथी स्टोर पर दवा देने का पर्चा लिखकर दे दिया कि लौटते समय मूल्य देकर, लेकर स्टेशन जाऊँगा। दुकान के सामने टेलीग्राम विभाग ने नाली खोद रखी थी; उसमें पानी था। रिक्शे वाले ने कहा — बाबू जी, तुम इसे पार न कर पाओगे। अतः मैं रिक्शे से उतरा, किसी का सहारा लेकर
At a homeopathy store I wrote out a prescription and left it, saying that on the way back I would pay and collect it and go on to the station. In front of the shop the telegraph department had dug a trench; there was water in it. The rickshaw-wallah said — Babu ji, you will not get across this. So I got down from the rickshaw, taking someone's support —
तभी पहिया नाली में चला गया, रिक्शा एक ओर झुका और मैं दाहिनी ओर लुढ़ककर गिर गया। दुकान वालों ने उठाया। एक चोट लग गई। पूरा शरीर भीग गयामैंने कपड़े धोकर पहने और गीले कपड़े सुखाने को फैला दिये। थोड़ी देर बाद दर्द हुआ; स्नान करके बाज़ार से दवा मँगाकर लगाई, जिससे आराम मिला। मगर फिर अगले दिन उठा न जाता था, और गर्दन मुड़ती न थी।
and just then the wheel went into the trench, the rickshaw tipped to one side and I rolled off to the right and fell. The shopkeepers picked me up. I was hurt. My whole body was soakedI washed my clothes and put them on, and spread the wet ones out to dry. After a while the pain came; having bathed, I sent to the bazaar for something and rubbed it in, and got some relief. But by the next day I could not get up, and my neck would not turn.
परेशान होकर मैं डॉक्टर के पास न जाकर उस आदमी के पास गया जिसने सड़क के किनारे तख़्त रखकर, स्वयं चाय बनाकर लोगों को पिलाता था। अस्पताल पास में ही था।
In my trouble I did not go to the doctor. I went instead to the man who had set a takht by the roadside and made tea himself and served it to people. The hospital was close by.
वह तख़्त पर बैठा था। मेरी बात सुनकर, उसने हाथ से पहचाना और ताड़ गया कि गर्दन की नस टल गई है। उसने बार-बार गर्दन को घुमाकर ठीक कर दिया।
He was sitting on the takht. Hearing what had happened, he felt it with his hand and knew at once that a nerve in the neck had slipped. He turned the neck again and again and set it right.
मैंने डेढ़ रुपया दिया। वह किसी से माँग नहीं करता था — जो देता, ले लेता था। उसने बताया कि सड़क के पास एक आदमी है जो पत्ते में दवा रखता है; उसने दवा देकर कहा — इसे गुनगुना करके मालिश करना, फिर सहजन के पत्ते पर रखकर गर्दन पर पट्टा बाँध देना। और कहा — अगर कष्ट रहे तो आ जाना।
I gave him one and a half rupees. He asked nothing of anybody — what was given he took. He told me that near the road there was a man who kept a preparation in leaves; he gave me the medicine and said — warm it and rub it in, then lay it on a drumstick leaf and bandage it to the neck. And he said — if the pain remains, come back.
मैंने यह सब किया और पूरा आराम हो गया। आज भी उस जोड़ पर दर्द होता है, ख़ास कर तेज़ चलने पर।
I did all this and completely recovered. To this day that joint aches, especially when I walk fast.
पत्नी की मृत्यु के बाद मैंने वेद, शास्त्र, उपनिषद और कल्याण १९३५ से पढ़े; स्वामी दयानन्द सरस्वती और तुलसीदास की रचित पुस्तकें; स्वामी रामतीर्थ के उपदेश; प्रयागराज में राजा साहब की गीता, शंकराचार्य के भाष्य सहित; और अंग्रेज़ों के कारागार में लिखा गीता रहस्य। भर्तृहरि का शृंगार शतक, वैराग्य शतक और नीति शतक भी। आयुर्वेद की चरक संहिता, शारंगधर और भाव प्रकाश भी पढ़े।
After my wife's death I read the Vedas, the shastras, the Upanishads, and Kalyan from 1935 onwards; the works of Swami Dayanand Saraswati and of Tulsidas; the discourses of Swami Ramtirth; the Raja Sahab's Gita at Prayagraj, with Shankaracharya's commentary; and the Gita Rahasya, written in an English jail. Bhartrihari's Shringar Shatak, Vairagya Shatak and Niti Shatak as well. In Ayurveda, the Charak Samhita, the Sharangdhar, and the Bhav Prakash.
सभी पुस्तकालय में हैं। एक छोटे रजिस्टर में नंबर लगाकर अलग-अलग दर्ज कर दिया है, जिससे तलाश करने में आसानी होती है।
They are all in the library. I have entered them separately in a small register under numbers, which makes them easy to find.
एक और घटना — मद्रास जाकर सागर, मछुआरों और समुद्री मालवाहक जहाज़ों को देखने का अवसर मिला। इस इच्छा से गया कि रामेश्वरम और विवेकानन्द की मूर्ति, जो समुद्र में किनारे के निकट दिखाई देती है, वह देखने की लालसा पूरी हो। मगर केवल समुद्र और जहाज़ आदि का ही देखने का मौक़ा मिला — लहान की जाँच दो दिन बाद डॉक्टर ने बताई और वापस कर दिया।
One more thing — I had the chance to go to Madras, and to see the sea, and the fishermen, and the cargo ships. I went with the wish to satisfy a longing: to see Rameshwaram, and the Vivekananda statue that can be seen standing off the shore in the sea. But I got to see only the sea and the ships — Lahan's examination was reported by the doctor two days later and we were sent back.
वहाँ होटल और रेलवे का भोजन तो सबको मिल गया, मगर मैं दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी के लिए तरस रहा था। संयोगवश बिहार के एक समाजसेवी सड़क पर मिल गये, और उन्होंने अपने क्वार्टर में दाल-चावल का भोजन कराया।
There the hotel and the railway food came to everyone, but I was aching for dal, rice, roti and vegetables. As it happened I met a social worker from Bihar on the road, and he fed me dal and rice in his own quarters.
वापस लखनऊ आये। लहान को बुख़ार आया; रेलवे अस्पताल, नागपुर को फ़ोन पहुँचा तो रेलवे के डॉक्टर और कम्पाउंडर दवाइयाँ लेकर आ गये। नागपुर के हरे-भरे संतरे के बाग़ों का आनंद लेकर आ गये। मैं वहाँ भी बीमार हुआ — हिचकी भी शुरू हुई, दवा से ठीक होकर आ गया।
We came back to Lucknow. Lahan took fever; a telephone call reached the railway hospital at Nagpur and the railway doctor and compounder came with medicines. We came away having enjoyed the green orange orchards of Nagpur. There too I fell ill — the hiccups started again, and medicine set it right and we came home.
अब मैंने धनंजय से कह दिया है कि वह गणपति के लिखे Family Settlement के अनुसार अपनी सेवा का पाँचवाँ भाग, कृषि-वर्ष के अनुसार पूरा हिसाब रखकर, जो बचत होती है, ले लिया करें।
I have now told Dhananjay that, in accordance with the Family Settlement that Ganpati wrote, he should keep the full accounts by the agricultural year and take a fifth part for his service out of whatever is saved.
मेरा यह अनुमान कि परिवार का कोई न कोई मेरी सेवा करेगा — ठीक निकला। धनंजय की पत्नी ने तो सेवा की पराकाष्ठा कर दी। और धनंजय को, चार किलोमीटर दूर क़स्बे में डॉक्टरी से वंचित होकर, संयुक्त परिवार की जायदाद — खेती, बाग़ात आदि — में मज़दूर-सी सेवा करनी पड़ रही है।
My reckoning that someone in the family would care for me has proved right. Dhananjay's wife has carried that care to its furthest point. And Dhananjay himself, giving up his practice in the town four kilometres off, has had to labour on the joint family's property — the fields, the orchards and the rest — like a hired man.
मेरी पत्नी की सेवा को तो आदर्श ही कहा जायगा। उन्होंने तुम्हारी माता की भी सेवा गणपति के स्वर्गवास पर की। वह गृह-वाटिका से तरकारी लाकर, काटकर, चूल्हे की कड़ाही पर बना देती थीं — जो स्वादिष्ट होने के साथ लौह तत्व को भी पूरा करती रहीं। संयोगवश मृत्यु के समय वह लखनऊ के मकान पर थीं।
The service my own wife gave must be called an ideal. She cared for your mother too, after Ganpati's death. She would bring the vegetables in from the kitchen garden, cut them, and cook them in the pan on the hearth — food that was not only good to eat but kept up the iron in the blood. As it happened she was at the Lucknow house when the end came.
पुराने नौकर माताप्रसाद, जो तुम्हारे नाना के मकान पर दस रुपये मासिक और भोजन आदि की निजी सुविधा पर थे — उनको भी भइया (ठा॰ भारत सिंह) देखते रहे। चक्रपाल डाकघर से रिटायर होने पर ब्रांच पोस्टमास्टर बने; भइया ने कहा कि उनको भी बीस रुपये दे दिया करो, ताकि तम्बाकू आदि जो वह सेवन करते थे उससे वंचित न हों। संयोगवश वह भोग छोड़कर, भइया की मृत्यु के ठीक सत्ताईसवें दिन जीवन लीला समाप्त कर गये। यह संयोग ही तो है कि उनका जन्म भी भइया के ही दिन हुआ था।
Our old servant Mataprasad, who was at your grandfather’s house on ten rupees a month with food and such personal comforts — Bhaiya (Th. Bharat Singh) looked after him too. Chakrapal, on retiring from the post office, became a branch postmaster; Bhaiya said, give him twenty rupees as well, so that he is not deprived of the tobacco and the rest that he used. As it happened he gave up that habit, and ended his life on the twenty-seventh day exactly after Bhaiya’s death. And it is coincidence indeed that he had been born on the very day Bhaiya was.
उन्होंने मरते समय अपने बड़े लड़के को विधवा और पोतों की देखरेख का भार सौंपा था; उसका निर्वहन मैं कर रहा हूँ — आर्थिक सहायता देकर, और उनकी इच्छा को मरते दम तक पूरा करते हुए।
At his death he had laid on his eldest son the charge of looking after the widow and the grandchildren; I am discharging it — giving financial help, and carrying out his wish to my last breath.
दूसरी जानलेवा बीमारी सन् २००१ के सितम्बर मास में हुई। फ़ोन द्वारा सूचना पाकर बादशाहनगर के डिवीज़नल रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया गया। कई दिन बाद जब होश आया तो डॉक्टरों ने चौबीसों घंटे देखभाल के बाद चिंता मुक्त किया कि अब जीवनदान मिलेगा। यह वही रोग था जिससे बाबा साहब अस्पताल में परलोक सिधार गये थे। यह प्राणदान मुझे आज स्वस्थ जीवन दिला रहा है।
The second illness that nearly took me came in September 2001. On a telephone message I was admitted to the divisional railway hospital at Badshahnagar. When I came to myself some days later, the doctors, after round-the-clock attendance, set my mind at rest and said that life was given back to me. It was the same illness of which Baba Sahab had died in hospital. That gift of life is what keeps me in health today.
उन्हीं दिनों मेरे पैरों में धीरे-धीरे कमज़ोरी आ गई और बिना दूसरे के सहारे चलना कठिन हो गया। प्रातःकाल सहारा देकर उठाया जाता है; ऊपर जीने से चढ़कर, दो लोग सहारे टहलाकर ले जाते हैं। होम्योपैथी की दवा से कुछ रुक गया।
In those same days weakness came slowly into my legs and walking without another's support became difficult. In the morning I am helped up; going up by the stairs, two people walk me about with support. A homeopathic medicine has checked it somewhat.
टहलाकर, बिना आराम किये नीचे आकर अपना गीता पाठ और कल्याण का पढ़ना करता हूँ, और आठ बजे नाश्ता करता हूँ।
After the walk, without resting, I come down, do my reading of the Gita and of Kalyan, and take my breakfast at eight.
अब लेखनी को विश्राम दे रहा हूँ। आगे की जीवनी मरने तक तुम लिख सकते हो। अब तक सभी पोते-परपोते जो पढ़कर निकले हैं — शायद भविष्य में वे भी किसी तरह अपने पैरों पर खड़े हों।
Now I give the pen its rest. The rest of this life, up to my death, you may write yourself. All the grandsons and great-grandsons who have come out of their studies by now — perhaps in time they too will find their feet.
आज शायद और कुछ नहीं सूझा। जीवनी समाप्त की।
Today nothing else comes to mind. I have finished the life.
अब आगे कोई बात मेरे स्मरण में बाक़ी नहीं है।
There is nothing further left in my memory now.
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दादू वाणीशब्दार्थ
शब्दार्थ · Glossary

शब्द और उनके अर्थEvery word explained, in one place

Every note in the book, gathered alphabetically. In the chapters these words carry a dotted underline — rest on one and its meaning appears without a click.

आना और पैसा / Anna and paisaअध्याय ६ · घुड़साल वाली कोठरी

एक रुपया = सोलह आने; एक आना = चार पैसे। दशमलव प्रणाली आने से पहले यही चलन था। एक पैसे में एक समय के भोजन की लकड़ी आती थी।

Sixteen annas to the rupee, four paise to the anna — the currency until decimalisation in the late 1950s. One paisa bought the firewood for a meal.

आर्य समाज / Arya Samajअध्याय ८ · सन् उन्नीस सौ उनतालीस

स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा १८७५ में स्थापित सुधारवादी आंदोलन, जिसने विधवा पुनर्विवाह, जाति-भेद के विरोध और स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया। लेखक के इस निर्णय की वैचारिक जड़ यहीं है।

The reformist movement founded by Swami Dayanand Saraswati in 1875, which argued for widow remarriage, against caste distinction, and for the education of women. This is the intellectual root of the position the author takes here.

एक हज़ार, नौ नहीं / One thousand, not nineअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

हस्तलेख में यहाँ "९ हजार" लिखा है, पर उसी वाक्य का हिसाब उसे काटता है — सात सौ बताकर तीन सौ हड़पना एक हज़ार पर ही बैठता है, नौ हज़ार पर नहीं। परिवार के सुधार पर यहाँ "एक हज़ार" रखा गया है। मूल अंक भाग दो की प्रतिलिपि में ज्यों का त्यों देखा जा सकता है।

The hand here reads "9 thousand", but the arithmetic of the same sentence contradicts it — reporting seven hundred and pocketing three hundred adds to one thousand, not nine. On the family’s correction the figure is set as one thousand. The original digit can be seen as it stands in the Part Two transcript.

कच्चा और पक्का भोजनअध्याय ३ · बारह गाँव और बिरादरी

कच्चा = जल में पका भोजन, जिसे जाति-नियम में सबसे संवेदनशील माना जाता था; पक्का = घी में तला भोजन, जिसे व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता था। इसी भेद पर पूरा सामाजिक दर्जा टिका था।

Kachcha food is boiled in water and was the most caste-sensitive of all; pakka is fried in ghee and was far more widely accepted. An entire social hierarchy rested on that distinction — which is why refusing kachcha food from a house was the sharpest statement of rank available.

कल्याण / Kalyanअध्याय १२ · शरीर, पुस्तकें, और अन्त

गीता प्रेस, गोरखपुर की मासिक धार्मिक पत्रिका, १९२६ से प्रकाशित। लेखक १९३५ से इसके अंक पढ़ते आये — यानी लगभग सत्तर वर्ष।

The monthly religious magazine of the Gita Press, Gorakhpur, published since 1926. The author read it from 1935 — that is, for some seventy years.

क़ायम-मुक़ाम / Qayam-muqamअध्याय ७ · बीस रुपये महीना

किसी पद पर अस्थायी या कार्यवाहक नियुक्ति।

Officiating — holding a post temporarily in another's place.

कानूनगो / Kanungoअध्याय ७ · बीस रुपये महीना

राजस्व विभाग का वह अधिकारी जो कई पटवारियों के ऊपर होता है और भूमि-अभिलेखों की जाँच व रखरखाव करता है। सुपरवाइज़र कानूनगो एक पूरे सर्किल का प्रभारी होता है। यही लेखक का पहला पद था — पैंतीस रुपये मासिक पर।

The revenue officer set over a group of patwaris, responsible for checking and maintaining the land records. A Supervisor Kanungo had charge of a whole circle. This was the author's first appointment, at thirty-five rupees a month.

कुर्सी / Kursi (plinth)अध्याय ६ · घुड़साल वाली कोठरी

भवन का उठा हुआ आधार। लखनऊ जैसे बाढ़-प्रवण शहर में ऊँची कुर्सी हैसियत और व्यावहारिक सुरक्षा दोनों का चिह्न थी।

The raised platform a building stands on. In a flood-prone city like Lucknow a high plinth was at once a mark of standing and a practical protection.

कोस / Kosअध्याय ४ · पाँच बाबा, और पिताजी

लगभग दो मील की पुरानी माप। नौ दिन चले अढ़ाई कोस — अत्यंत धीमी गति के लिए कहावत।

An old unit of roughly two miles. The proverb — nine days' travel to cover two and a half kos — is the standard expression for painfully slow going.

क्षत्रिय सभा / Kshatriya Sabhaअध्याय ८ · सन् उन्नीस सौ उनतालीस

बीसवीं सदी के आरम्भ की जाति-सुधार संस्थाओं में से एक। राजस्थान के मुस्लिम बन चुके क्षत्रियों को वापस सम्मिलित करने का प्रस्ताव उस समय के लिए असाधारण रूप से आगे का क़दम था — और उसे पारित कराने वाले लेखक के पिता थे।

One of the caste-reform bodies of the early twentieth century. A resolution to readmit Rajasthani Kshatriyas who had become Muslim was, for its moment, an extraordinarily forward step — and it was the author's father who carried it.

गीता रहस्य / Gita Rahasyaअध्याय १२ · शरीर, पुस्तकें, और अन्त

बाल गंगाधर तिलक द्वारा मांडले (बर्मा) के कारागार में १९१०–११ में लिखा गीता-भाष्य। लेखक इसे केवल अंग्रेज़ों के कारागार में लिखा कहकर पहचानते हैं।

Bal Gangadhar Tilak's commentary on the Gita, written in Mandalay jail in Burma in 1910–11. The author identifies it simply as the one "written in an English jail".

गुरुच / Giloyअध्याय १२ · शरीर, पुस्तकें, और अन्त

गिलोय (Tinospora cordifolia) — आयुर्वेद की एक प्रसिद्ध औषधीय लता।

Giloy, or Tinospora cordifolia — a well-known medicinal creeper in Ayurveda.

गोबर गैस / Gobar gasअध्याय ११ · गाँव, अब

गोबर से बनने वाली बायोगैस — १९७० और ८० के दशक में ग्रामीण भारत की एक प्रमुख विकास योजना। लेखक के घर के हाते में यह संयंत्र लगा था।

Biogas produced from cattle dung — a flagship rural development scheme of the 1970s and 80s in India. There was such a plant in the yard of the author's house.

गोलागंज की कोठी / The Golaganj houseअध्याय ६ · घुड़साल वाली कोठरी

लखनऊ में मिश्र परिवार की हवेली, जो सिंहामऊ क्षेत्र के ज़मींदार थे। इसी परिवार के पं॰ लक्ष्मीशंकर मिश्र आगे चलकर हैदराबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हुए — और अध्याय ९ में उन्हीं के सामने लेखक बाग़ ख़रीदने खड़े होते हैं।

The Lucknow town house of the Mishra family, landlords of the Singhamau area. A member of that same family, Pandit Lakshmishankar Mishra, later became Chief Justice of the Hyderabad High Court — and it is before him that the author stands, in Chapter 9, to buy an orchard.

गौना / Gaunaअध्याय ५ · तख़्ती और सरकंडे की क़लम

विवाह के कुछ समय बाद की वह रस्म, जिसके बाद वधू पहली बार ससुराल में रहने आती है।

The ceremony, some time after the wedding itself, at which the bride first comes to live in her husband's household.

चट्टी / Chattiअध्याय ४ · पाँच बाबा, और पिताजी

पहाड़ी तीर्थमार्ग पर पड़ाव — भोजन और रात बिताने की जगह, प्रायः एक दिन की पैदल दूरी पर।

A staging post on the hill pilgrimage routes — a place to eat and spend the night, set roughly a day's walk apart.

चबेना / Chabenaअध्याय ५ · तख़्ती और सरकंडे की क़लम

भुना हुआ चना या ज्वार — खेत और स्कूल दोनों के लिए दोपहर का सूखा भोजन, कपड़े में बाँधकर ले जाया जाता। पका हुआ दोपहर का भोजन प्रश्न ही नहीं था।

Parched gram or jowar — the dry midday meal of both field and schoolroom, carried tied in a cloth. There was no question of a cooked lunch.

चमार और पासी / Chamar and Pasiअध्याय ५ · तख़्ती और सरकंडे की क़लम

उत्तर प्रदेश के दो दलित समुदाय। लेखक का यह उल्लेख — कि उन्होंने १९३०–४० के दशक में इन बच्चों को पढ़ाया, और अब वही समुदाय जवार में सबसे आगे है — इस पूरे दस्तावेज़ में सामाजिक बदलाव का सबसे सीधा दर्ज प्रमाण है, और वह उसे बिना किसी टिप्पणी के दर्ज करते हैं।

Two Dalit communities of Uttar Pradesh. The author's note — that he taught these boys in the 1930s and 40s, and that the same community now stands first in the neighbourhood — is the plainest record of social change anywhere in this document, and he sets it down without comment.

चीतू पाण्डेय / Chitu Pandeyअध्याय १० · रियासतें

बलिया के स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने अगस्त १९४२ के आंदोलन में कुछ दिनों के लिए ज़िले का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया था — बलिया का शेर। लेखक पृष्ठ १७ पर इसका उल्लेख करते हैं।

The freedom fighter of Ballia who, during the August 1942 movement, took over the administration of the district for some days — the "Lion of Ballia". The author refers to this on page 17 of the manuscript.

छठी / Chhathiअध्याय ८ · सन् उन्नीस सौ उनतालीस

जन्म के छठे दिन की रस्म, जब शिशु को पहली बार परिवार और समाज के सामने लाया जाता है। दूसरी पुत्री की मृत्यु ठीक उसी दिन हुई।

The ceremony on the sixth day after a birth, when the child is first brought before the family and the community. The second daughter died on exactly that day.

जवार / Jawarअध्याय ३ · बारह गाँव और बिरादरी

आसपास के गाँवों का समूह — वह क्षेत्र जिसके भीतर विवाह-सम्बन्ध चलते और सामाजिक मान्यता मिलती थी।

The cluster of surrounding villages — the effective world within which marriages were arranged and social standing was recognised.

ज़मींदारी उन्मूलन / Abolition of zamindariअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, १९५०। इसी के बाद मिश्र परिवार जैसी बड़ी ज़मींदारियाँ अपनी सम्पत्ति बेचने लगीं — और इसी दरार से लेखक जैसा एक सेवानिवृत्त तहसीलदार वह बाग़ ख़रीद सका जो अन्यथा कभी उसका न होता।

The UP Zamindari Abolition and Land Reforms Act, 1950. It was in its wake that great landholding families like the Mishras began to sell — and through that opening a retired Tehsildar could buy an orchard he could never otherwise have owned.

जागीर / Jagirअध्याय २ · धारानगरी से सिंहामऊ

सेवा के बदले दी गई भूमि, जिसका लगान जागीरदार वसूलता था।

A grant of land made in return for service, whose revenue the grantee was entitled to collect.

जिलेदार / Ziladarअध्याय ६ · घुड़साल वाली कोठरी

ज़मींदारी के एक हिस्से का प्रबंधक — लगान वसूली और देखरेख का ज़िम्मेदार कर्मचारी। शिवपाल माली इसी पद पर थे, और उन्हीं के हाथ में उस कोठरी की चाबी थी।

The manager of one division of a landed estate, responsible for rent collection and supervision. Shivpal the gardener held that post — and with it the key to the room.

डेरा / Deraअध्याय ७ · बीस रुपये महीना

दौरे पर निकले अधिकारी का अस्थायी शिविर। राजस्व अधिकारी फ़सल के मौसम में हफ़्तों गाँव-गाँव डेरा डालते हुए चलते थे।

The touring officer's temporary camp. Revenue officers spent weeks at a time moving from village to village in the harvest seasons, camping as they went.

तकावी / Taqaviअध्याय ४ · पाँच बाबा, और पिताजी

किसानों को बीज और खेती के लिए दिया जाने वाला सरकारी नक़दी ऋण, जो राजस्व विभाग के ज़रिये बाँटा जाता था — इसलिए ग़बन की गुंजाइश भी वहीं बनती थी।

A government cash loan to cultivators for seed and cultivation, distributed through the revenue department — which is also where the opportunity to embezzle it lay.

तख़्त / Takhtअध्याय १२ · शरीर, पुस्तकें, और अन्त

लकड़ी का चौड़ा तख़्तनुमा आसन, जो दुकान, चायख़ाने या बैठक में बैठने और काम करने के लिए रखा जाता है। सड़क किनारे का यह चायवाला वहीं बैठकर हड्डी बैठाने का काम भी करता था।

A broad wooden platform-seat, kept in a shop, a tea stall or a sitting room for sitting and working on. The roadside tea-seller set bones from his.

तख़्ती / Takhtiअध्याय ५ · तख़्ती और सरकंडे की क़लम

लकड़ी की लिखने की पटरी, जिस पर मुल्तानी मिट्टी चढ़ाकर काँच से घोटा जाता था; सूखने पर स्याही से लिखा जाता, फिर धोकर दोबारा तैयार किया जाता। यही गाँव के स्कूल की पुनः प्रयोग होने वाली कॉपी थी।

A wooden writing board, coated with fuller's earth and burnished with glass until it shone. Once dry it was written on in ink, then washed and prepared again — the reusable notebook of a village school.

तहसीलदार / Tehsildarअध्याय १ · पत्र

ब्रिटिश और स्वतंत्र भारत की राजस्व व्यवस्था में एक तहसील का प्रमुख अधिकारी — लगान वसूली, भूमि अभिलेख और प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के अधिकार। यही लेखक का अंतिम पद था।

The chief revenue officer of a tehsil, or sub-district, in the British and later Indian administration — responsible for land revenue collection, land records, and holding first-class magistrate's powers. This was the author's final rank.

तिलक / Tilakअध्याय ३ · बारह गाँव और बिरादरी

विवाह से पूर्व की सगाई की रस्म, जिसमें वधू-पक्ष वर के घर जाकर भेंट देता है।

The betrothal ceremony, at which the bride's family visits the groom's house with gifts.

थानापति / Thanapatiअध्याय ३ · बारह गाँव और बिरादरी

मूल जागीर की एक शाखा का मुखिया — वह वंश-रेखा जिसे एक थान या ठिकाना मिला हो। लेखक स्वयं को इसी वर्ग में रखते हैं, राजघराने से अलग।

The head of a branch of the original grant — the line that held one "than" or seat. The author places his own family in this class, distinct from the ruling house.

दादा / Dadaअध्याय ४ · पाँच बाबा, और पिताजी

इस पत्र में लेखक अपने पिता को दादा कहते हैं — अवधी क्षेत्र में यह पिता के लिए प्रयुक्त सम्बोधन है, पितामह के लिए नहीं। वंशावली पढ़ते समय यह ध्यान रखना ज़रूरी है।

Throughout this letter the author calls his own father "Dada". In this part of Awadh that word addresses one's father, not one's grandfather — a point worth holding on to when reading the genealogy.

दालान / Dalanअध्याय ६ · घुड़साल वाली कोठरी

आँगन की ओर खुलने वाला स्तम्भयुक्त कक्ष — उत्तर भारतीय हवेली की मुख्य बैठक।

A pillared hall opening onto the courtyard — the principal reception space of a north Indian haveli.

धनंजय / Dhananjayअध्याय ११ · गाँव, अब

महेश्वर सिंह के पुत्र (जन्म १९४४) — अर्जुन सिंह के भतीजे, पौत्र नहीं। चार किलोमीटर दूर क़स्बे में डॉक्टरी छोड़कर गाँव में रहे और संयुक्त परिवार की खेती-बाग़ात तथा लेखक की सेवा सँभाली। पत्र के अंतिम पृष्ठों की केन्द्रीय आकृति। उनकी पत्नी — जिनके लिए लेखक ने लिखा कि उन्होंने सेवा की पराकाष्ठा कर दी — वंशावली में सत्यभामा सिंह दर्ज हैं।

Dhananjai Singh, born 1944, son of Maheshwar Singh — the author's NEPHEW, not his grandson. He gave up his medical practice in the town four kilometres away to stay in the village, run the joint family's fields and orchards, and care for the author. He is the central figure of the closing pages. His wife — of whom the author writes that she carried that care to its furthest point — is recorded in the family tree as Satya Bhama Singh.

धर्मा सिंह / Dharma Singhअध्याय ८ · सन् उन्नीस सौ उनतालीस

लेखक की पत्नी, जिनकी मृत्यु १९३९ में हुई — जिस तार ने उन्हें तरबगंज में पाया। पूरी पांडुलिपि में लेखक उनका नाम एक बार भी नहीं लिखते; वे सदा 'पत्नी' हैं। वंशावली में उनका नाम धर्मा सिंह दर्ज है।

The author's wife, who died in 1939 — the death the telegram carried to him at Tarabganj. In the whole manuscript he never once writes her name; she is always simply "my wife". The family tree records her as Dharma Singh.

ध्रुव और उत्तानपाद / Dhruva and Uttanapadaअध्याय ८ · सन् उन्नीस सौ उनतालीस

पुराण-कथा: राजा उत्तानपाद की दूसरी रानी ने पहली रानी के पुत्र ध्रुव को पिता की गोद से उतार दिया; ध्रुव तपस्या को वन चले गये और ध्रुवतारा बने। लेखक कहते हैं कि दूसरा विवाह न करने का निर्णय उन्होंने इसी कथा को सामने रखकर लिया।

From the Puranas: King Uttanapada's second queen pushed Dhruva, the son of his first, from his father's lap; the boy went to the forest to perform austerities and became the pole star. It is this story, the author says, that he set before himself when he decided not to remarry.

नामों का सुधार / Names corrected by the treeअध्याय ४ · पाँच बाबा, और पिताजी

पारिवारिक वंशावली से दो नाम स्पष्ट हुए, जो हस्तलेख में अस्पष्ट थे: ठा॰ शारदा बख़्श सिंह (हस्तलेख में 'शारदाबरन' पढ़ा गया) और ठा॰ लालता बख़्श सिंह। वंशावली यह भी पुष्टि करती है कि चाँदी सिंह के पाँच पुत्र थे — बलदेव, रामदयाल, शिवदयाल, शिवमंगल और शिवराज — ठीक वैसे ही जैसे लेखक ने गिनाये हैं। रामदयाल सिंह लेखक के पितामह थे, पिता नहीं; पिता गुरुबख्श सिंह थे।

Two names the manuscript left ambiguous are settled by the family tree: Thakur Sharda Baksh Singh (read in the hand as "Shardabaran") and Thakur Lalta Baksh Singh. The tree also confirms that Chandi Singh had five sons — Baldev, Ramdayal, Shivdayal, Shivmangal and Shivraj — exactly as the author lists them. Ramdayal Singh was the author's grandfather, not his father; his father was Gurubaksh Singh.

पंडे और उनकी बही / Pandas and their ledgersअध्याय ४ · पाँच बाबा, और पिताजी

तीर्थस्थलों के वंशानुगत पुरोहित, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी यात्रियों की वंशावली अपनी बहियों में दर्ज करते आये हैं। भारत में वंश-अभिलेख का यह सबसे पुराना निरंतर रूप है — परिवार आज भी अपनी प्रविष्टियाँ वहाँ खोज सकता है।

The hereditary priests at pilgrimage sites, who for generations have recorded each pilgrim's lineage in their ledgers. These are among the oldest continuous genealogical records in India — and a family can often still find its own entries.

पंवार / Panwar (Parmar)अध्याय २ · धारानगरी से सिंहामऊ

राजपूतों का एक वंश, जिसकी उत्पत्ति मध्य प्रदेश के धार (धारानगरी) से मानी जाती है। यही लेखक का अपना वंश है, और आज परिवार यही उपनाम रखता है।

A Rajput clan tracing its origin to Dhar in Madhya Pradesh. This is the author's own lineage — and the surname the family carries today.

पटवारी / Patwariअध्याय ५ · तख़्ती और सरकंडे की क़लम

गाँव का भूमि-अभिलेख रखने वाला सबसे निचला राजस्व कर्मचारी। लेखक की अपनी नौकरी इसी सीढ़ी के ऊपर के पायदानों पर बीती।

The village-level record keeper, the lowest rung of the revenue service. The author's own career was spent on the rungs immediately above this one.

पयाल / Payalअध्याय ६ · घुड़साल वाली कोठरी

धान की पुआल, जो जाड़े में फ़र्श पर बिछाई जाती थी।

Rice straw, spread on the floor for warmth in the cold weather.

पेंशन की बिक्री / Commutation of pensionअध्याय ७ · बीस रुपये महीना

सेवानिवृत्ति पर पेंशन के एक भाग के बदले एकमुश्त नक़द राशि लेना। लेखक के रिटायर होने के वर्ष यह अनिवार्य था — इसीलिए उनकी मासिक पेंशन १६७ से घटकर १२५ रुपये रह गई।

Taking a lump sum at retirement in exchange for surrendering part of the monthly pension. In the year the author retired it was made compulsory — which is why his monthly pension fell from 167 rupees to 125.

पेशकार / Peshkarअध्याय ७ · बीस रुपये महीना

तहसीलदार का पाठक और सहायक — वह अधिकारी जो मुक़दमे की फ़ाइलें और आदेश पेश करता है। दौरे पर वह साथ चलता था।

The Tehsildar's reader and assistant — the officer who put up the case files and orders before him. On tour he travelled with him.

प्रधान / Pradhanअध्याय ११ · गाँव, अब

ग्राम पंचायत का निर्वाचित मुखिया। लेखक विशेष रूप से यह दर्ज करते हैं कि चेक से भुगतान होने से ग़रीबों का शोषण रुका — नक़दी के बीच में ठेकेदार और बिचौलिये खा जाते थे।

The elected head of the village council. The author notes particularly that paying by cheque stopped the poor being cheated — where cash passed through intermediaries, much of it did not arrive.

प्रिवी पर्स / Privy Purseअध्याय १० · रियासतें

विलय के बदले पूर्व शासकों को दी जाने वाली वार्षिक राशि। १९७१ में संविधान संशोधन द्वारा समाप्त कर दी गई।

The annual payment made to former rulers in exchange for accession. It was abolished by constitutional amendment in 1971.

बंदोबस्त / Bandobastअध्याय ३ · बारह गाँव और बिरादरी

ब्रिटिश भूमि-बन्दोबस्ती — जिसमें हर गाँव की सीमा, स्वामित्व और लगान की दर स्थायी रूप से अभिलिखित की गई। अवध में यह १८५६ के बाद हुआ, और इसी ने बहुत से पुराने अधिकार समाप्त कर दिये — जैसे इस परिवार के।

The British land settlement — the survey and permanent recording of every village's boundary, ownership and revenue demand. In Awadh this followed the annexation of 1856, and it extinguished a great many older claims, as it did this family's.

बखारी / Bakhariअध्याय ११ · गाँव, अब

मिट्टी या बाँस का बड़ा अनाज भंडार, जो घर के भीतर रखा जाता है।

A large grain store of mud or bamboo, kept inside the house.

बयाना और बैनामा / Bayana and bainamaअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

बयाना — सौदा पक्का करने के लिए दी गई अग्रिम राशि; बैनामा — विक्रय-विलेख।

Bayana is the earnest money that fixes a bargain; bainama is the deed of sale itself.

बाबा साहब / Baba Sahebअध्याय १२ · शरीर, पुस्तकें, और अन्त

परिवार इसे डॉ॰ भीमराव आम्बेडकर के अर्थ में पढ़ता है, और जिस रोग की बात है वह मधुमेह है। आम्बेडकर १९४८ से मधुमेह से पीड़ित थे; पैरों में स्नायु-पीड़ा रहती थी, इंसुलिन और होम्योपैथी दोनों चलती थीं, दृष्टि क्षीण हो चली थी, और १९५४ में जून से अक्टूबर तक वे शय्याग्रस्त रहे। ६ दिसम्बर १९५६ को दिल्ली स्थित अपने निवास पर नींद में ही उनका देहावसान हुआ। लेखक स्वयं दीर्घकाल तक मधुमेह के रोगी रहे — इसी अध्याय में वे लिखते हैं कि प्रतिदिन की भाग-दौड़ से उनका मधुमेह दूर हो गया, और "Guide for Diabetics" पढ़कर हृदयंगम की। इसी नाते वे अपनी सन् २००१ की जानलेवा बीमारी को उसी तराज़ू पर तौलते हैं। ध्यान रहे कि पत्र "अस्पताल में" कहता है, जबकि आम्बेडकर का देहावसान घर पर हुआ था; यहाँ पाठ ज्यों का त्यों रखा गया है, सुधारा नहीं गया।

The family reads this as Dr. B. R. Ambedkar, and the disease he does not name is diabetes. Ambedkar was diabetic from 1948; he had neuropathic pain in his legs, was on insulin and homoeopathic medicines together, his eyesight was failing, and he was bedridden from June to October of 1954. He died in his sleep on 6 December 1956 at his home in Delhi. The author was himself a diabetic of long standing — in this same chapter he writes that the daily walking carried his diabetes away, and that he read the "Guide for Diabetics" and took it to heart. That is the scale on which he is measuring his own near-fatal illness of 2001. Note that the letter says "in hospital", whereas Ambedkar died at home; the text is left as it stands rather than corrected.

बीघा (कच्चा) / Bigha, kachcha measureअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

क्षेत्रफल की स्थानीय इकाई, जो ज़िले-दर-ज़िले भिन्न होती थी। कच्चा बीघा पक्के से छोटा होता था — यही वह अस्पष्टता है जिसने राजस्व अधिकारियों को सदा व्यस्त रखा।

A local unit of area, varying from district to district. The kachcha bigha was smaller than the pakka — exactly the kind of ambiguity that kept revenue officers in work.

भइया / Bhaiyaअध्याय ८ · सन् उन्नीस सौ उनतालीस

ठा॰ भारत सिंह (१८९९–१९९१) — लेखक के बड़े भाई, जिन्हें वे पूरे पत्र में केवल "भइया" कहते हैं। परिवार के सुधार से तीन स्थानों पर पाठ ठीक किया गया है: हस्तलेख में जहाँ "मइया" पढ़ा गया था, वहाँ वस्तुतः "भइया" है — इस अध्याय में डॉक्टर लाने वाले, अध्याय ९ में जिनके नाम प्लॉट पास हुआ, और अध्याय १२ में जिन्होंने माताप्रसाद और चक्रपाल की देखभाल की। देवनागरी हस्तलेख में म और भ का भेद प्रायः लुप्त हो जाता है।

Thakur Bharat Singh (1899–1991) — the author’s elder brother, whom throughout the letter he calls simply "Bhaiya". On the family’s correction the text has been set right in three places where the hand had been read as "maiya" (mother) but in fact says "bhaiya": the man who fetched the doctor in this chapter, the man in whose name the plot was sanctioned in chapter 9, and the man who looked after Mataprasad and Chakrapal in chapter 12. In Devanagari handwriting the difference between म and भ often disappears altogether.

भारत सदन / Bharat Sadanअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

लखनऊ का वह मकान, जिसका सामने वाला प्लॉट भइया ठा॰ भारत सिंह के नाम पास हुआ और जिसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया। नाम की यह बात हस्तलेख में नहीं है; परिवार ने बताई, इसलिए जोड़े गये शब्दों की तरह चिह्नित है।

The Lucknow house, whose front plot was sanctioned in the name of Bhaiya — Thakur Bharat Singh — and which was named after him. The naming is not in the manuscript; it comes from the family, and is therefore marked like any other supplied words.

मड़ैया / Madaiyaअध्याय ११ · गाँव, अब

फूस की झोंपड़ी। मड़ैया की चिंता — यानी सिर पर छत न होने का डर, जिससे बचने के लिए ये मकान बनाये गये थे, और जिन्हें अब ख़ाली छोड़ दिया गया है।

A thatched hut. The "fear of the madaiya" is the fear of having no proper roof — the fear these houses were built against, and which now stand empty.

मण्डी परिषद / Mandi Parishadअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

उत्तर प्रदेश राज्य कृषि उत्पादन मण्डी परिषद — मण्डियों का निर्माण और प्रबंधन करने वाली संस्था, जहाँ बड़ा निर्माण-व्यय और उसके साथ चलने वाली अनियमितता दोनों थे।

The UP State Agricultural Produce Market Board, which built and ran the regulated markets — a body with a large construction budget and the irregularity that tends to go with one.

महतरानी / Mehtaraniअध्याय ६ · घुड़साल वाली कोठरी

शौचालय साफ़ करने वाली स्त्री। यह कार्य जाति-व्यवस्था की सबसे निचली सीढ़ी पर था, और लेखक उसे उसी सहज ढंग से दर्ज करते हैं जिस तरह वह उस समय की व्यवस्था थी।

The woman who cleaned the latrines — work fixed at the very bottom of the caste order. The author records her twice-daily rounds as simply the arrangement of the time.

मिचू / Michuअध्याय ११ · गाँव, अब

परिवार ने पहचान की पुष्टि की है: मिचू — घर में मिट्टू — ठा॰ मृत्युंजय सिंह थे, महेश्वर सिंह के पुत्र और धनंजय के भाई। हस्तलेख में यह नाम धुँधला है और पहले ⟨मिचू?⟩ के रूप में अनिश्चित पढ़ा गया था; अब यह पाठ प्रमाणित है। इसी से यह भी स्पष्ट होता है कि उनकी असामयिक मृत्यु के बाद उनका काम धनंजय ने क्यों सँभाला — वह उनके अपने भाई का काम था। वंशावली में मृत्युंजय सिंह दर्ज तो हैं, पर उनकी मृत्यु की तिथि अभी दर्ज नहीं है; यह पत्र (सितम्बर २००४) स्वयं इस बात का साक्ष्य है कि वह उससे पहले हो चुकी थी।

Confirmed by the family: Michu — Mittu at home — was Thakur Mritunjay Singh, son of Maheshwar Singh and brother of Dhananjay. The name is faint in the hand and was first read only tentatively, as ⟨मिचू?⟩; the reading is now settled. It also explains why Dhananjay took his work on after his untimely death — it was his own brother’s work. The tree records Mritunjai Singh but carries no date of death for him; this letter, written in September 2004, is itself the evidence that it had already happened by then.

मिडिल स्कूल / Middle Schoolअध्याय ४ · पाँच बाबा, और पिताजी

आठवीं कक्षा तक की शिक्षा, जो उस पीढ़ी के गाँव के लड़के के लिए पहले ही दुर्लभ उपलब्धि थी। इसी परीक्षा में प्रदेश-भर में सातवाँ स्थान वह धुरी है जिस पर पूरे परिवार का आगे का उत्थान घूमता है।

Schooling to the eighth standard — for a village boy of that generation, already a rare attainment. The seventh place in the province won in this examination is the hinge on which the whole family's later rise turns.

मुन्नू / Munnuअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

विमल का घरेलू नाम — बिजली विभाग में कार्यरत। पत्र में घरेलू नामों और औपचारिक नामों का प्रयोग साथ-साथ चलता है, जैसे बोलचाल में होता है।

The household name of Vimal, employed in the electricity department. Throughout the letter household names and formal names are used side by side, as they would be in speech.

मुन्नू / Munnuअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

विजय भानु सिंह — ठा॰ गनपत सिंह के छोटे पुत्र, अर्थात् रज्जू के छोटे भाई। बिजली विभाग में नौकरी करते थे। मकान को लेकर जो झगड़ा इस अध्याय में दर्ज है, वह इन्हीं के लिए मकान बनवाने की माँग से शुरू हुआ।

Vijay Bhanu Singh — Thakur Ganpat Singh’s younger son, and therefore Rajju’s younger brother. He was in service with the electricity department. The quarrel over the houses recorded in this chapter began with the demand that one be built for him.

यूनानी / Unaniअध्याय ८ · सन् उन्नीस सौ उनतालीस

ग्रीक-अरबी परम्परा की चिकित्सा पद्धति, जो भारत में सदियों से आयुर्वेद के समानांतर चलती रही है।

The Greco-Arabic system of medicine, practised in India alongside Ayurveda for centuries.

रज्जू / Rajjuअध्याय १ · पत्र

डॉ॰ राज भानु सिंह — ठाकुर गनपत सिंह के पुत्र, अर्थात् लेखक के भतीजे। उन्हीं के पूछने पर यह पूरा दस्तावेज़ लिखा गया; पूरा पत्र उन्हीं को सम्बोधित है। वंशावली के अनुसार उनका देहावसान २०२५ में हुआ। पत्र में जहाँ लेखक 'तुम्हारी माता' कहते हैं, वे गनपति की पत्नी हैं — वंशावली में रंजना सिंह।

Dr. Raj Bhanu Singh — son of Thakur Ganpat Singh, and therefore the author's nephew. It was his letter of enquiry that caused this entire document to be written, and every page is addressed to him. The family tree records his death in 2025. Where the letter says "your mother", it means Ganpati's wife — recorded in the tree as Ranjana Singh.

राजभर / Rajbharअध्याय २ · धारानगरी से सिंहामऊ

पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक जाति, जिसके छोटे राज्य मध्यकाल में अवध क्षेत्र में फैले थे। लेखक अपने वंश की विजय इसी जाति पर दर्ज करते हैं — और उसे स्वयं धोखाधड़ी कहते हैं।

A community of eastern Uttar Pradesh whose small chieftaincies were spread across the Awadh region in the medieval period. The author records his clan's conquest of them — and himself calls the manner of it treachery.

राजा भर्तृहरि / Bhartrihariअध्याय २ · धारानगरी से सिंहामऊ

प्रसिद्ध संस्कृत कवि, जिन्हें नीतिशतक, शृंगारशतक और वैराग्यशतक का रचयिता माना जाता है। इस जीवनी में यह कथा वंश की उत्पत्ति की भूमिका के रूप में आती है, प्रमाणित इतिहास के दावे के रूप में नहीं।

The renowned Sanskrit poet credited with the Nitishatak, Shringarshatak and Vairagyashatak. In this memoir the story stands as the family's origin-legend, not as a claim of documented history.

राम सिंह / Ram Singhअध्याय २ · धारानगरी से सिंहामऊ

वंशावली की सबसे ऊपरी कड़ी। यह वंश-रेखा — राम सिंह → मान चित्रसिंह → मकरन्द → रसाली → चाँदी → रामदयाल → गुरुबख्श → भारत सिंह (१८९९–१९९१) → वीर भद्र सिंह (१९२३–१९९९) → विमल प्रकाश सिंह → विक्रम — ठा॰ शील भद्र सिंह ("रामू") की हस्तलिखित, भली-भाँति शोधित प्रति से ली गई है, और परिवार में प्रामाणिक मानी जाती है। इसमें और इस पत्र में कोई विरोध नहीं है: लेखक बड़े भाई राम सिंह के राजगद्दी पर बैठने की बात कहते हैं और अपने पूर्वज को बारह गाँव मिलने की — वंशावली उसी बड़ी शाखा से आरम्भ होती है जिससे आगे चलकर थानापतियों की शाखा निकली। गुरुबख्श के नीचे की कड़ियाँ इसी पत्र के पात्र हैं: भारत सिंह लेखक के बड़े भाई हैं, और वीर भद्र सिंह उनके सबसे बड़े पुत्र — धीर भद्र और शील भद्र ("रामू") के अग्रज।

The topmost link in the genealogy. This line of descent — Ram Singh → Man Chitrasingh → Makrand → Rasali → Chandi → Ramdayal → Gurubaksh → Bharat Singh (1899–1991) → Veer Bhadra Singh (1923–1999) → Vimal Prakash Singh → Vikram — is taken from the carefully researched handwritten copy made by Thakur Sheel Bhadra Singh ("Ramu"), and is held authoritative within the family. It does not contradict the letter: the author records that his elder brother Ram Singh took the throne while their own ancestor received the twelve villages, and the genealogy simply begins from that senior branch, from which the Thanapati line later came down. The links below Gurubaksh are the people of this letter: Bharat Singh is the author’s elder brother, and Veer Bhadra Singh his eldest son — elder brother to Dheer Bhadra and to Sheel Bhadra, "Ramu".

रामू / Ramuअध्याय ३ · बारह गाँव और बिरादरी

ठा॰ शील भद्र सिंह (जन्म १९४१), ठा॰ भारत सिंह के पुत्र — परिवार द्वारा पुष्टि। जिस एम॰ए॰ शोध-प्रबन्ध का यहाँ उल्लेख है, वह उन्हीं का है, और उसी में ठा॰ चन्द्रभाल सिंह से प्राप्त वंशावली दर्ज है। आगे अध्याय ८ में लेखक लहान से कहते हैं "रामू तुमसे छोटे हैं" — लहान का जन्म १९३८ में हुआ था, अतः तिथियाँ इस पहचान से ठीक बैठती हैं।

Thakur Sheel Bhadra Singh, born 1941, son of Thakur Bharat Singh — confirmed by the family. The MA thesis spoken of here is his, and it is in that thesis that the genealogy given by Thakur Chandrabhal Singh is set down. In chapter 8 the author tells Lahan that "Ramu is younger than you" — Lahan was born in 1938, so the dates fit this identification exactly.

रुहेला / Rohillaअध्याय १० · रियासतें

अफ़ग़ान मूल के पठान, जो अठारहवीं सदी में रुहेलखंड — वर्तमान बरेली–रामपुर क्षेत्र — में बसे। रामपुर उनकी अंतिम रियासत थी, और स्वतंत्रता के बाद सबसे पहले भारत में विलय करने वालों में थी।

Pathans of Afghan origin who settled in Rohilkhand — the present Bareilly–Rampur region — in the eighteenth century. Rampur was the last of their states, and among the first to accede to India after independence.

लहान / Lahanअध्याय ८ · सन् उन्नीस सौ उनतालीस

लेखक के इकलौते पुत्र। घर में लल्लन कहलाते थे; हस्तलेख सर्वत्र "लहान" ही लिखता है। वंशावली में जन्मजय सिंह (Janmajai Singh) के नाम से दर्ज — जन्म १९३८, देहावसान २०१२। डॉक्टर बने, पूर्वोत्तर रेलवे की चिकित्सा सेवा में गये, और ३०.११.१९९७ को वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त हुए। ध्यान दें: यह जीवनी २००४ में लिखी गई थी, अतः लिखते समय लहान जीवित थे — पत्र में उनका उल्लेख वर्तमान काल में है।

The author's only son. The family tree records him as Janmajai Singh, born 1938, died 2012. He became a doctor, entered the Northeastern Railway's medical service, and retired from a senior post on 30 November 1997. Note the dates: this memoir was written in 2004, so Lahan was alive throughout the writing of it — the letter speaks of him in the present tense.

वात-व्याधि / Vata-vyadhiअध्याय १२ · शरीर, पुस्तकें, और अन्त

आयुर्वेद में वायु-दोष से उत्पन्न रोगों का वर्ग — जोड़ों का दर्द, गठिया और स्नायु सम्बन्धी विकार इसी में आते हैं।

In Ayurveda, the class of disorders arising from imbalance of vata — joint pain, rheumatism and nerve complaints all fall under it.

विकास प्राधिकरण / Development Authorityअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

लखनऊ विकास प्राधिकरण, जिसने नगरपालिका से नक़्शा स्वीकृति का अधिकार ले लिया — और साथ यह शर्त भी कि सड़क, सीवर और पार्क का अनुमानित व्यय पहले जमा हो।

The Lucknow Development Authority, which took over the power to sanction building plans from the municipality — and with it imposed the requirement that the estimated cost of roads, sewers and parks be deposited in advance.

विमल और महेश्वर / Vimal and Maheshwarअध्याय ९ · बाग़, मकान, और दरारें

परिवार का सुधार। हस्तलेख इस पूरे प्रसंग में केवल "भाई महेश्वर" पढ़ा जाता है, पर तथ्य यह है कि मण्डी परिषद में विमल प्रकाश सिंह थे, और भारत सदन का निर्माण भी उन्हीं ने आरम्भ कराया। हरदोई के ग्रामीण बैंक की अध्यक्षता महेश्वर सिंह को ही मिली थी। पांडुलिपि के इस पृष्ठ (२९) पर लिखावट अत्यंत धुँधली है और दोनों नाम पास-पास आते हैं; मूल पंक्तियाँ भाग दो में ज्यों की त्यों देखी जा सकती हैं।

A family correction. Throughout this passage the hand reads only "my brother Maheshwar", but in fact it was Vimal Prakash Singh who was in the Mandi Parishad, and he who began the building of Bharat Sadan. The chairmanship of the rural bank at Hardoi was Maheshwar Singh’s. The writing on this sheet (p29) is very faint and the two names fall close together; the original lines can be seen as they stand in Part Two.

शजरा / Shajraअध्याय ३ · बारह गाँव और बिरादरी

बन्दोबस्त में बना गाँव का खेत-नक़्शा, जिसमें हर खेत की सीमा दर्ज होती है। लेखक की अपनी नौकरी इन्हीं अभिलेखों की थी।

The village field-map prepared at settlement, recording the boundary of every plot. These records were the author's own professional life's work.

श्राद्ध / Shraddhaअध्याय ५ · तख़्ती और सरकंडे की क़लम

पितरों के निमित्त किया जाने वाला वार्षिक अनुष्ठान और भोज। लेखक इसके लुप्त होने को बिरादरी के लुप्त होने के साथ जोड़कर देखते हैं।

The annual rite and feast performed for the ancestors. The author links its disappearance directly to the disappearance of the biradari itself.

सर सुन्दरलाल अस्पताल / Sir Sundarlal Hospitalअध्याय १२ · शरीर, पुस्तकें, और अन्त

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का चिकित्सा महाविद्यालय और अस्पताल, जिसकी स्थापना महामना मदन मोहन मालवीय ने की। लेखक के पुत्र वहीं की सेवा में थे।

The medical college and hospital of Banaras Hindu University, founded by Madan Mohan Malaviya. The author's son was in service there.

सहजन का पत्ता / Drumstick leafअध्याय १२ · शरीर, पुस्तकें, और अन्त

मोरिंगा ओलिफ़ेरा। ग्रामीण उपचार में गरम लेप को पत्ते पर फैलाकर बाँधा जाता है — पत्ता गरमी रोके रखता है और औषधि को त्वचा पर टिकाये रखता है।

Moringa oleifera. In village practice a warm paste is spread on the leaf and bound on — the leaf holds the heat and keeps the preparation against the skin.

सिंहामऊ / Singhamauअध्याय १ · पत्र

जनपद लखनऊ, परगना महोना, थाना इटौंजा का एक गाँव। यह पूरी वंशकथा इसी गाँव के इर्द-गिर्द घूमती है।

A village in Pargana Mahona, police station Itaunja, district Lucknow. The whole of this family history turns around this one village.

स्याहा / Siyahaअध्याय ७ · बीस रुपये महीना

तहसील के ख़ज़ाने की दैनिक रोकड़-बही, जिसमें हर दिन की वसूली दर्ज होती थी। तहसीलदार का दिन इसी से शुरू होता था।

The tehsil treasury's daily cash book, in which each day's collections were entered. The Tehsildar's day began with it.

हरवाही / Harwahiअध्याय ५ · तख़्ती और सरकंडे की क़लम

दूसरे के खेत में हल चलाने का काम, प्रायः अनाज में मज़दूरी पर — भूमिहीन मज़दूर के लिए सबसे आम रोज़गार।

Ploughing another man's field for hire, usually paid in grain — the commonest employment open to a landless labourer.

हैदराबाद, सितम्बर १९४८ / Hyderabad, September 1948अध्याय १० · रियासतें

हैदराबाद रियासत भारत की सबसे बड़ी देशी रियासत थी। सितम्बर १९४८ में भारतीय सेना की कार्यवाही — ऑपरेशन पोलो — के बाद निज़ाम ने विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किये। लेखक इसे समकालीन के रूप में याद कर रहे हैं, इतिहासकार के रूप में नहीं; यह आकलन उन्हीं का है।

Hyderabad was the largest of the princely states. After the Indian army's action in September 1948 — "Operation Polo" — the Nizam signed the instrument of accession. The author is recalling this as a contemporary who lived through it, not writing as a historian; the reading is his own.

दादू वाणीसंकलन

संकलनColophon

मूल पांडुलिपि · The manuscript
४१ pages, ruled foolscap, written 6–18 September 2004 at Singhamau. Signed अर्जुन सिंह, 18.9.2004.
यह संस्करण · This edition
Compiled by Vikram Singh Parmar, 2026, from the original sheets.
सुधार · Corrections
Every marked gap is an invitation. If you can read a word we could not, it belongs in the record.

अब आगे कोई बात मेरे स्मरण में बाक़ी नहीं है।

There is nothing further left in my memory now.

भाग दो · Part Two

मूल पाठThe Transcript

All forty-one pages, transcribed line by line as he wrote them — his own spelling, his own punctuation, his own page numbers and dates. Nothing is corrected and nothing is invented. The tag on each page says how legible that sheet proved to be.

जन्माष्टमी 6 ९/२००4 स्पष्ट · clear
बुढ़ापे की अवस्था ⟨जन्म?⟩ 11.४⟨?⟩-1907 से 18.९.२००4 तक जीवित अवस्था 96 वर्ष
                                        साढ़े ५ मास हुआ                    ①
⟨???⟩         ॐ    श्री गणेशाय नमः      जन्माष्टमी 6 ९/२००4
आत्मजीवनी।  अर्जुन सिंह सेवा निवृत्त तहसीलदार आत्मज ठा० गुरुवख्श सिंह
निवास ग्राम व पोस्ट सिंहामऊ ⟨थाना?⟩ इटौंजा जनपद लखनऊ    चिरंजीव भानु सिंह (रज्जू)
⟨???⟩ स्कूल गणपति सिंह ⟨???⟩  प्रिंसिपल डिग्री कालेज ⟨?⟩ के सुझाव के प्रश्नों के आधार पर

प्रिय रज्जू तुम्हारा पत्र पढ़ा। वह तो इतना जानकारी चाहता है जो अधिक
समय लेगी। मैं कुछ अपनी वावत लिखूं फिर जानकारी अपने पुरखो की भी दे दूं।
पंवार लोग यहां कैसे आये पहले उसकी वावत उल्लेख करता हूं।
मेरी जानकारी के अनुसार विक्रम सम्वत जो अब चलता है वह राजा विक्रमादित्य
के वारे में पहले लिखूं तब अपने निजी जीवनी ननिहाल की वावत लिखूं।

राजा मत्रृहरि वह विक्रमादित्य दो सगे भाई थे मत्रृहरि वड़े भाई राजगद्दी पर
वैठे और छोटे को राजांश मिला। अर्थात वह जीवन यापन हेतु कुछ प्रांते थे।
राजा मत्रृही काफी संस्कृतज्ञ के थे राजकाज के साथ लेखन का कार्य भी करते थे
जैसी पुरातन क्षत्रिय राजाओं की परम्परा थी। उत्तराधिकार तो राजाओं का
पुराना है मगर राजाओं में छोटे को जागीर देने की प्रथा वाद में जारी हुई।

राजा मत्रृही की पत्नी वहुत रूपवती था वह उनके प्रेम में ही मस्त
रहते हैं। मगर पुरानी एक कहावत "स्त्रियाचरितं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति
कुतो मनुष्यः" इन दोनो पर घटित होती है।
पत्नी का चाल चलन ठीक न था उसका प्रेमी घुड़साल का मुरिखया था
वह प्रेमी रानी के साथ एक वेश्या से भी प्रेम करता था।

वेश्या जो वहुत रूपवती थी एक महात्मा विचरते हुए आये और
उनका ब्रह्मचर्य का ⟨काफूर?⟩ हो गया तथा उससे सम्भोग करके जव लौटने की
वात आई तो महात्मा ने कहा मेरे पास मुद्राये तो हैं नहीं मगर तुमको मैं एक
अमृत फल दे रहा हूं उसको खाकर तुम अमर हो जाओगी। उसने सोचा मेरा
पेशा वहुत खराव है और अमर होना ठीक नहीं। हमारे राजा मत्रृही
जो अच्छे प्रजा पालक हैं उन्हें दे दूं तो अच्छा होगा। वह दरवार में गई
और फल राजा को दे गई।

राजा ने वह फल रानी को और उसने घुड़साल इंचार्ज को और
अन्त में फिर वेश्या के पास पहुंचा और तव वह राजा को दे आई।
⟨बीच?⟩ में छोटे भाई विक्रमादित्य को भाभी के चरित्र की वावत जानकारी
मिली और उन्होंने अपने वड़े भाई को वताया पोल खुलने पर उल्टे तोहमत
विक्रमादित्य पर लगाई कि उससे प्रेम करना चाहते हैं यह सव झूठ फल
आदि की वात मनगढ़न्त है। अब राजा मत्रृही ने विक्रमादित्य को
देश निकाला कर दिया।

दोवारा फल पहुंचने पर मत्रृही को जानकारी प्राप्त हुई तो छोटे
भाई का देश निकाला अनुचित पाया गया।
राजा मत्रृही अन्तःपुर में न जाकर दरवार से होकर वन वारा को
गये और मंत्रियों से कहा कि विक्रमादित्य को तलाश कर गद्दी पर वैठा दो
अव ⟨आगे?⟩ दूत ना ही और कहा पंवारों के यहां आने की जानकारी ⟨हूंगा?⟩⟨???⟩ ने ⟨जो?⟩ नीति शतक लिखा। (1) ⟨???⟩ श्रृंगार वैराग्य और ⟨???⟩
27.9.004 आंशिक · partial
धारानगरी मध्य प्रदेश में है। वहां से पंवारों का एक वड़ा दल हाथियों व घोड़ों
पर सवार होकर पहला पड़ाव रामगंगा के किनारे फरुखावाद जिले की नईतहसील
अमृतपुर के पड़ोस में एक गांव काल्हापुर में डाला। वहां से एक टुकड़ी पूरव
वारा जिले का त एक कान्तपुर वा डाला उतपर एक ⟨कडहरु?⟩ स्टेशन है
उसके पास वस गई। दूसरा सीतापुर जिले में सीतापुर वाला मह⟨?⟩ जंक्शन
जिला हरदोई में है। ⟨उधर?⟩ में व भी एक छोटा सा ⟨शाख?⟩ है उसके दूर गिर्द के
गांवों में वसा। इन सवन से उस जगह स्थानीय छोटे-२ लोगों का जो जमींदार
फहराकर अपना दव दवा ⟨वनांथा?⟩।

वाकी लोगों में हम लोगों के पूर्वज ⟨हरसुदराय?⟩ वड़े पंवारों की टुकड़ी के साथ
तत्कालीन ⟨???⟩ राहा से ⟨?⟩ होकर हमारे पड़ोस में एक गांव
⟨सुगामर?⟩ राजा है वहां एक दो ⟨रोज?⟩ ⟨ठहरा?⟩ जाति राजभर अव पलायन करके
पूर्वी जिला में वस गया। राजभर राजा के यहां द्वारे ⟨हरसुदराय?⟩ सेनानायक
वन गये और आपने वड़े भाई राम सिंह को काल्हापुर में सूचना दी कि    ⟨हाशिया: राजाभरों के⟩
सैनिकों सहित आ जाओ यहां पर वड़ा राज्य ⟨राय पुर यंकड़ीया?⟩ ⟨???⟩    ⟨हाशिया: ⟨अजितापुर?⟩⟩
इटौंजा से नौ मील पर जो सरकारी तथा राजा साहव की ⟨लाखापटी?⟩ में
में होता है) में धावा वोला और द्वारे ⟨हरसुदराय?⟩ ने फाटक गारदों को
⟨खाहा?⟩ दिया। राजा मारा गया और राजभर सव पूर्वी य जिला में    ⟨हाशिया: इधर⟩
पलायन कर गये। यह उस जाति का एक भी गांव तक नहीं है।

इसके पहले कि अपनी वावत कुछ लिखूं इस जाति का क्या प्रभाव
हमारा राम सिंह तो राजगद्दी पर वैठे और द्वारे ⟨हरसुदराय?⟩ को जागीर में
सिंहामऊ सहित वारह गांव मिले। चूंकि यह ⟨???⟩ वहुत
वड़ी थी अतः इसका एक प्रभाव हम लोगों पर पड़ा। सिंहामऊ में पूरव एक
टीला है वह वड़े हमारे पूर्वजों के नाम से लोग जानते हैं। जागीरदारों में    ⟨हाशिया: गढ़ी⟩
(हम) थानापति यों की चार टुकड़ी हुई। एक सिंहामऊ, दूसरा एक
गांव खसरांव नाम का ब्राह्मणों का है वहां पहुंचा ⟨कि?⟩ ⟨आनवावो?⟩ ⟨मऊन?⟩
पंवारों को भगा दिया वह सीतापुर जिले के परसंडी स्टेशन सीतापुर वुढ़वल
वांचे में वसी यह वड़े जमीदारों में जमीदार ⟨जन्ती?⟩ तक जो गांव का नाम
हथिया वगहिया है। तीसरी इसी जिले के उनई और चौथी वनौगा
जो हमारे परगना महोना कि ⟨है?⟩ अमानीगंज का पुरवा है वसे यह भी
हथिया वगहिया वालो जैसे अच्छे और ⟨जवावार?⟩ के सव ⟨सेवड़?⟩ थे।

उनई-⟨???⟩ गांवों के पंवारों को किसी कारण जाति वाहर किया
गया। केवल हमारा गांव व वनौगा ही थानापतियों के यहां है।
हम लोगों के पुरखा वहुत सीधे सादे थे। अंग्रेजों ने
आंशिक · partial
जव नवावों से लखनऊ का राज्य जीता तव वन्दोवस्त ⟨कराके?⟩
मालगुजारी व गांवों का वर्तमान सीमा आदि ⟨शजरों?⟩ में वनवा दी।
और वही अव तक चल रही। राजा इटौंजा जी के पूर्वजों ने वन्दोवस्त के
समय हमारे पूर्वजों से लिखवा कर केवल एक गांव
सिंहामऊ आपन कब्जा में रख कर राज्य के गांव में शामिल करा लिया।

वर्तमान में तो अव विरादरी का कोई महत्व नहीं एक रात का
वारात ⟨उहमे?⟩ वराती चाहे जिस जाति के हों एक ही मेज पर ⟨एक थाली?⟩
भोजन का सामग्री का निकाल कर प्लेटों में खाते हैं। हंसी में लोग
इसे गिद्ध भोरा कहते हैं क्या कि जैसे मरे जानवर का गोश्त गिद्ध
खाते हैं उसमे तगड़ अच्छा और कमजोर गिद्ध ⟨खरा?⟩ व भाग पाते हैं
उसी तरह अच्छी सामग्री सव को नसीव न होता।

तिलक में भी आमतार पर केवल एक तरह की मिठाई में लड्डू मिलते हैं भोजन वैसी।
पहले विवाह में जव तिलक होता था तव जवार के विरादरी वाले व
अन्य लोगों को ⟨पहुंचा?⟩ भोजन करवाया जाता था।

अव में वड़े भाई राजा राम सिंह के वंशजो और हक थानापतियों
के वीच जो ⟨दूई?⟩ वर्तमान युग के पहले ⟨अततर?⟩ हुआ यह वहुत ⟨टकराव?⟩ था
हम थानापति यों के कच्चा खाना राजा घरान वाले नहीं खाते थे।
केवल वनोगा वाले और हमारे गांव का ही सम्वन्ध मेरे वड़े भाई
ठा० भारत सिंह की देवगत पत्नी के दशवें में जव नहीं आये तव तक
आना जाना ⟨काटा हुआ शब्द⟩ वन्द कर दिया गया। वही वारात में जव जाते थे तव   ⟨ऊपर लिखा: था वाद में⟩
भात के दिन गिनती होती थी कि कौन ⟨मुड़ुड़वां?⟩ हैं। अव तो यह जाति ⟨ला?⟩ ⟨की?⟩
⟨वोतही?⟩।

वर्तमान समय में तो हम सकला गांव थानापति हैं जानते ही होते ⟨८?⟩
गांव तक के लोगों को कोई पूछता नहीं है। ⟨जो?⟩ किसी लोग अपने लड़के
लड़कियों के विवाह जहां वसे हो करने लगे हैं। लखनऊ में कुछ लोगों
के ⟨प्रतिष्ठाप?⟩ ⟨वाई?⟩ देते हैं वह विवाह कर ⟨दिनला?⟩ जाये आते हैं। विरादरी
की मान्यता ⟨रह?⟩ हो गई।

भइया के दोये लड़का रामू न एम०ए० में आपन गांव की थीसिस लिखी
⟨पोलिटी?⟩ में एम०ए०⟨ग्ट?⟩ स्पेशल में I class मिला था। यह एम०ए०
स्पेशल अव नहीं रहा। राम का ⟨भविष्य?⟩ इसी ने वनाया वना एम०ए०
में II क्ला था। इस थीसिस में ठा० ⟨चन्द्रभाल?⟩ सिंह पिता जगतपाल
वड़ा० यशपाल को दी गई जानकारी पर जो वंशावली लिखी है
वह इस समय ⟨ठलकहर?⟩ में है जिसमें ⟨मनोज?⟩ ⟨जा?⟩ की ⟨कमी?⟩ का ताला लगा है
⟨हुआ?⟩। इसको अन्त में लिख देगा। अव तुम्हारे पत्र का उत्तर आगे
⟨???⟩  ⟨अन्तिम पंक्ति स्कैन के किनारे कटी⟩
48.9.04 कठिन · difficult
⟨???⟩ हूं। आपन पुरखो के वारे में लिख रहा ⟨था⟩। हमारे पिता जिनको हम
दादा कहते थे उनके पिता चार भाई थे वड़ा ठा० वलदेव सिंह उनके कोई   ⟨ऊपर: के⟩
पुत्र न थी जिनका नाम ⟨उमराई?⟩ था और उनका विवाह ग्राम शेषवापुर   ⟨ऊपर: उनको एक पुत्री थी⟩
जिला सीतापुर ⟨महुआ?⟩ ⟨थाया?⟩ ⟨उत?⟩ को ⟨सन्देखवापुर?⟩। उनके दो पुत्र थे वड़के
लड़के गुरुदेव व वंशीविहारी थे ⟨कुन्जविहारी⟩ सिंह यहां रहकर मिडिल-   ⟨ऊपर: पिता का नाम राजावख्श सिंह था⟩
स्कूल जो अव का जूनियर हाईस्कूल है पास कर मास्टरी की ट्रेनिंग कर के
सीतापुर जिले के ⟨परवाजाला?⟩ में मास्टर हुए और अन्त में प्रधानाध्यापक,
होकर रिटायर होकर अभी जीवित है। उनका विवाह हमार ⟨मड़मड़ऊआ?⟩
वनोगा गांव का एक मात्र सन्तान ठा० हरी हर सिंह को ⟨जावे?⟩ ⟨चौ?⟩ जमींदारी
⟨पीठ सूपर?⟩ का ⟨जिजहरा?⟩ शेषवापुर रियासत महमूदा का गांव ⟨पावसे?⟩
कास्तकारी ही थी। जो अव उनके वड़े भाई गुरुदेव पुत्र गजोधर सिंह और
उनके चचेरे चचा ठा० मोहन सिंह जिनका हम लोग ⟨दीदा?⟩ ⟨काटा हुआ⟩
⟨शी?⟩मोहन दादा कहते थे यहां आते जाते थे। ⟨जीव?⟩ में सीतापुर में नौकरी
में ⟨या?⟩ तव ⟨दारा?⟩ ⟨छ?⟩ ⟨भिन्न?⟩ का था और मऊ ⟨उलत?⟩ गांव में गया था तव   ⟨ऊपर: यह हमारे वावा⟩
हमारे ⟨???⟩ जा वहुत ⟨कर?⟩ है था में ⟨???⟩ गांव में ⟨स्कूल?⟩ ⟨जाते?⟩ ठहरा था। ⟨काटा हुआ⟩   ⟨ऊपर: नौकरी थी⟩
ठा० वलदेव सिंह ⟨भोलेपन?⟩ ⟨काटा हुआ⟩ ⟨हमारे?⟩ ⟨वावा?⟩ ⟨काटा हुआ⟩ में ⟨थी⟩। इनके ⟨???⟩ अव पहले आपन   ⟨दाहिने हाशिये में: -x- पहु / ⟨हारा⟩ ता / ⟨गया⟩⟨पांचौ⟩ ⟨चरिो?⟩ वावा वालो ⟨गा?⟩ पर प्रकाश डालूंगा ⟨काटा हुआ⟩ ⟨सह?⟩ अनके पुत्र   ⟨ऊपर: चेल्सक⟩
सव श्री वलदेव सिंह, रामदयाला सिंह, शिवदयाल सिंह, शिवमंगल
और शिवराज सिंह थे। ठा० ⟨सुमदयाल?⟩ सिंह मेरे पिता जी ठा० गुरुवख्श ⟨श?⟩
और अगर कोई रह ⟨गये?⟩ होगा तो मेरी जानकारी के पश्चात ही मर गये होंगे।   ⟨ऊपर: सन्तानें / सिंह⟩
ठा० शिवदयाला सिंह पुत्र ठा० लालाता सिंह थे और उनका वावव
वाद में लिखवा जायगा। ठा० शिवमंगला सिंह के दो पुत्र ठा० शारदा-
वरण सिंह और सुखदेव सिंह थे। ठा० शारदावरण सिंह हम ने तो
⟨दो?⟩ मुझ मिडिल स्कूल में नाम लिखा कर मुझे पढ़ाया था और   ⟨ऊपर: थे⟩
वह उस समय जिला में मास्टरों में नम्वर एक पर थे उन्हीं
को वदौलत मुझे मिडिल स्कूल का परीक्षा में ⟨उच्चार/उत्तर?⟩ प्रदेश में
मेरा सातुवां स्थान और मुझे रु 6/- मासिक स्कालरशिप मिला,
और इसी का वदौलत ⟨मे?⟩ हाई स्कूल की पढ़ाई होकर ⟨रांह?⟩
जो हमारे पिता जी व चाचा ⟨पुत्रा?⟩ (ठा० भारत सिंह मेरा ⟨वड़ा भाई?⟩)
⟨चि०?⟩ गणापति सिंह और महेश्वर सिंह के आगे पढ़ने का सम्वल
वना० ⟨भइया⟩ ठा० भारत सिंह को ⟨?⟩ पिता जी ने इटौंजा में प्राइमरी
व मिडिल स्कूल में पढ़ाकर और ⟨इटौंजा?⟩ ⟨जी?⟩ ⟨हो?⟩ मास्टरी
की ट्रेनिंग कराई और वह ⟨?⟩ मासिक के सहायक मास्टर
आंशिक · partial
प्राइमरी स्कूल बन गये। घर गृहस्थी के चलाने में वह पिताजी के सहायक बन गये।
अपनी पढ़ाई की वावत लिखूंगा। दादा पढ़ते तो अच्छे मगर ⟨वहता मिल न सारूपे?⟩
मिडिल स्कूल के प्रधानाध्यापक ठा० रघुनन्दन सिंह ⟨के?⟩ ग्राम में को गोमती नदी
पार था। चूंकि स्नेह था अतः सोचा रास्ता होने से वह गांव में होकर शनिवार
व अन्य छुट्टियों में आते जाते थे इसी से प्रगाढ़ता थी। मिडिल स्कूल
का रिजल्ट आने पर जव वजीफा मिला तो दादा को उन्होंने बुलाकर
कहा कि इस लड़के को हाईस्कूल में पढ़ाओ। उन्होंने कहा कि
४/= मासिक तो यह पावेगा मगर अन्य खर्चा मैं कैसे कर पाऊंगा वह
मुझे वहुत कठिन मालूम होता है तव उन्होंने ढाढ़स दिया और कहा
फीस माफी के लिए मैं ⟨शिफारिश?⟩ करूंगा और रहने के लिए तुम्हारे
गांव के वड़े ज़मीन्दार की कोठी मौ० गोलागंज लखनऊ में मांगूंगा
तथा वह तो तुम्हारे ही कुल पर कोठरी दे देगा। ⟨सह माहजा?⟩

मिडिल स्कूल पास हाई स्कूल में ⟨भर्ती?⟩ होने वाला कैसरवाग के चौराहे
पर चर्च मिशन ⟨वर्नाक्युलर?⟩ हाईस्कूल है के निकट है। फिर भी
पिताजी राजा इटौंजा ठा० भगवान वख्श सिंह के पास मुझे ले गये
[हाशिये पर: पढ़ाई का ⟨???⟩] वह राजा इन्द्र विक्रम सिंह इटौंजा के ⟨राजा ज़ारदार?⟩ थे और पिताजी उनसे
मिलते रहते थे। उन्होंने वादा किया कि ४/= चार रूपये मासिक दे दूंगा
मगर वादा तो ⟨रुका?⟩ सावित हुआ फिर आगे पढ़ने को हेतु तो वह नहीं।

पहला मिडिल स्कूल इटौंजा में न था वह पड़ोस में महोना कस्वे में था
1913 ई० में [राजा] इन्द्र विक्रम सिंह ने एक मध्यम भवन बनवाकर
महोना से इटौंजा लाये। प्राइमरी स्कूल भी तथा पूरब तहसील ⟨???⟩
⟨??? — पंक्ति काटी हुई ???⟩
⟨होकर?⟩ चवेना चना ज्वार आदि कपड़े में वांध ग्राम कमालपुर
होकर रास्ता था। कमालपुर में वन्दर ⟨वहुत?⟩ और जंगल व ⟨वीच?⟩ रास्ते में
दिखाई देते थे तो डर लगता था। ⟨???⟩ काहू ल और चवेना
दोनों आते गांव के ⟨मोड़?⟩ पर जाकर पटवारी लालता सिंह [पिताजी] की
सहायता से निकला जाते थे। दोपहर चवेना चवाने का कुछ ही होता था
स्कूल से गांव निकट था जहां ⟨मुजावा?⟩ भाई गुरु फर्ज करता था और
पढ़ने वालों का [चवेना] भर देता था। ⟨सवा?⟩ का पानी पीकर फिर पढ़ाई होती
और चार वजे छुट्टी मिलती थी तव घर आकर खेलकूद में जुट जाते थे
टाट पर वैठ २ कर पढ़ आगे भी मेरे परों में ⟨जून?⟩ है। तव स्लेट पर
नहीं लिखा जाता। लकड़ी की तख्ती जिसको ⟨वैसा?⟩ की ⟨टटोपदी?⟩
का घोट कर चमकाना पड़ता था सरकंडे की कलम से जिसे मास्टर ही
कठिन · difficult
चाकू से बनाते थे। लिखा जाता था। प्राइमरी में भी मैं नम्वर एक का
विद्यार्थी था। उस समय एक सव डिप्टी स्कूल [इंस्पेक्टर] तो जो इटौंजा में डेरा
लगाकर घोड़े पर सवार पड़ोस ना महोना के प्राइमरी स्कूलों और
एक मात्र मिडिल का ⟨निरीक्षण?⟩ करते थे। तव प्राइमरी व मिडिल स्कूल
की पढ़ाई मास्टर लोग मेहनत से करते थे पढ़ने वालों में ⟨जव छुट्टी?⟩ व
पिछड़े वर्गों के लोग वहुत कम थे। ⟨आज़ादी होने के वाद?⟩ नंवर वार थे
केवल ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ और मुसलमान ही थे। वाद में
मैं पढ़ा जव मास्टर हुए और इटौंजा में आये तो गांव में चमारों के
दो लड़को उमराव, मंगल तथा पासियों के ⟨रूपन?⟩ के ⟨हट?⟩ के राम अवतार
को प्रोत्साहित करके पढ़ाया। उमराव तो मिडिल पास कर
मास्टर ⟨लन?⟩ मंगल नहीं पा सकर पाये। आजकल हमारे गांव के
चमार जवार में नम्वर एक पर है और ठाकुरों से मान्य लेते है
तव केवल हरवाही अथवा गाय ⟨यहा?⟩ थी और तव हुक्का सी
खेती के कामों में काम करके मजदूरी आजकल ⟨???⟩ पाते थे
⟨पंद्रह?⟩ रूपये तो ⟨हकरों?⟩ के पास वहुत कम रहते थे। मेरी आंखों की
पढ़ाई राजा इटौंजा के पा[स]⟨वजीफा?⟩ मिला ⟨मजीरो?⟩ रही।

पिताजी ही केवल ऐसे थे जो जवार में पूजा हमलोगों को
और अपना मकान ⟨मन्दावी?⟩ तो संस्कार करके विरादरी भोज करते थे। पहले गुट में
ठाकुर में पाते थे या चन्चेरे भाई ⟨उन्नुदाल?⟩ सिंह व जगदम्वा सिंह और वड़े केशर सिंह
के ⟨???⟩ के पिता मेरे मिडिल स्कूल के गुरु ठा० शारदा ⟨वरुण?⟩ सिंह थे
⟨मुश्किल?⟩ मिलतो था और दूसरे में मैं, गणपति, महेश्वर चन्चेरे भाई भी साथ है
⟨???⟩ था। चाचा ⟨सुखनन्दन?⟩ सिंह छोटे भाई ठा० शारदा ⟨वरुण?⟩ सिंह थे। सुखदेव सिंह
मिडिल स्कूल में मेरे सहपाठी थे और सातवें में वह ⟨जव?⟩ थे
स्वर्गत हो गये थे।

वचपन की कुछ खास वातों को उल्लेख करना वहुत ⟨जोखरी?⟩
है। पहले भी छोटे लड़के ⟨छकरो?⟩ के चमारों तक का ⟨जागर सुराग?⟩
पशुओं के नीचे भोजन करते थे तो हल की मार पड़ती थी। एक ⟨लम्वही?⟩ हल के पूरा चाहे
को चाकू ⟨लगका?⟩ ल आये तो मैंने जाकर अपनी माता को ⟨धाम?⟩ में घुसकर कह दिया मार पड़ी
आ व वह समय है जो देखा है उसका और तव का अन्तर
तो सभी लोग वे ⟨खर?⟩ ⟨हहै?⟩। आव भाई चारा नहीं है।
पशुओं के साथ ⟨आमरण?⟩ में महेश्वर छोटे भाई उनका खेला रहा था। ना ⟨पदान?⟩ को
लाई पानी वहने न पाव अतः एक गड्ढा वना था वह मेरा था इसमें
ना ⟨करीत पूसक?⟩ रेखा वे खेलते गिरे और वहुत गन्दा पानी भी पी गये
⟨वड़ा दर का वर्ष कभी शेष ???⟩
⟨सन ७ ५ का रहे था ???⟩ पर ह ⟨प्रशंसा?⟩ का ⟨पक्षा?⟩ है

[हाशिये पर बाद में जोड़ी गई पंक्तियाँ — अधिकांश अस्पष्ट:]
  श्री राम अवतार / अब यह इण्टर कालेज ⟨???⟩ को / में मास्टरी को जा राजा साहव के
  दोनों ठाकुर मास्टर / ⟨???⟩ मुकाम आदि के / कह मास्टर का
  निवास ⟨???⟩ / ⟨???⟩ / यह ⟨पदवा?⟩ का राजा साहव ने दे दिया
  हरवाही ⟨जन?⟩ में / ⟨???⟩ / पूरा ⟨???⟩ था और / मेरी ⟨???⟩
  राम अवतार जो जाहिर की ⟨कोहराई?⟩ रहकर / आयेला में हाईस्कूल
  पशुओं के / साथ मार २ तव और / आजकल ⟨हरा?⟩ रहकर
  गांव के ⟨हर?⟩ के लोगों / जिस पशु की को ⟨देवो?⟩ कर / आपने गो लड़को / पढ़ा या फिर मैं
  (यह तुम लिया है ⟨ग्रामकि भरशा?⟩ कितने उदार थे / वना जीवनी में कोई ⟨सम्भाषा?⟩ नहीं है)
स्पष्ट · clear
दौड़कर माताजी को बताया तो वह आई और उनकी जीवन रक्षा हुई
सभी लोगों की. पढ़ाई रुक सा ⟨पड़⟩ उस समय तंगी में ⟨केसर???⟩ व हुऐ
उसको लिखूँ फिर पिताजी की जीवनी आगे को लिखूँगा।

पहले मैं अंग्रेजी पढ़ने गया एक साल बाद गणपति भी जो मिडिल में I class
बना का 4/- मासिक की डी.स्ट्रिक बोर्ड का पाकर मेरे पास रहने लगा।
महेश्वर तो पढ़ने में II क्लास का ही छात्र रहे वह भी एक साल बाद पहुँच
जब मैं पढ़ता था तब यज्ञोपवीत संस्कार से १० मन गायत्री का जाप
स्नान के बाद करना अनिवार्य था लालटेन के उजाले में पढ़कर सुबह
संध्या कर चौका में आधी धोती आदि ⟨मैल?⟩ छुड़ा कर भोजन बनाते थे
चौका बर्तन स्वयं करते थे और एक पैसे की लकड़ी से दाल रोटी
बना लेते थे तरकारी व घी तो कुछ ही ⟨क⟩ दिन हो कभी कभी सदैव नहीं
नसीब न था तब गाँव में ⟨???⟩ खेती नाम मात्र का था और
चावल जो लाहौर से आते वाले हो पर श्रादों में निपट जात थे
क्योंकि अपनी बिरादरी में खान पान था कि घर भर के लोगन एक
दूसरे घर श्राद्ध में खान जाते थे। अब तो श्राद्ध का नाम
ही नहीं है। एकाध घर में पुरोहित पिण्ड दान कराकर भोजन
पाता है बिरादरी भोज समाप्त है।

घर में औरत.चक्की पीसती थी अतः माताजी और भौजाई
और मेरा विवाह होने के बाद गौना से आई मेरी पत्नी और तुम्हारी
माताजी ने नीचे चक्की चलाकर पन्द्रहवे दिन जब हम लोग घर
आते थे आटा दाल.हल्दी धनिया आदि ⟨कुदई ह कर⟩ तेल और
घी ले जाते था तब कहीं चक्की मशीन से चलन वाला न था
चूंकि सभी औरत अपने अपने घरों में विवाह के पहले इस काम
में अभ्यस्त थी उनको ससुराल में भी संकोच क न होता था
बड़ी ⟨रूखवा?⟩ मेरे पिताजी के परिवार का. था कि आपस में बड़ा आदि
औरतो में तो.मन न ⟨ही⟩ देखा। महेश्वर का विवाह ⟨तो⟩ माला के
रेडी पुरवा से, महुआ.का वरशी का तालाब के पास चन्दा-
कोंडर में मेरा देवा के. पास.काटवा में. और ⟨गणपति?⟩ का
विवाह दुनिया पुरवा जिला गोंडा में हुआ।

अपना व भाइयों की पढ़ाई की अब छोड़ पहले अपने पिताजी
की जीवनी ननिहाल आदि की बावत प्रकाश डालूंगा।
8)9.9.04 आंशिक · partial
पिताजी अपने पिता के एक पुत्र थे कोई बहन भी न था ⟨उनहि?⟩ तो लड़का को
सभी ठाकुर नाक प ⟨जार⟩ रखन कर मार डालत था यह रवाज इस प्रकार का था कि लड़की को
[ऊपर हाशिये में लिखा: मुसलमान]
को बड़ी होने प मुसलमानो जमात मे ⟨???⟩ ते थे बहुत चलात आ ग्रामो के
सभा लुक छुप कर कुछ दिनो चला। मेरे पिताजी की बहन को मारन का रवाज न
था. क्योंकि अगर यह होता तो वड़े बाबा बलदेव सिंह का लड़की उमराव फूफी
न बचती। पिताजी धार्मिक प्रकृति के व्यक्ति थे उनका विवाह १९ वर्ष का हुआ और
उसके पहले वह तीर्थ यालाय प्रायः पैदल चल कर होकरते थे। बद्रीनारायण
भी गये थे। उस समय लखनऊ से बरेली छोटी लाइन थी। बद्रीनारायण यात्रा जान प
प्रायः लौट कर बहुत आते था। कोई रास्ता आज जैसा न था अलखनन्दा
नदी के किनारे ⟨यालो?⟩ जाते थे। रास्ता में पण्डे लोगा आश्रय देते थे बहुत रुक
बही में ⟨यात्रियो?⟩ का पूरा पता व वंशावली ⟨धारवला?⟩ ते थे और अब भी
जब तक पैदल यात्रा ही थी आश्रय देते थे। खबर पिताजी ने यात्रा ⟨हुई?⟩
कर घर को गयो अलखनन्दा को भी गंगा कहा जाता था

हालांकि गंगाजी भागीरथी कहलाती है देवप्रयाग में ऊपर का संगम
अलखनन्दा से हुआ, और नीचे आ तो हरिद्वार में गंगा नाम ही रह गया

⟨सुफल?⟩⟨लक्ष्मन?⟩रा है कि जब मैं सन १९५०ई० में तहसीलदार
बहराइच में था विद्या भाभी.चंची.पतली ठा० शारदा ⟨वरन?⟩ सिंह तथा
चचेरे भाई ठा० चक्रपाल सिंह के साथ ⟨???⟩ कर अब ⟨काशी?⟩ तक
रेल में और आगे रुद्रप्रयाग तक बस में गयो। वहाँ मोड़ पुल नदी का
[पंक्तियों के बीच ऊपर लिखा: कि दो ⟨तोन⟩ वाद वस मिलगी]
⟨मला?⟩ ⟨पुलास?⟩ पार करना ई पड़ता था अतः हम लोगा ⟨पहला⟩ ही चला
और अगली चट्टी प रुक कर भोजन बना कर रात ⟨?⟩ केदारनाथ
महादेव के दर्शन हेतु आगे पैदल रवाना हुआ। वह छोटे छोटे
घोड़े किराय प मिलत ब तथा ⟨?⟩ कम मेहनती व दमा स रोगी
आदि उन प चढ़ कर जाते थे। कम खर्च करन वाला को पहाड़ी
पीठ प एक ⟨कस्सा?⟩ जीन सा बना कर लाद लेते थे। ईमानदारी इतनी
थी कि कहो ⟨कोदे⟩ ⟨आदन⟩ आदि का बोझ लाद लाकर आगे ला चढ़ बहुत
पहला पहुँचते थे और ⟨पतली धना⟩ कर देते थे। ⟨?⟩ जो ⟨दुशाह⟩ है
वह लिखना बेकार है अब व तो वहाँ भी ⟨कलियों?⟩ को ⟨रात्रि⟩⟨लाइन⟩⟨?⟩ लागी है अब बाहर पहाड़ से पत्थर गिरता है
अब पैदल ⟨यालियों⟩ को भी काफी सुविधाएं है। रास्ते में
लिखा रहता है यहाँ पत्थर गिरता है सावधान। पानी के लिए
⟨लट्ठ⟩ नये बहुत तो नीचे बहता है न ⟨?⟩ लगे हैं हरिद्वार में ही लोगों को रुई
भरी गद्दी व मिर्च काली व शक्कर का ⟨मिश्रण⟩⟨कापड़⟩ का ⟨पूरे⟩
9 आंशिक · partial
मिल जाते है। पैदल याता में पानी छान कर गला ठीक रहन हेतु मिर्च शाकर मिश्रण
का ⟨फांक⟩ लेते है। केदारनाथ जाने में मामी तो घोड़ पे चली और स व लोग पैदल। रास्ता
में रवक बार चंची गिर पड़ी मगर उन्होंने कहा कि सवारी पर याता कर पुण्य न ही मिलेगा
खैर अब तक याद है कि रवक पंडा हमलागों साथ लागया जब वहाँ रात लगा
तो दूसरे को पता चला कि ⟨ये⟩ लोग पिताजी के वंशज है तो वह अपना वहा
ले आया और अपने यहाँ टिकाया। चलते समय अभी भी पंडे वंशावली
लिखवात है लोग इसक बदल दान स्वरूप देत हा.

अब बद्रीनाथ की याता के लिए फिर क रुद्र प्रयाग लौट कर ही
रास्ता हो व स सीधे बद्रीनाथ धाम, केदार से पहाड़ पे ⟨ड⟩ ⟨मोला⟩ है मगर
कोई जान ई सकता। पैदल याली यो यह लौटतो याता ⟨९⟩ दिन में पार
करते है इसी से कहावत है कि "नौ दिन चला अढ़ाई कोस" हम लोग
जोशी मठ ठहर कर वस से आगे गये और अगली चट्टी पीपरकोटी
पहुँच कर फिर पैदल याता कर लौट आये। चूंकि यह मेरी जीवनी रु
सम्बन्धित है अतः लिखना पड़ा। प्रायः यालियो का जो पानी को नकर
नहीं पीता। ⟨हिलाडा⟩ ⟨पानीयाँ⟩ होकर आतो में नन्हे र पत्थर के ⟨बीड़⟩ ⟨करा⟩
वो मारी का कारण बनते और बहुत कष्टदायक होता है बद्रीनारायण यरा
में हम लोग पंडे के यहाँ टिके। वहाँ रवक तहसीलदार जो मेरे पहले
बहरायच में थे प्रबन्धक क थे जिनसे मिला तो उन्होंने कहा मेरे यहाँ रहो।
कारण यह था कि बहरायच में बीज हेतु तकावी (नकदी कज)
दिया जाता था और ⟨भाड़⟩ के कारण नायब व तहसीलदारों की सहायता
लेकर रुपय ⟨बितरित⟩ किए। रवक नायब तहसीलदार ने रवक फर्जी
⟨जनजाराद⟩ लोगों की सामूहिक फाम (नियमों के अनुसार) बना कर
कई सौ रुपिय गबन कर लिया। और बोर्ड आफ रेवन्यू तक
जब सूचना गई कि ⟨जं.नोरा कुनी⟩ है तो फिर तहसीलदार साहब
उनको. परेशानी मन दूर कर दो था। मेरे सामने मामला आया तो
रवक ⟨कलावद्द⟩ न आफिसर काल साहब ने बताया कि ⟨ठीक⟩ ⟨तसव⟩ [ऊपर लिखा: लिखवाकर]
जो तहसील तरबगंज जिला गोंडा में है और
उन को बुलावा कर रुपय जमा कर रिपोर्ट ⟨भनदा⟩ कि पता लगा कर
(उगाही हो हो गई) ⟨मालो⟩ और बहुत ही पा गय थे।

मैंन कहा हम ⟨कुछ⟩ लोग है अतः आप कष्ट न करे। फिर भी
⟨हारत⟩ समय रवक ⟨आदु⟩ रुपय न सहायक का ⟨हारव⟩ कर दिया
उन सारी सुविधाये दे दीं। हम लोग सकुशल लौट आये।
यह आजा ता बीच में पिताजी की कष्टदायक याता को याद

हेतु लिखो व नो जीवनी का आरम्भ आगे पढ़ाई से तथा ननिहाल
का पहले लिखना चाहिये था।
1010.9.04 कठिन · difficult
पिताजी ने. अपना विवाह १९ वर्ष की अवस्था होने पर किया। विवाह
पूर्वतपुर ते ⟨लावारी⟩ जिला वाराबंकी ⟨मंदी⟩ ⟨पावा⟩ दरेलव स्टेशन से ⟨कोरवा⟩
जगजीवनदास तो ⟨पास्थान⟩ होकर रहा। इसक महता ठाकुर ⟨हरकुन⟩ मह ⟨म⟩ ⟨लागजल⟩ [ऊपर लिखा: वा / जगन्नाथ दास]
पढ़त पे महेश्वर का साथ ⟨नाग⟩ ⟨वराजानदास⟩ वा। वह सब गृहस्थ प ⟨कुल⟩ समय
वह लखनऊ में ⟨फाजुल्लापुलाप⟩ आपन निजी मकान ⟨मंर⟩ ⟨गह⟩ में रहा प और मकान
वड़ा था। मगर वात चलाती वा ⟨मिश्र जन्तु⟩ आ का काठा से वह अधिक
सुविधा मिला गई होतो मगर ⟨हक⟩ लोग ⟨कप⟩ ⟨मपडक⟩ प अतः वही रहे
[बायें हाशिये में: x यह छूट / हो गया / ⟨आव आता⟩ / लिखूंगा]
रहने के स्थान का उद्धार व ⟨भाग⟩ करूंगा। ⟨रे⟩ ⟨तिलावारी⟩ ⟨पर्वतपुरवा⟩ ⟨दादरा⟩
नदी का है ⟨मोख⟩ हो ⟨सवहरा⟩ ⟨पंच⟩ व गोंडा जिला का ⟨मोला⟩⟨मीही⟩
चूंकि ⟨याधरा⟩ ⟨तट⟩ ⟨पखवसा⟩ था अतः ⟨आ⟩ ⟨पडिया⟩ थी ⟨नाना⟩ नहीं प ⟨मवरा⟩
गया था न कोई सगा मामा केवल नाना थी ⟨हड़हा⟩ रियासत के काश्तकर थे।
⟨बड़ाई⟩ ⟨सगुजर⟩⟨शरहताया⟩। उ ही गांव में रवक ⟨शवर⟩ ⟨कबा⟩ ⟨बा⟩ और
गांव के रवक ⟨आत्य⟩ ठाकुर का ससुराल थी। चूंकि नहीं ⟨लाकी⟩ ⟨हाला⟩
पूछा था अतः हम ⟨लासखा⟩ नानी के ⟨सवलावाड़ी⟩ से दोनों न न चला गय
को थी होगी तव मइया व चचेरे ⟨मइ⟩ चंद्रभाल सिंह
उनको यहाँ ले आय और यहाँ मरी।
[दाहिने हाशिये में: x ⟨???⟩ / ⟨मिला हो⟩]

अब हमारे पिताजी के पुरान घर में रहन की बावत उद्धार करके
तव दक्षिणा की कोठरी की बावत लिखूंगा।

पुराना मकान, जिसमे आजकल महेन्द्र प्रताप (कुनमुन) और
राघवेन्द्र प्रताप आत्मज ⟨मु.फ.सेवड⟩ चचेरे भाइ जगदम्बा सिंह का आगे पीछे
दो कोठरी व पूरब रवक कोठरी और आगे छप्पर था कुल ⟨कनों⟩ ⟨चेर साइ⟩ थी।

पुराना मकान जो पांच वावा हो गो का था उसका ⟨वखोरा⟩ वड़ावावा
ठा० बलदेव सिंह ने जव किया तव ⟨संक्षोट⟩ में मेरे पिताजी के
चचेरे भाइ ठा० लालता ⟨वरश⟩ सिंह को दिया। पिता जी के
हिस्से में ⟨जान⟩ ⟨वरु⟩ कोठी छप्पर को सारा वाला हाते में जसे दक्षिनी की
कोठरी बनो है बहुत ⟨लगापदेा⟩ ⟨रोलिवाह⟩ सन १९२३ में हुआ था उसके बाद [ऊपर लिखा: प मिला / हम लोग]
कोठरी बनी और उसके बाद ⟨उसमूली⟩ बाद में जव और न ⟨मरा⟩ हुआ आये
पिताजी ने दक्षिणा की कोठरी को महुआ का ⟨चाल⟩ या मोहललालगंज
तहसील के गांव शेरपुर हवेल से बैलगाड़ी द्वारा लाए था

शेरपुर हवेल में पुरुख वहा रिश्तेदारी में कुछ दिन नवाबो से
भाग कर रह थे। कारण यह था कि लगान ⟨रुह⟩ पाने से ⟨गूरपटी⟩ और
भाग गये। हम वहा कभी नहीं गय न जाना ह वहा किसी का हुआ
वहा उतरा वा गांव मे पिताजी का ⟨ममांत⟩ हो वहीं पर मोहनलालगंज
११ आंशिक · partial
                              ⟨आतरौली?⟩
स्टेशन के पास उत्तर ⟨कूला?⟩ गांव पं० काशीदीन सुकुल भागवत कथा वाचक जो
⟨जवावतर?⟩ में गुरु भाई थे वही ⟨स?⟩ हमारे में जो कथा करते आते थे और जागीर ⟨वे कहा?⟩
के पड़ोस ⟨फिरंगा?⟩ में जमीन्दारी ⟨जव्ती?⟩ तक थी। उसका ⟨उद्धारव?⟩ यों कर ना पाय के उन्हों
कथा वाचक के वड़ ⟨हाके चतु?⟩ भी लाई सुकुल जो दादा के गुरुभाई थे और
ठाह दादा ही कहते थे, ने मेरे कानूनगो स्कूल में जव मैं भर्ती हुआ खर्च के लिए
२०) मासिक १८ मास जव तक ट्रेनिंग ⟨व पूरी?⟩ कर ट्रेनिंग समाप्त ⟨न पाई?⟩ में
३५) मासिक सुपरवाइजर ⟨मरो?⟩ कानूनगो होकर आगरा जिला में नौकर हुआ
दिये थे। माली हालत की तव यह दशा थी। ⟨विछावन?⟩ का एक दरी थी जो
पूरे ट्रेनिंग जमाने में जीवन से ⟨गिना?⟩ रही। गद्दा तक न मिल सका। चूंकि तुम
(रज्जू) ये यह सव जानना चाहते हो ताकि हमलोगों की सन्तान आजकल
की दशा से मिला सके लिख दिया।

पिताजी उन्होंने दो कोठरियों में ⟨भरा?⟩⟨मइया?⟩ का विवाह होने तक रहे
और उसके वाद दक्षिण की कोठरी कच्चा मकान का पुराना ⟨भारा?⟩ होने
पर आये। उस मकान में पूरव वरोठा पश्चिम दो इसकी कोठरी उ चार दो
कोठरी जो जव पक्का मकान ⟨मइयान?⟩ मेरे नौकर हो न पर धीरे धीरे वनवाया
थी उसमें एक पूरव की मेरे और पश्चिम वाली तुम्हारे वप्पा को मिली
उन कोठरियों में दक्षिण की ओर जो होती थी। ⟨रवठ किया?⟩ में वादा ने
वनवाई थी। इस प्रकार मकान की वावत तो जानकारी पूरी हुई।

वर्तमान वैठका व पश्चिम की लाइन कच्ची ईटों से मेरी नौकरी
सुपरवाइजर कानूनगो ६०/- मासिक वेतन व ऊपरी आमदनी में मेरी
पत्नी के स्वर्गवास वाले 1939 ई० में हुआ था ⟨सह?⟩

पिताजी वहुत सूझ वूझ के थे नाड़ी ज्ञान वहुत वढ़िया था वैद्यकी
भी करते थे और गांव में जो जड़ी वूटियां थी उन्हीं से गरीव लोगों
का इलाज करते थे। कुछ लेते न थे। वैठक वाला मकान खण्डहर
के रूप में मोतीलाल ⟨ब्राह्मण?⟩ की ⟨भा जमीन्दारी?⟩ थी। दस का ने
पं० ⟨गणेश?⟩ विहारी मिश्र गोलागंज वाले जहां ⟨हकतो?⟩ भी ⟨माई हारव?⟩ न मुझे
पढ़ तो समय रहते थे। भाग और दुकान ⟨सुज?⟩ वालो ⟨गो?⟩ का आवादी
के वट वार में जमीन्दारी के समय हुआ था। घर में मिश्र जी को
लाकर पिताजी ने दिखाया कि हमलोग व जानवर एक ही मकान में रहते थे
⟨???⟩ देखा और मिश्र जी ने कहा हम में जानवरों को वांधने
का प्रवन्ध कर लो। तव गांव में खण्डहरों का कोई मूल्य न था
अव तो खालो जमीनों न खण्डहरों को हजारों रूपये देकर पाते है।
१२११/९/०४ (पृष्ठ के मध्य में) आंशिक · partial
इस खण्डहर की वगल में जो आजकल गोवर गैस व गृहवाटिका है पुरोहितों
का था। केवल एक वूढ़ी जिनकी पुत्री ⟨सोनवा?⟩ में जहां आजकल हमारे पुरोहित रहते है
⟨विनाह?⟩ भी उतनी ⟨कदा भाव?⟩ पर पं० शिवरतन ⟨ठ?⟩ उन की सेवा भी करते थे चूंकि
केवल चारों ओर कच्चा व वाग ⟨हुरुभी?⟩ था। उनके देहावसान के वाद वहुत दिन
उनके नाती ⟨उहरा?⟩ करते थे। चूंकि वैठका के हाते में लाने का मार्ग न था
अतः एक लाइन पं० शिवरतन ने मामूली पैसे लेकर दे दी तव रास्ता वना।

यह मकान भी जव खण्डहर वन गया हाल सोचा गया था कि हमारे
चारों भाईयों के रहने हेतु भी ⟨मालग?⟩ २ मकान वनवा दी ⟨पंजायत?⟩ ताकि
वर्तमान मकान में वंटवारा में चार चार चूल्हे न हो वन सकते और गुजर
वसर भविष्य में न हो सकेगा और तव ⟨डलों?⟩ में होकर वर्तमान पक्का मकान
का निकास दे कर वैठक वाला मकान आलग वांट में किया जायगा
इस वीच वर्तमान पुरोहित रामचन्द्र ने पड़ोस के ⟨तोलों?⟩ के
द्वारा वयाना ले कर सौदा किया। रामचन्द्र को राधेश्वर सिंह
ने ⟨दिखकारी?⟩ और कहा तुम अव जो गांव में
आते जाते हो तो उहां क वैठक में ठहरते हो तो तुमको
उनको देना चाहिये था। कुछ समझ में आया और ⟨दूटी जा?⟩
जाकर धनन्जय को वताया कि तुमसे हा। उस समय धनन्जय भी
कमरा ⟨वेकर?⟩ दवाखाना खोले थे। वाद में उनके चचेरे भाई ने
भी पूरव वाला गांव भा न ⟨मनवुल?⟩ और ⟨आधिक?⟩ कहो कर दिया
तव समस्या भविष्य को जो ⟨गइया?⟩ की चिन्ता की विषय थी
आधी हल हो कर दो परिवारों का जुगाड़ वना वाकी दो के लिए कैसे
जुगाड़ हुआ वह आगे लिख रहा हूं।

                              ११/९/०४

मिश्र वन्धु की जव जमीन्दारी समाप्त हुई वाग कटहरी वाला वह जहां कहीं ⟨नागे?⟩ थी
वेच रहे थे उस वक्त प्रवन्ध पं० लक्ष्मीशंकर मिश्र चीफ जस्टिस हैदरावाद
हाईकोर्ट आंध्र प्रदेश से रिटायर होकर ⟨कन्नावाद?⟩ में कोठी वना कर रहते थे
उनकी जमीन्दारी में पं० जागेश्वर प्रसाद ⟨अवस्थी?⟩ ⟨मन्जर?⟩ थे और
जमीन्दारी न होने जान पड़ने को कन्या निकलने में एक जज साहव को
प्रवन्ध के पहलों ने वता दिया था और वह वागात की विक्री करते थे।
⟨अवस्थी?⟩ जव कभी गांव में आते थे वड़े भाई के साथ ठहरते थे
और उनको आवभगत करते थे वह ⟨करहरी?⟩ वाग में गोंडाई व विक्री
करवाता थे और नगर ९ हजार की कहते वनवता तो केवल ७००) वताता और
३००/- स्वयं हड़प लेते थे और ⟨पालहा?⟩ की गोंडाई में भी खर्चा अधिक
13 आंशिक · partial
दिखाते थे। जब विक्री की वात चला रहे थे ठा०चन्द्रभ का. ⟨गुरुबख्श?⟩ सिंह
भइया से कहते थे दोनो साथ में ⟨लाला?⟩ मगर गोलागंज में रहने वाले
जाज साहव के चचेर भाई पं० प्रताप नारायण मिश्र से कह ⟨नातो?⟩ थे कि मैं
ठा० भारत सिंह (मेरे वड़ भाई) का सामना तो नहीं करूंग पर मैं जो मूल्य वाग
का वह देना चाहे उससे १ हजार आधिक दूंगा। मैं रिटायर होकर घर
आ चुका था और यह सव ज्ञान कर विना भइया को ⟨वताए?⟩ गोलागंज
रविवार के दिन ⟨अवकाश?⟩ थी जो स उनके घर पर गोलागंज में ही कोठी की
वगला में मिला और उनका २५०) दो सौ पचास रूपिया मेरे देने ना नुकुर
दिखावे भर को करते रहे मगर मैंने कहा आप ९ हजार से ले लो व कहना
यह ⟨पैतृक?⟩ प्रथा न जो (मेरे वड़ भाई) को मैं आभारी हूं और हाना
तव वाग की विक्री का ⟨लांस?⟩ उचित नहीं। खवर वह सायकिल
उठाकर फैजावाद रोड जज साहव के पास गये और वताया कि
वह लड़का जो आप की कोठी में कोठरा में पड़ता था वाग लेन
आया है तव जाज साहव ने स्ट्री की प्र⟨किरन?⟩ कर तो है कहा  [पंक्ति के ऊपर छोटा लेख: ⟨अत: श्री जाते?⟩]
ठा० गुरुबख्श सिंह का लड़का और इस पर फलस्वरूप कहा जाकर
गत चार सालो की आय व्यय का लेखा लाकर पेश करो
अव वेईमानी से कहता का विक्री का कमी व मजदूरी में वहत
जो। दिखाते थे उसके फल स्वरूप औसत प⟨तर?⟩ राशि कम आई
वाग ९९ वीघे कच्चा में थी उसमें ⟨१२?⟩ पड़ आधिक ⟨ठूंठ?⟩ और और
हरे मरे फल देने वाले तो कम थे। अतः उन्होंने कहा ⟨उस?⟩ वाग को
और आगर और कहीं. कुछ ⟨क्षेत्र?⟩ फल ⟨हरहा?⟩ गा० के पास वचा हो उसे
भी वेच दो। यह वही स्थान था जो सामने का वाग लिखवा था मगर
और उसमें पिताजी और मिश्र जी के साथ में १ विस्वा १ विस्वांसी
पक्का ⟨हिस्सा?⟩ और ८।। विस्वा मिश्र जी का था वाग केवल लिखवा था
परती था और खाड़ ⟨करवा?⟩ था। जाज साहव ने हिसाव देखा और
कहा कि ८ हजार में ⟨वेदो?⟩ में २ हजार लेकर गया था व ⟨करवया न?⟩
वहा और अवस्थी जी ने न रसीद कागदो में न भइया को इसकी
वावत नहीं वताया। जव मैं रिटायर हुआ तव ग्रेचुरी आदि जो आव
मिलती थी नहीं दी जाती थी जो लेता था तो पेंशन को विक्री कर ली
जाती थी मगर यह ऐच्छिक थी परन्तु मेरे रिटायर के साल
कम्पलसरी था और ५ हजार इसके १ हजार वीमा १२ हजार ए. P. F. व
श्री. P. F के १२ हजार मिलाकर १८ हजार की नकदी मिली पेंशन
१६७) मासिक वनी और छुट्टी के ४०००) के ३०/- कट कर
14 आंशिक · partial
केवल १२५) मासिक मिलने लगे। तव तहसीलदार का
वेतन मान २७०) से ६००) का था और नये ⟨कमसच्चांव?⟩ रिटायर
हुआ तव २७०) मासिक पाता था। उसी पर पेंशन मिली
उस समय तहसीलदार फ्रस्ट क्लास मजिस्ट्रेट थे और
[इस पंक्ति में केवल पीछे की स्याही की धुंधली छाप है — पढ़ने योग्य लिखावट नहीं]
सजा कर ⟨सकते⟩ और ५००) रु० ⟨जुर्माना करण⟩ का अधिकार था। तव
प्रशासन के और न्याय के अदालत केवल ⟨थाड?⟩ ही जिला
में अलग ⟨गहुई?⟩ थी।

आव खेतीवाड़ी और वागात की रोपाई को छोड़ आपन
जीवन की जानकारी हेतु कुछ छूटी वात लिखता हूं।*
मैं उस समय जव गांव में लहान गोद में ७ मास के
वे पत्नी रहता था मतलव तरवगंज तहसील में गोंडा जिले में
नियुक्त था। तरवगंज अव तो आवादी से घिर गया है
तव केवल सरकारी तहसील थाना डाकघर रजिस्ट्री
आदि तथा सुपरवाइजर कानूनगो ⟨डिगीतर?⟩ सर्किल का हेडक्वाटर
था जहां कानूनगो का कच्चा मुकाम था। उस समय
का ⟨इंटू?⟩ ⟨कालतेक?⟩ न था। छन्द फलांग पर ढोदपुरवा वाजार में
आवश्यक सामग्री मिलती थी। तहसील के कमचारीयों के
रहने का कोई प्रवन्ध न था। एक पुराना फूंस सराय था
उसी में कोठारीयों में ⟨अकेला?⟩ रहकर ⟨वनातो?⟩ हुआ था।
तहसीलदार दो नायव तहसीलदार थे इन के आफिस व सव रजिस्टर
का आफिस था ⟨कहला?⟩ ग सायकिल प ⟨???⟩ मोहवरे को
शह घोड़ा के गांवों में आत जात थे। तहसीलों में ८ वजे के
लगमग तहसीलदार तय्यार होकर काम में लगा जाता पहले
⟨खवजाने⟩ का हिसाव का स्याहा और फिर प्रशासन न कार्यों को
कमचारीयों को अफ से आन वाला पत्रों का जवाव लिखवकर
डाक से चपरासी सदर कार्यालय को ले जाता था।

मेरे ⟨वृ?⟩ तहसील के क्वाटर में ५ मास को ⟨दुही?⟩ होकर कायाम मुकाम
तहसीलदार रहता था मुसलमान ⟨???⟩ पहली
के कोई सन्तान न थी। मैं प्रयत्न किया कि क्वाटर खाली हो
तो ⟨???⟩ पत्नी व ⟨दुसरे लड़का?⟩ को लाव। तहसीलदार एक
व ⟨लियाके?⟩ ⟨कक्कर?⟩ थे क्वाटर में विधुर रहे न से छोट
वच्चों का देख भाल के लिए उनके ⟨वोलाया?⟩। जिला के गांव के
वारी नाकर ⟨पर?⟩ वही भोजन आदि वनाते थे। अत: मैं भी अकेल
एक ⟨पेसु?⟩ नाकर और ⟨वाभरा?⟩ ⟨चौफेरी?⟩ रोटि कारे के खाया रहत था।
१५ आंशिक · partial
प्रयत्न करने पर जिलाधीश महोदय के पास वह नायव तहसीलदार
गये और उनको प्रभावित कर के मुझे गोंडा ⟨को देश आ?⟩ जोकर वही ⟨को?⟩
वुलाया और कहा जहां ⟨भाव?⟩ तक आकर हर हो कहा ⟨कु?⟩ रहो वाले हो
मैंने वताया लखनऊ जिला के इटौंजा रेलवे स्टेशन के एक गांव
का निवासी हूं। जिलाधीश महोदय की वुआ नवाव साजिद
आली की मां थी। नवाव के ⟨तत्र?⟩ नज़दीकी घर ⟨गुसामण्डी?⟩ में था
कहा ⟨सलाव?⟩ में जनता के लोगों ने जो सहायता को ⟨हेल्प?⟩ न के लिए
क्यों ⟨शिफारिश?⟩ करो कि क्या पुरस्कार दिया जाय तथा सरकारी
कर्मचारी यों में अच्छा कार्य कर ने का क्या दिया जाय लिखा।
⟨??? — पंक्ति फीकी स्याही में, पढ़ी नहीं जा सकी ???⟩
नायव तहसीलदार व ⟨नोतव?⟩ की शिफारिश करूंगा। लोग कह मैं
लखनऊ को लखनऊ का मिला गये ⟨???⟩
तो घर ताल तोला भार ⟨???⟩ न करूंगे, और तान को गा० ही मेरे
पहले सो को सूचना सरकार कहला पर आ गया था। नौकर न
आते ही मुझे चिट्ठी (तार) दे दिया पढ़ा तो वहुत दुःखी था
समाचार पत्नी का हज में मरन का था तहसीलदार महोदय
⟨??? — पंक्ति फीकी स्याही में, पढ़ी नहीं जा सकी ???⟩
साथ ⟨लिला गा आमा न???⟩ करा देखा कि तो सुरत ⟨शीश?⟩
में तो पता चल जायगा ⟨भैंडुर?⟩ है चिट्ठी थमा दो पढ़ा
तो सुन्न रह गये और सभी सरकारी सराय में रहने वाले ⟨वु?⟩
⟨??? — पंक्ति फीकी स्याही में, पढ़ी नहीं जा सकी ???⟩
⟨???⟩ घर जाने को लिए तुरन्त प्रस्थान की तैयारी
को ताड़कर साहव ने कहा जो हुआ वह हुआ अव मुझे ले
टीका लगा वालों तो जाओ का तो एक सिपाही को
⟨??? — दो पंक्तियाँ फीकी स्याही में, पढ़ी नहीं जा सकीं ???⟩
स्वीकृति के साथ ⟨सुहाग भाति?⟩ भी लिख भेजा वह
इस वात से दुःख दूर कि कुछ दवाव से ⟨छाटे नू?⟩ मिलन
⟨गर गह?⟩ देहात आ ⟨???⟩ खवर भी घर का तो और
⟨??? — पंक्ति फीकी स्याही में, पढ़ी नहीं जा सकी ???⟩
तुम्हारी नानी ठा० ⟨पल्टूकर?⟩ सिंह भी चले। रास्ते में आपनी
लड़की से विवाह कर ना न को कहा। उस समय मेरी अवस्था
३२ वर्ष की थी। मुझे वहुत दुःख पर पढ़ कर हुआ मगर मन मसोस
⟨??? — अन्तिम पंक्ति फीकी स्याही में, पढ़ी नहीं जा सकी ???⟩

[नोट: इस पृष्ठ की कई पंक्तियाँ हल्की/फीकी स्याही में हैं जो स्कैन में लगभग लुप्त हो गई हैं।
 मूल कागज़ को दोबारा, बिना ब्लैक-एंड-व्हाइट मोड के, ग्रेस्केल में स्कैन करने पर ये पढ़ी जा सकेंगी।]
१६ आंशिक · partial
घर आकर पता चला मइया ⟨डाक्टर?⟩ को इटौंजा से
लाए उन्होंने उस समय जो इलाज उपलब्ध था किया मगर ⟨वचा न को कार तो स्वास ल?⟩
मेरी पत्नी को तो वहुत पहले ⟨जान सन्तान?⟩ थी एक देहाती हस्तरेखा देख कर
वता चुका था कि ⟨ऊपर सकाग?⟩ तुम्हारा संसार ⟨दुःखा?⟩ कह हुआ भरता समय
लहान को देख नह वु मांगा तो भइया लाए मगर उन्होंने कहा कि अव तो
आंखों ⟨सरोशनी?⟩ हो चला गई। वार २ यही कहती रही कि अगर वह होता
तो एक वात को याद दिलाती लोगों न पूछा ⟨वता आऊंगा?⟩ का ने
पर उन्ह वता देंगे मगर उन्होंने वताया नहीं। मैंने आया और समझ गया
⟨वुढ़ापे?⟩ में सन्तान होन ⟨सव प्रा हो गा?⟩ इसको चिन्ता व कर हे तुम तो चला
पूरा ⟨को शा?⟩ हो जा ⟨को गाम?⟩ मेरी सेवा चारों भइयों के परिवार का कोई न कोई
⟨कर गा?⟩ क्या कि तुम्ह जानकारी है कोई न कोई ⟨करत?⟩ का कारण
⟨???⟩ २० को ऊपर की पढ़ाई करा कर सव को आपन पैरों पर
⟨खादवा?⟩ भी सव भाग्य वना था हो और मेरा वह अनुमान विलकुल ठीक रहा

मेरी सन्तान हेतु तथा पत्नी को उस समय यूनानी दवा का ⟨मजान?⟩
को थी फलस्वरूप सन्तान होन लागी मगर पत्नी की कमजोर
स्वास्थ्य के कारण दो पुत्रियां मरी पहली पैदा हे तो दूसरी ⟨छठी?⟩ के
दिन तव ⟨वखर वाल?⟩ मेरे ⟨मंत्री पवोत?⟩ में गाय को मन दे न वाला
वैद्यराज ने कहा स्वास्थ्य ठीक न होन सगर्भ में भ्रूण को उचित
मां को में खुराक न मिलन से ऐसा हो रहा है। जव को जव
गर्भ रहे तव वताना ता उनका ⟨कृपा?⟩ से ⟨फला पूता?⟩ वना और
उसका सेवन करन से पत्नी खूव मोटी हुई फलस्वरूप वालक
लहान खूव स्वस्थ पैदा हुआ और जो ⟨वितालवत?⟩ के दे व से
वरिष्ठ पद से ३०.११.१९९७ में सेवानिवृत्त होकर मेरी ६२ ⟨व ज?⟩ की
अवस्था में भी जीवित है ⟨हार्ट अटैक?⟩ में वचा था और ⟨रहस?⟩ से
चिट्ठी कृपा को ⟨स्थिति?⟩ ला में लिखा कर ⟨किजाविलु वन गा गिलगा?⟩⟨आ प्रशान ७ ८ ०८?⟩ में ⟨दोहा करोन?⟩ करक वाल वदला और
⟨चमनिया?⟩ भी। आव कोई कष्ट नहीं है।

पत्नी से मैंने कहा था कि अगर तुम मर तो जाओगी
तो मैं दूसरा विवाह न करूंगा तुम जो ⟨सो साफ न। मुहा हो तो?⟩
तो कहती मुझ सोन क आभूषण वनवा ना ओ और जो
कुटम्व का जो जवार मन ना म है वह भइया और मेरी इच्छा की
पूर्ति ही है। पुत्र तो सेवा नहीं कर रहा उसका विवाह गणपति
ने मेरे यह कहन को कि सरे पुलिस या आवकारी विभाग के

[हाशिये पर: दूसरी विवाह कि मैंने कहा था कि तुम अगर ⟨उन्नीस?⟩ वरस को आयु में भी जो आगी तो मैं / गये महारा /
 १५-२० ⟨जिला?⟩ आये पिताजी / आर ⟨गर?⟩ है २० को ऊपर को / ⟨कक्षर डिप्टीलोक?⟩ /
 मेरे इस निश्चय को टाल न सका / ⟨???⟩ कर तो था]
१७ स्पष्ट · clear
अधिकारी की पुत्री से न करना मगर उनका ध्यान नहीं गया
चूंकि लहान डाक्टरी पढ़ रहे थे और विवाह करन वाला तो वह तेरे
मिलते मगर लहान न मुझे पक्का ⟨एरवाकि?⟩ म० कमी विवाह न करूंगा
⟨एम.ए.?⟩ कर के ⟨ही?⟩ करूंगा मगर हो नहार वलवान होता ⟨कह?⟩ में ⟨उनस?⟩
कहा रामू तुमसे छोटे है और वह विना तुम्हारे विवाह हुए विवाह न
करेगा। वह ⟨एम.ए.?⟩ कर चुक है और अच्छी नौकरी आगर न मिली
तो विवाह ठीक जगह न हो सकगा। अतः मना न करो। विवाह हुआ
चमड़ा देख कर और पुलिस सव इसपेक्टर पुत्री इसर विवाह ल
जव पहला पत्ना जो रंग रूप में ठीक थी वलिया जिले में दूसरा विवाह
खूव सूरत लड़का से कर के स्वयं व उसकी माता ⟨नि. ड.?⟩ का शिकार हुए
और ⟨फिर?⟩ भाई को जिला जज ने गार्जियन कह आवकारी विभाग
के सहाय क आवसर के ⟨जिम्म?⟩ पालन पा घरा हुआ। आव
दोनों के कुसंस्कार मेरे गरा पति का मना करन प लहान का
भविष्य म जीवन भर पत्नी का सेवारत ⟨वंचित?⟩ रहना पड़ा।
गणपति ने चूंकि पुत्री वलाक्षी(?) का राजिस्ट्रेट लाड़ की एम.ए.
विवाह चाहते थे और वह संयोग मिल गया। वलिया जिले
में 1942 के आन्दोलन के समय जव चीतू पाण्डे ने जिलाधीश
की कुर्सी छोड़ा आ उसके वाद एक आग्रेज फौज से रिटायर
⟨???⟩ नोदर साला फौजी हाकर कव्जा को यातव लूट कर
वहुत धन लहान के ससुरा न का पाया और उसमें से ⟨२५?⟩ हजार तो
उनके वहनाई पिता आवकारी गार्जियन दवा वह और ७० हजार
सहायक आवकारी महोदय के जो म ६५ हजार जमा हुआ
एक भूमिहार को सव इंस्पेक्टर न कत्ल के मामला में चालान
न कर के उसके एहसान में वह लहान का ससुराल में रह कर
दोनों पुत्र व पुत्री (लहान को पत्नी) को मुफ्त धारा कर
जो दोनों की पत्नियों को सन्तान हुआ था और चकवा ⟨लगान?⟩
कर कमाई कर के गार्जियन को देते रहे लहान से मेर कहन
पर कि रामू का विवाह होन न होगा विवाह के लिए मना न किया
और एक रुकया ⟨रूह?⟩ के आकड़ पुलिस व आवकारी के
कुसंस्कारों का जो परिणाम होना था होकर रहा। और
आव भी सीतापुर पेंशन लेन जाता था। रात उनके साथ
रेलवे क्वार्टर में रहता था। वह रेलवे कन्याओं की सेवा
न ⟨सारे?⟩ एक डाक्टर को चाहिये विना कुछ लिए करते थ. और
रोज़ अस्पताल का काम निपटा कर जाकर
१८१२.९.०४ (पृष्ठ के मध्य में) आंशिक · partial
लखीमपुर वुध वाला या सिधौली की ⟨ओर?⟩ न आकर ⟨महीने?⟩ में
१ हजार का ⟨भत्ता?⟩ वना कर रात में जव लौटत, पत लू पत ना
उनका उठ कर सो जान न ⟨कराता?⟩ थी वह स्वयं रही जाकर
खावे थे और मेरी आंखवर में आ ⟨रुका जात?⟩ थ कु मे थी
भरा चाहिये था कि मैं न ही लहान २ का विवाह के लिए दवाव देकर
से सो वह धान का दोषी था। खवर अव जो हलाहल तुम (रज्जू)
सव जानत हो। अव मैं अपनी वावत जो वहा

लिखूंगा। और पढ़ाई का हाल गोलागंज में रहन लखनऊ हो रह गया अव ⟨जालाम?⟩
लिखूंगा।              १२.९.०४

⟨जो गाय था गंगाराम?⟩ की सलाह के अनुसार ⟨प्रगाढ़?⟩ वना कर आपना
इरादा चला ⟨लू?⟩ र के मध्य प्रदेश में जाकर हुआ का ⟨भ्रमसमा?⟩ सुविधा को से
भर पूर स्थ न के कारण तथा कवा तहसील में पेंशन के जमा वान हु
था पर जो मन में लिखन लगा तो पिनक का गुरु ⟨भाग?⟩ न एक पन लिखा
कि अगर आप गया तो लोग सम भगा कि पेन कह सवाम कसर एक को
है और उधार सीतापुर गांव स्कूल विक्रेता कृपाला व ⟨तुर कुछा?⟩ वह री
⟨रवगा?⟩ ने वताया कि आश्रम अव पुरान आ श्रम न रहे सा दारो
भाता दारी व कान्य को सुविधारे वरावर नहीं है तो ह ⟨दो?⟩ घर मह
रह कर देन चर्या वासा प्रस्थी वना हूं। सह कर था प्रातः शौच से न ⟨हेतु?⟩
हो सीतापुर रोड वकल ⟨खा?⟩ कर ⟨निमाणा?⟩ थी न टावर कच्चा को दारों को
सेवा से ⟨निधक?⟩ आम कर न ⟨दूर?⟩ पर ⟨प्रण?⟩ ⟨मनट आराम?⟩ आ रह प
मेरी की कसरत कर एक घर आकर तव्यार गोर ⟨गन गा कु ना?⟩ रखा
मिला जाता और समाचार पत्र भी अध्यात्म के साथ स्वाध्याय
भी सून वता रखता व्यायाम का प्रचार प्रसार ⟨न ओ?⟩ पन आकल
निवाह करता रहा हूं। एक कोतुला मध्य ⟨दुई?⟩ भी रिय भर होन पर कुछ
वातों को उन्हों स्व रह गया वह लिख रहा हूं थोड़ा तो पहलो लिख चुका हूं
कुछ और प्रकाश में ला ऊंगा। ⟨रवता?⟩ और वाग की तय्यारी व विकास हेतु
सम उपकार से गा न हो कर से स्वको मदा किया आर न से नो जा क बाकर
आपन ⟨रखता?⟩ में चार वृग हु का वर्तमान विकास तो प्रजातियों का पनी
⟨निजी?⟩ सिचाई साधन से पैदा कर के वाजार मूल्य पर जन ⟨रवक?⟩
प्रवृद्ध कुशल का का उपल कर ना ता था। वड़ के ⟨स्वर दच?⟩ हो कर गा हो
ग्राम सभा को का स्वास्थ्य ⟨सा न त्वो?⟩ गिशि ⟨झा?⟩ क थ और एक ग्राम सभा
को दस हो कि से ग्रामवासियों को वहां से प्राप्त होन वालो सुविधाओं
को मुझे प्राप्त करन में सहायक थे। उस समय के
हुई कि गांव में ⟨उन्नत आदि?⟩ आ दे को दख रख करत थ अव कोई
१९ आंशिक · partial
खण्ड विकास अधिकारी गावों में नहीं आते केवल
हर फसल में एक दिन सहायक विकास खण्ड अधिकारी
मीटिंग कर के जानकारी देते है। विकास कार्य जो गावों का मुख्य उद्देश्य वह
केवल हवाई है य रु का दुरुपयोग ही अधिक होता है
क्योंकि अवैध स्वार्थ पूर्ति व अर्थ लोलुपता का हर घर में ही ताण्डव है
तो सरकारी अधिकारी कर्मचारी जाकर रह है वहॉ तो समयानुसार ही
प्रदूषित है। बीच मे कुछ दिन ⟨ग्राम?⟩ विकास हेतु सरकार विशेष पद सृजित
कर प्रबुद्ध ⟨ग्राम?⟩ जनका का परामर्श कर देता य आज वह पद ही समाप्त हो गया
मै तो अब ग्रा॰ वास ही ⟨?⟩ जीवन चर्या मे ही रहता हुआ खेती आदि
का हाल चाल किसी से पूछता तो हूँ। जब पैदा हुआ तब से जो वृद्ध लोग
आया है उस समय की विपत्ति वर्तमान पीढ़ी को जानकारी मे नहीं
है उनको जानकारी हेतु ⟨जो?⟩ अपनी जीवनी मे लिखवा। अब तो
य न ⟨ग्राम्य?⟩ न शहर वालो सभी सुविधाय उपलब्ध करा दी है
बिजली हमारे गाव मे बरसो बरस आती है क्योकि गोमती पर लिफ्ट कनाल
से पानी उठाकर तराई के गाव सुल्तानपुर का सिचाई हेतु बिजली विभाग
का आदेश है। गावो और जिला मे नेताओ का अदला बदली मे
कही कही बिजली सदैव मिलता है वना अन्यत्र ⟨चलता?⟩ है।
य न ⟨ग्राम्य?⟩ न गोवर गैस हाथ मे बोरिंग कराकर ⟨टुल्लू?⟩ पम्प द्वारा
देता पर टंकी रखवाकर घर मे पानी का सुविधा कर रखा है
गावो के ⟨?⟩ सरकारी सहायता वालो मे जलास्तर घटन
से पानी नहीं है। सरकारी हैण्ड पम्प गॉव भर मे प्रधानो
को आ ⟨रेल?⟩ प्रयत्न करना से ⟨जिवार?⟩ ले आधिक स्व ⟨???⟩ जाना
ल का ⟨प्रबन्ध?⟩ हुआ है वर्तमान प्रधान कुलदीप सिंह ⟨रग व,?⟩
अविवाहित युवक जिनको प्रधानो का संस्था का अध्यक्ष
है और गाँव को सर्व विकास ⟨सञ्चयानित?⟩ रकम के
अन्तर्गत अपने गाँव मे मकानो को पक्का करने हेतु
निबलवर्ग के लोगो को चेक द्वारा धन दिलाकर
⟨छाकवाला?⟩ कच्चा घरा से मुक्ति दिला दी है। मेरे घर मे
विकास तथा शौचालय व ⟨हो?⟩ ⟨पखान?⟩ हेतु घर वाहर और गोशाला
मे न लगा कर सुविधा करान मे चंद ⟨रोज?⟩ प्रधान ⟨युवक?⟩
ने प्रबन्ध करा दिया है। हर शौचालय व स्नानघर मे ⟨???⟩
का सुविधा है। फिर भी शहर मे बसने की दौड़ मे पूरा परिवार के
रेटायर लोग गाँव मे न रह कर लखनऊ व अन्य शहरो मे बस रहे
है और मड़ैया की चिन्ता से बने मकानो को ⟨पूरीत?⟩ करके मौत ही ⟨मजबूरी है⟩
२०14.9.04 कठिन · difficult
गाव मे अपना और गणपति और महेश्वर की पढ़ाई की वावत लिख रहा हूँ
पहल साला मै 1923-⟨24?⟩ ई० मे गया। गोला गंज का ⟨मिश्रबन्धु?⟩ को की
कोठी मे रहने की जगह मिलनी आ ⟨काऊ?⟩ अलग कोठरी न मिली मेरे
चाचा ठा० उमराव सिंह मिश्र जी को ⟨कहला?⟩ कर ⟨भउन?⟩ की ⟨आगे?⟩ कोठरी ⟨पीछे?⟩ ⟨मी?⟩ मे,
खाना पीना का सामान रख वड़ी वैठक मे रखकर वरामद मे ⟨जो?⟩ चौका चूल्हा पर
रह कर बे नोन खान लगा। रोटी ⟨तावका?⟩ ⟨???⟩ बनाना न जानता था
चलाता समय आटा गूंथना व रोटी थाप के फुलका सव ⟨बनान?⟩ को वता दिया गया था।
पढ़ाई लिखा ⟨हुआ?⟩ ⟨न⟩ ⟨स⟩ ⟨वताल?⟩ लगा ⟨था⟩ ⟨का⟩ ⟨पंजी?⟩ का मिलता था एक पैसे की लकड़ी मे
⟨भो⟩जन बनना लगता। तब रुपये मे सोलह आने और एक आने मे चार पैसे होता थे
आठ रुपये एक ⟨मन?⟩ ⟨पैसा?⟩ का ⟨कोऊ?⟩ जानता ही नहीं। जान ⟨के?⟩ संस्कार के कारण,
नित्य स्नान व ⟨सन्ध्या?⟩ गायत्री भजन ⟨पूजन?⟩ सन्ध्या करता था। रहना नरक था रहा जिसमे
केवल दो कदम ⟨चलना?⟩ पड़ता ⟨जो⟩ ⟨न⟩ भरी रहता था कि बिना नाक बन्द किये
वहाँ ठहरना दूभर था ठाकुरा आदि अन्त्यजो ⟨नौकर?⟩ ⟨पउन?⟩ को रही अलग ⟨थी⟩
फिर भी ठाकुर ठाकुर ही काफी ⟨थे?⟩ अत: भरी रहता था मे केवल सवेर ही
रही मे जाता था। महतरानी दोनो समय आती थी। फिर ⟨मोटूपुरे?⟩ दिन
प्रात: भरी ही मिलती थी। मे नीचे के वरामदे मे रात का ⟨चवारियाँ?⟩ डाल दरी
जो विवाह मे ⟨रंग⟩ ⟨गाव?⟩ ⟨रंगी?⟩ ⟨गा?⟩ मिला था बिछाता था यही दरी कानूनगोई मे
मे ⟨???⟩ ⟨विछान?⟩ ⟨के⟩ ⟨???⟩ ⟨ऊन?⟩ का ⟨मा?⟩ चादर ⟨गिरावा?⟩ के
कारण न ⟨सोवत?⟩ ⟨हुई?⟩। कोठी बहुत ऊँचा कुर्सी पर थी ⟨जो⟩ चौबाहर
का ठिकाना था ⟨दाजी?⟩ ⟨नपवाना?⟩ के बगल आँगन ⟨साहदादा?⟩ ⟨हा⟩ ⟨दालान?⟩ २ मकान था
बीच मे बरामदा व भीतर कोठरी थी। पीछे ⟨औरतो?⟩ के रहन को
⟨आजा?⟩ ⟨दाटो?⟩ द्वारा ⟨चौका?⟩ ⟨???⟩ बरामदे व ⟨चछरदावारी?⟩ था ⟨कदे?⟩ ⟨रखाना?⟩ था
ऊपर बड़ा हाल तत्कालीन कुर्सियो से ⟨सज्जित?⟩ ⟨हो⟩ दीवारो पर
जानकारो द्वारा बनवा ⟨दियाँ?⟩ चित्रकारी थी बगल मे एक और
⟨पलंग?⟩ ⟨शाही?⟩ ⟨विहार?⟩ ⟨सा⟩ ⟨तख्त?⟩ रखता पर विछौना डाल रहता थे दूसरा और
⟨जो⟩ ⟨सिस्टर?⟩ ⟨पहला⟩ ⟨कमरा?⟩ ⟨शावर?⟩ का कमरा था। एक नयां कमरा ऊपर
और पूजा घर स्नान घर का ⟨रहता⟩ ⟨थी⟩। नये कमरे मे ⟨दानादक?⟩,
बड़े भाई ⟨साहब?⟩ ⟨महेश्वर?⟩ जी ⟨जो⟩ वकालत पढ़ने को रहत ⟨था⟩
मेरे रहन को ⟨वाउरी?⟩ ⟨कैसे?⟩ मिला ⟨अब⟩ ⟨वह⟩ ⟨लिख⟩ ⟨रख⟩ ⟨हो⟩।
एक कोठरी जो ⟨हुडु?⟩ ⟨उसनाल?⟩ ⟨से⟩ मिला था ⟨माली?⟩ के शिवपाल माली
खाली ⟨छुर?⟩ मे मेरे चाचा ठाकुर लालता सिंह की पहली।
⟨स⟩ सुसराल के निकट कर ⟨भोला?⟩ ⟨वड़?⟩ गाँव के पश्चिम मे रहते थे
⟨छुन?⟩ ⟨सपन्न?⟩ ⟨हरु?⟩ व दिन ⟨मेट?⟩ ⟨हातो?⟩ ⟨पाँव?⟩ ⟨ह⟩ मिश्र जी के जिलेदार के
⟨???⟩ कोठरी मे ताला लगा ⟨वताय?⟩ मे ⟨नऊन?⟩ ⟨स⟩ ⟨आया?⟩ ⟨नो⟩ दिक्कत ⟨वताड़ी?⟩
२१ कठिन · difficult
तो कोठरी मिला वगल मे दो कोड़े ⟨भूता?⟩⟨हाँद?⟩ को ⟨वदवू?⟩ थी मगर ⟨पढ़े?⟩
कोठरी मिलगई तो भाग्य ⟨खुदा?⟩ जैसा आपना व पीछा को जो खान पीन के सामान का।
वाला कर रखवा लिया इसी मे वाद गणपति व महेश्वर भी शामिल हो गये
वाहर रख वड़ा पत्थर ⟨पाउतप?⟩ लालटेन से पढ़न को ⟨रुपया⟩ ⟨वधा?⟩ थी विजली का ढीमे
थी मगर हिम्मत न थी। मगर मांगता तो शायद मिश्र जी ⟨रख⟩ ⟨वल,⟩ ⟨वरखा?⟩ दे देते
⟨लाड़?⟩ ⟨मका?⟩ दो का ⟨पयाला?⟩ जो मिश्र जी व, चौकी दारोगा ⟨जो⟩ ⟨वाला⟩ ⟨विरणधारी?⟩
⟨कालायपा?⟩ ⟨वहु?⟩ कोठरी मे ⟨विका?⟩ ⟨चकर?⟩ तीनो भाई चाचा मिश्र ⟨न⟩ मे ⟨हु⟩ पढ़न लगा।
तव आजकल की भांति पढ़न वाला को पुस्तके आजकल की कमीशान के
प्रमोशान मे वार २ तह वदलाती थी वही दुकानो पर ⟨आप?⟩ को विधा ⟨पी?⟩ वेच जाते
थी मिल जाती थी। ⟨कात?⟩ ⟨है⟩ हम लोग वही कम मूल्य मे लेकर पढ़ता थे और
यह न जानकर कि आगे जीवन मे क्या वदलाव आवेगा तो ⟨नोके?⟩ पढ़ाई के विषय
हिन्दी, दूसरी भाषा उर्दू, संस्कृत इतिहास और गणित तीनो प्रकार, गणित
अलजवरा और रेखागणित के विधा ⟨जीवन⟩ ⟨गया?⟩ खैर मे हाईस्कूल
मे ⟨मीहर?⟩ क्लास मे ⟨इटा?⟩ ⟨जाना?⟩ को पढ़ाई का ⟨लड़ो?⟩ ⟨लात?⟩ नम्बर वन पर रहा
हाईस्कूल मे ⟨हमाई?⟩ मे मेरे नम्बर डिस्टिंग्क ऊपर गणित ⟨मऊधा?⟩ मे ⟨लेतो?⟩
मास्टर मेरी कापी रोक सवको वाट दी और मुझे खुलाकर पीठ थपथपाई और
कहा कि मेरी दुआ ता तुम्हारे हाथ है हाई स्कूल मे आजा तो न ⟨वहता⟩ है ⟨कम⟩ ⟨इतिहास?⟩
आये है जिसका नाम ⟨हहा?⟩ मे स्कूल मे वोर्ड पर साल सहित लिखा हुआ ⟨वका?⟩   [ऊपर लिखा: है / वोर्ड]
तुम्हारा नाम ⟨लाना?⟩ होगा। मगर ⟨मा⟩ ⟨शोवशा?⟩ गणित के पर्चे ज्यो मेरी कापी ⟨दे⟩ ⟨दी⟩ ⟨रात⟩
का मेरा शिर दर्द ⟨वदा?⟩ ⟨नाक⟩ ⟨वदहू?⟩ ⟨कु⟩ ⟨हुई⟩ मगर ⟨ठीक⟩ समय को ही ⟨मृत्यु?⟩ ⟨देन⟩ वाला
⟨नाला?⟩ ⟨आगमा?⟩ ⟨उस⟩ ⟨न⟩ हाल सुनाता दूकान से एक २ ⟨पैसे⟩ मे ⟨जा⟩ ⟨लाया⟩ ⟨कुटकर?⟩
सूंघा तो पीला पीला ⟨वलगम?⟩ ⟨ढेर⟩ हुआ और ⟨ताड़⟩ ⟨आगउ⟩ फिर ⟨मी⟩ ⟨नामहान?⟩ हुआ
⟨शार?⟩ पर ⟨चके?⟩ दो सवाल जो मे दूसरे लड़को को पढ़ाया करता था मुझे ⟨वी⟩ ⟨भारी?⟩
के कारण हल करने से रह गयी। पर्चा दोवारा कापी देखने लगे प्रश्नो के उत्तर
ठीक पाकर आधा घण्टा पहले ही मे ⟨जा⟩ मास्टर निगरानी करते थे कापी दे दी
और वाहर निकलने के पहले ही याद आई और अगर ⟨प्राथी?⟩ ⟨न⟩ ⟨करता⟩ तो मास्टर
साहव कापी दे देता मगर देहाती तो था अत: कापी दोवारा न मांग सका और
डिस्टिंग्शान रह गया। सभी विषय मे ⟨पंच?⟩ ⟨आठ?⟩ ⟨कहो?⟩ ⟨से⟩ I DN मिला गया
और संस्कृत मे डिस्टिंगशान भी तव I DN ⟨पानवाले?⟩ ⟨वहुत⟩ ⟨काटी?⟩
⟨विरणा?⟩ थी होता था मास्टर साहव गणित का पर्चा होने के पहले वाद दोपहर
हाल मे कुछ सवाल दोहरवा देता थे और ⟨रेसे?⟩ ⟨आठ?⟩ ⟨नवो?⟩ थे ⟨जिउनके?⟩
वताये सवालो मे ⟨रूप?⟩ भी ⟨क्लास⟩ के पास होने भर नम्बर मिला जाय करते थे
⟨कभी⟩ ⟨एक⟩ ⟨मडिल्या?⟩ ⟨तउनके?⟩ ⟨क्लास⟩ मे फेल नही होता था।

यह पर्चा रखवा कर जवाव का ⟨पंचपन?⟩ ⟨काल?⟩ ⟨जुल्क?⟩ ⟨वाहर?⟩ ⟨नड़?⟩ ⟨रुपा?⟩ ⟨हनुमा?⟩
तो मिले ⟨को⟩ ⟨हु⟩ वताया सेटर ⟨वुरहंगया?⟩ ⟨जातथा⟩ ⟨हो⟩ ⟨न⟩ अपनी ⟨वी⟩ ⟨मारी?⟩ ⟨वताई⟩ ⟨आर⟩
⟨वहा?⟩ I DN तो ⟨मिलगा⟩ मगर डिस्टिंगशान नही।
२२12.9.2004 (पृष्ठ के अन्त में हस्ताक्षर के साथ) कठिन · difficult
⟨उसी?⟩ वर्ष २१ को आयु समाप्त थी। और तव सरकारी नोकरी ⟨उसने?⟩ वाद न मिलती थी भागवान की
कृपा से पिता जी को वड़े लोगो से मिलने का ⟨शोक?⟩ आपना रंग लाया शहर का ⟨उनके?⟩ ⟨गो?⟩ के पास ⟨हो⟩ ⟨गये⟩
तो उत्तान ⟨कानूगो?⟩ ⟨निवकको?⟩ ⟨हार?⟩ ⟨लगे?⟩ ⟨भावाड़?⟩ ⟨दे⟩ जिससे १०० नम्बर का पर्चा था आपने पास वुलाकर
कईयो व पटवारी व ⟨चोनुगगो?⟩ लोगो को डायरी ⟨पा⟩ से ⟨सरसुला?⟩ को ⟨पटने?⟩ ⟨का⟩ पाठ पढ़ा कर, सहाय दा ⟨मी⟩ ⟨की⟩
मे ⟨कमिथी?⟩ ⟨शार?⟩ मे ⟨हणगया?⟩ और २ ⟨कानू?⟩ ⟨शाइकिल?⟩ ⟨क,⟩ ⟨जागार?⟩ मे ⟨न⟩ ⟨वट⟩
[नीचे की पूरी पंक्ति काटी गयी है:] कव ⟨लाथुरा?⟩ ⟨दखाड़?⟩ देया ⟨खुभूगाथा?⟩ ⟨पुरान⟩ ⟨दर⟩ मे ⟨मेहा?⟩ ⟨लोगान?⟩ हेतु वनाई ⟨यार⟩———

वह पर रखन के लिए तालावो मे ⟨मिही?⟩ ⟨वात?⟩ ⟨न⟩ को सफाई कर खेता मे
वदलान से फल भी उपलब्ध नही। ⟨लाव?⟩ ⟨पुन⟩ ⟨आयन?⟩ ⟨भर⟩ परामर्श से
वात कर के ⟨डलव?⟩ ⟨कच्चा⟩ ⟨का⟩ गिरा कर ⟨उ⟩ ⟨चाहु?⟩ पक्का मकान को करके
वारा और गृहस्थी को सुविधा हेतु काम काजा मे जो अव यहा
⟨फिर भी⟩ ⟨क, र रव?⟩ ⟨के⟩ ⟨हालागो?⟩ होत है न है सभी लोगा आपनी २ सुविधा अनुसार वही करते है वही सव हेता है
⟨को⟩ ⟨राधा⟩ ⟨भजा⟩ ⟨को⟩ रखाव गावा मे भी विवाह आदि का भाई चारा सभी ⟨मुह?⟩ ⟨कमार?⟩
जाता है सव पैतृक ⟨यह⟩ ⟨सव⟩ ⟨फुलका?⟩ ⟨को⟩ ⟨हुई⟩ करना चाहे तो नाई कहार का ⟨रुसाय?⟩ ⟨का⟩ आपूर्ति ⟨नक⟩
आया कोई। अव ⟨हम्बर?⟩ भी शहरो से हो लाग रहवा है जव शहरो मे ठेका
देकर पैसा काम आता हो खेर मे न व ⟨चान्दफेन?⟩ जो कसर भी।
और अव भी ⟨हुमइया?⟩ के परामर्श से ⟨डलन?⟩ ⟨के⟩ ⟨जो⟩ ⟨व⟩ ⟨विनवा?⟩ ⟨आउ⟩ ⟨कहो⟩
पूरे ⟨परखेलो?⟩ ⟨व⟩ को वागात से ⟨आ⟩ ⟨दहा⟩ ⟨दे⟩ ⟨तक⟩ ⟨र⟩ ⟨पा⟩ ⟨डा⟩ रखता
जो अधा विकासित वागात ⟨प्र⟩ ⟨न⟩ ⟨जो⟩ नलकूप के सहारे
चला रहे है ⟨ऊष?⟩ मे अरहर का दाला जो सभा को दी जाता है
⟨पावन्द⟩ ⟨ह⟩ ⟨ना⟩ लागाया ⟨कक्का?⟩ ⟨ररा?⟩ ⟨रख⟩ ⟨वो⟩ ⟨का⟩ ⟨वचाना⟩
कोठे नही अरहर का दाला इस साला आपा घर मरके
लिए ⟨मोन?⟩ ⟨हुऐ⟩ ⟨कवला?⟩ ⟨गामी?⟩ ⟨मउद्देव?⟩ ⟨कालाकोऊद?⟩ ⟨वोकर?⟩
पूरा दाला का करने का प्रवन्ध कर लाया जायगा
मगर अरहर का ⟨वाला⟩ भी खरीदना पड़ेगा। अव इस जीवनी
का समापन कर रहा हूँ दोवारा पढ़ कर अगर कुछ भूला
हुई है ⟨उसे?⟩ भी लिख दूगा तथा ⟨पुनरुक्त?⟩ दोवार लिखो
को हटा दूगा।

                    अर्जुन सिंह  दिनांक 12.9.2004
२३ आंशिक · partial
                    जीवनी का दूसरा भाग

(1) मैंने कई वर्ष पहले एक वसीयत लिख कर सील लिफाफे में वन्द कर वड़े ⟨कड़खर?⟩ को
दे दिये है कि आगे कुटुम्व का ⟨मांगला?⟩ वटवारा करो/लिख वाद के समय में आगर
⟨वनलो लापता सफला?⟩ हुआ तो उतनी ⟨ग्न?⟩ कभी हो जान को हे पूरी का इस जीवनी
में अभी नहीं लिख रहा हूं वाद में कुछ संशोध न कर ⟨आसागान?⟩ विधि से गणपति
को गति अग्निदाह संस्कार व दसवा ⟨तेनहीं?⟩ से भी किनारा वात को आलग लिख कर
दे दिया है।

(2) गणपति ने एक Family Settlement 1989 ई० में
मरने के पहले एक राजिस्टर में मेरे तथा वड़े भाई की सलाह से लिख रह उसका
पालन करना होगा

(3) ⟨वनवारी?⟩ न आगर वनवारी को जानवरो को सेवा हेतु न भेजी होता तो गांव के
लोगों में कोई सेवक न मिलता। दूध ⟨देही?⟩ और देशी घी ⟨अवलख?⟩ न तथा विक्री हेतु
ला जान का म ⟨दूध?⟩ का भीतर रखना पड़ता। वनवारी वहुत जल्द को घी हो जात है आगर कोई
कुछ को ⟨मऊन?⟩ के मन न ही करता। इंजन से चलने वाली चारा मशीन में एक छूट मजदूर
उनके साथ मुट्ठी कट न ही लगा रहा था वट को थ में आपने हाथ की अंगूठा छोड़
आधी आधी काटलो तव प्लास्टिक सर्जन भी नहीं थी मगर अंगूठा वचन से
आधी उंगलियां व गदेरी और अंगूठे के सहारे पूरा काम निपटा रहे हैं
तथा ⟨वखारी?⟩ में अनाजा रख कर ले सलगाना तथा धनन्जय पत्ना को
दूध रही गेहूं व तेलहन को धो कर सुखा कर पिसान व तेल पेराने का काम
करते हैं। धनन्जय की सफाई वहुत पसन्द है और ⟨कपला?⟩ रूप से पछोर कर
काम अन्य लोगों की भांति नहीं करती है। मैंने देख वह धोने पर धूल छूट कर
पानी गंदला होता है फिर भी मशीन की चक्की व कोल्हू में पेराई में तो अन्य
लोगों का पिसान व तेल का गला आ में वचत वाला कुछ मल हो जाता है।

धनन्जय को केवल वागात व खेती का काम करने की ⟨धुन?⟩ है
पहले भी अव भी जव से ⟨मिचू?⟩ की असामयिक मृत्यु हुई शुगर आदि की
जांच और परिश्रम को स्वयं करने का काम वदल लिया है गृहवाटिका व ⟨वहुक?⟩ को
फुलवाड़ी ⟨स भा रूपुर?⟩ था और फावड़ा वकुदारी सुकुर देते है रात को उगार के जमाने की
⟨हवाल?⟩ रखन के ⟨कशूट?⟩ का आवना ⟨उठ?⟩ न में गांव में हूं रात में सत कर हुआ गार रण के
कारण प्रातः वायु सेवन जो ⟨आत्यान्तरिय?⟩ के न ही कर पाते। ⟨जावा नराई?⟩ आदि में
खेतो में मजदूर लगाते हैं ९ वजे तक ⟨डटर?⟩ रहते हैं तव ना आ जत कहा के मजदूर
तो काम ठीक न ही करते हैं। यह प्रसंग वनवारी के साथ नहीं जोड़ना था।

फिर एक वार जव चमार लोगों ने हलवाहि के समय मेरे ⟨वुवाई लाल?⟩ के समय
गोवर उठाने का संकट आया तो ⟨मिचू?⟩ न सक आदमी सपरिवार आकर
जानवरों की सेवा में व गोवर उठाने हेतु रख दो थी। रिश्तयों से भविष्य में
⟨निवारने का भजा?⟩
२४15·9·04 आंशिक · partial
                    15·9·04

जव मैं रामपुर जिले में तहसीलदारी में प्रोन्नत होकर पहली वार वहां
पूर मिलक तहसील में आया तो एक ⟨दिन?⟩ दौरे पर गांव में काम देख कर शाम
का जव डेरे पर लौट कर आ रहा था मेरे साथ पीछे से लग पेशकार ⟨वोछूट?⟩
गया। मैंने साइकिल भजसही एकाएक उतरना चाहा भड़का पगदड़ी पर
एक धान के खेत की ओर आपने ⟨पैर?⟩ रख धार कर ⟨ल?⟩ जिस पर पैर पड़ा
दाह ना गांठ का ⟨व्यान्च?⟩ गया और चोर के कारण पसीना आ ड़ के ⟨दिनो?⟩ में
आ गया। डेरा ⟨नि कर?⟩ था दो तगड़े चपरासी मुझे टांग ला गये और
एक स्थानी ⟨यव?⟩ ⟨कि नऊह?⟩ खींच कर सीधा कर पट्टी वांध दी।
दूसरे दिन वेला संचालन वाला ⟨लहड़?⟩ से क्वार्टर पर आया और सदर अस्पताल
भे गया तो डिप्टी कलक्टर साहव भी आय और सिविल सर्जन न
स्केनिंग ⟨?⟩ की तो केवल भांच फोटो नहीं थी न ⟨हुए?⟩ का ⟨उछा?⟩ ही
हुआ था मरहम पट्टी कर धीरे धीरे मालिश करने को दवा दी।

रामपुर की तहसील रामपुर रुहेला मुसलमान का आग्रजी हुकूमत में देशी
रियासतों में थी। रामपुर का चार देशी रियासतों ⟨टेहरी?⟩ गढ़वाल,
रामनगर वनारस, और चरखारी ⟨है?⟩ की एक ही मुसलमानी थी।
निकटवर्ती लोगों का कुछ पदाधिकारी तैनात करन के लिए छोटी छोटी
तहसीलें वनाई थीं वैसे जिले के वरावर ही थीं। काम में वहुं के तहसीलदार
सर्वेसर्वा होते थे। सभी विभागों के राजस्व का ⟨उगाही?⟩ व मुकद्दम
फौजदारी भी करते थे। दारोगा उनके मातहतों में रहते थे। ⟨आत्ता निर्भर ही?⟩
मजा भारत ⟨स्वतः?⟩ कह आ और न वो व न भारत में ही रहन की
स्वीकृति तत्कालीन पं० जवाहरलाल का सा विधा न वनान के पहलो
सर्वो ⟨रू?⟩ के प्रधान में आ व सरदार पटेल हो ⟨मार्गी?⟩ निस्तर वन थे।
⟨जो?⟩ ग्रेजों न सभी राजस्थान तथा अन्य रियासतों का जो मध्य प्रदेश के
जंगली इलाके में फैली थी और उनकी निगाहों में कगआरवा लो थी
देशी रियासतें वना कर आग्रज ⟨रजान्दु?⟩ रख दिया था। ⟨कहवाड़ा?⟩
फौज रखने की भी उनको अधिकार था। सव से वड़ी रियासत
आंध्र प्रदेश में ⟨है?⟩ — आजव भारत के प्रदेशों में जव वह देश में
रहने के लिए रहते हैं तु इस वड़े मुसलमान राज्य को मद्रास के सूवे
में जो आवता मिला ना ⟨ड़ना?⟩ मिलता है मिला दिया था। वाद में जव भारत हुआ
तो अंग्रेजों ने ऐसी चाल चली कि स्वतंत्रता देन के लिए जो इंग्लैण्ड की सरकार
में कानून वनाया उसी के अनुसार भारत व पाकिस्तान वना कर
देशी रियासतों को अधिकार दिया कि जो चाहे भारत में या
पाकिस्तान में शामिल हो न वो। यह मुसलमानी वड़ी रियासत
२५ आंशिक · partial
भारत के बीचोबीच अगर पाकिस्तान में चला जाता तो कैंसर ⟨मर्ज की?⟩ तरह
संकटग्रस्त होती। पटेल नेहरू की तरह न थे वह वहुत दृढ़ थे और पता पाते ही
कि दूसरे दिन वह हैदरावाद ⟨जो?⟩ राजा से पाकिस्तान में शामिल हो न की पाकिस्तान की
सरकार का स्वीकृत दे देगा। पटेल तत्कालीन पहले प्रधान सेनापति को
बुलाकर सैनिक कार्यवाही रात ही में हैदरावाद पहुँचा तो शासक को दो चक्र
पटेल के सचिव न मर्जर के रूप उपाय दस्तावेज में हस्ताक्षर भारत में ही शामिल
रहने को स्वीकृत प्रिवी पर्स (गुजारा) देने ⟨???⟩ वाद में यह
     ⟨आ प्रु पु रखा वाल?⟩ गया।

     यह प्रसंग मेरी जीवनी से सम्बद्ध नहीं है केवल रामपुर ⟨स्टेट?⟩ लाके
सर्वप्रथम स्वयं मर्ज होन कर राजी हुआ व नया जिला उत्तर प्रदेश में वनने से
मेरी तैनाती से सम्बद्ध था अतः वर्तमान पीढ़ी ⟨वहु?⟩ तुम्हारी जानकारी हेतु
अंग्रेजों की कूटनीति कि स्वतंत्र भारत के बीचों बीच में पाकिस्तान बनाकर
सशक्त न होन पाव चाल थी करे ⟨मुसलिम?⟩ रयासतें जूनागढ़, भोपाल
व सी राजस्थान में अजमेर (राजस्थान में) बीच में कसर न जाती।
     पटेल ने हैदरावाद को मिलाकर अन्य सभी रियासतों को भारत में ही
शामिल रहने को कूटनीतिक ⟨सफलता?⟩ का परिचय दिया।
     चूंकि रामपु पहले ⟨भटो?⟩ नम्बर पर स्वयं भारत में रहने वालों में
     था इसका ⟨रसा?⟩ लिख दिया।

अब मैं अपना मा चरखा ऽ गोंठ का वावत लिख रहा हूँ। यह ⟨?⟩ न हो रहा था
और तव ⟨???⟩ में लिखो प्राकृति ⟨???⟩ की।

पुरना खद्दर का कोट लाकर पहना टव में मर कर स्नान कर ⟨?⟩ ⟨?⟩ कपड़े पहन
टहलने की सलाह दी। मैं ⟨?⟩ खद्दर वालों से जिस जिले से मेरी तहसील मिली थी
⟨?⟩ सहायक कर्मचारी से खद्दर ⟨?⟩ कर ⟨मरसाह?⟩ सत्रह रुपये में मंगाकर
कोट सिलाकर पहनने लगा तो चार वर्षों पर सीधा हुआ। यह खद्दर आज भी
घर में है जो रोज ⟨???⟩ में गेहूँ न तेल हन धोकर सुखाया जाता है। वह पुस्तक मो
है उसे अपने पुस्तकालय में न रखन कर लखनऊ का अमीरुद्दौला लाइब्रेरी में
दे दूंगा।

मेरा पैर अभी भी कभी कभी भी ⟨गोंठ कट सी वोला कर?⟩ मुझे गिरा देती है
और पसीना आ जाता है मगर मैं ⟨???⟩ फिर चढ़ ⟨सशक्द करा?⟩ नार्मल हो
जाता हूँ।

वाकी जीवन व शरीर व लखनऊ के मकानों की वावत प्रकाश डालूंगा जिसके
कारण मैं चिन्ता मुक्त होकर दीर्घजीवी हूँ।
२६16.9.04 आंशिक · partial
देशी रियासतों के सम्बन्ध में कश्मीर की वावत कुछ और प्रकाश डालकर
अपनी जीवनी का दूसरा भाग पूरा करूंगा।
     कश्मीर का मामला जो अब तक चला आ रहा और वहाँ सैनिकों की गाथा जिस
के लोग आतंकवादियों द्वारा हत्या ⟨?⟩ पाकिस्तान का वर्णन कर
थोड़ा प्रकाश डाल रहा हूँ। सरदार पटेल होम मिनिस्टर थे मगर जवाहरलाल
नेहरू प्रधान मंत्री ने कश्मीर का मामला फारेन मिनिस्टर का
पार्ट फाइल यों वनाकर स्वयं लेकर उलझा दिया।
     कश्मीर पर धावा वोला तउ पाकिस्तान न हमला वोला जीता पाऊ अगर वाद में
भारतीय फौज ने तउ ⟨?⟩ खदेड़ना शुरू कर किया और पर उखड़ता न
नेहरू ने जनरल चौधरी जो उस समय कमांडर इन चीफ था कहा कि
केवल ⟨उतीन?⟩ रखो ना कि पूरा कश्मीर वापस लूंगा और
पाकिस्तान वाला कुछ भाग भी साथ न कश्मीर का पहुँचन का
रास्ता सुलभ हो न पर वताया जायगा। पटेल का अगर हम से ⟨निपले?⟩
द तो राज वर राजा यह न ⟨सालाता?⟩। नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र ⟨जीवा ताया?⟩ गया
याद रख भविष्य में युद्ध की नौवत न आव उसमें अधूरी जीत का वाद
हुआ व भी कर युद्ध वहीं को ⟨?⟩ ठहराना कर संयुक्त राष्ट्र में मामला यह सभा
कर गया किन ह सह। ना सह होकर खून खरावा जाहिर छ हुआ सका निवारण
हो जायगा को वड़ी भूल कूटनीति कर उ आवश्यक व जो संकट वह न होता
वहा प्रचंड देश अमरिका, रूस, फ्रांस, ⟨ब्रिटेन?⟩ और ⟨?⟩ चीन
सुरक्षा परिषद जो वनाई गई थी वीटो की पावर मिली और उन्हीं में से
वद वो कोई भी मामला सुलझा न ह जाता था। अब भी ⟨?⟩ हो त ⟨?⟩ रहा
दो सही।     यह प्रसंग भी जीवनी ⟨सु न है?⟩ ⟨?⟩ मगर आगली पीढ़ी को
जानकारी हेतु तुम अपने पन्ना में लिखा है इतिहास की वात लिख दी।

     अब आगे जीवन व अपन शारीरिक कष्ट का हाल आगे लिख रहा हूँ।
मैं जब सर्विस में था तो गोंडा जिला में वात व्याधि से परा में
गाहा में पहले पहल दौरा पड़ा। उपचार ⟨?⟩ रोग ⟨आयुर्वेदाचार्य?⟩ सेवक
ठा॰ विक्रम सिंह न ठीक कर किया। यह रोग जब में 1962 में रिटायर
हुआ तब तक समय समय पर होता रहा मगर भगवान की ⟨?⟩ ⟨?⟩ की
कृपा व यहां क वातावरण क कारण यह रोग चला गया। अब
कोई कष्ट नहीं होता।

     दूसरी जान लेवा ⟨?⟩ की वीमारी प्रारम्भ में नीचे हिस्से ⟨नाउरनार?⟩
प्रकाश में आया। मैं वीमार होकर गनपति के पास लखीमपुर
गया। ठा॰ श्री प्रकाश सिंह जी को ⟨रिकव?⟩ वहां को अच्छे डाक्टरों में
२७ आंशिक · partial
मेरे बुखार व तगड़ी खांसी का दवा ⟨?⟩ को काय भाव न हो मधुमेह
की प्रारम्भिक अवस्था और सम्भावीय तो ⟨०७।०?⟩ की सूरत वताकर
गंभीरता का चिन्ता वड़ा हुआ उक्त न ⟨लाहन?⟩ का जो M.D. का पहला वग
कर के रेलवे सर्विस पहुंचा तो वहां हट्टा जान क कारण सर्विस कर लिया।
उनको पहली पोस्टिंग वनारस क पूर्वात्तर रेलवे क वड़ अस्पताला में
हो गई। तार भेजा और लखनऊ दोनों प्राणी मु ⟨?⟩ ले गयं।
     वहां सर सुन्दरलाल मेडिकल कालेज सम्बद्ध हिन्दू विश्व विद्यालय
महामना मालवीय स्थापित में आ ⟨???⟩ डालर का साथल
     जांच कराई संयोग से सहाय क वंगाली ⟨???⟩ जांच का और लहान
से कहा तुमन मु के पश्चाताप नहीं मेरा M.D. ⟨?⟩ किया तुमको वहां
     M.D. कर रह या रख पार ⟨?⟩ जांच कर वड़ डा॰ ⟨?⟩ जी को दिखवाया
तउ हो न विगड़ी खांसी न जाय T.B. वताकर का मत क ⟨परशुला लारव?⟩
और साथ म कहा तुम्हार पुत्र तो अस्पताल म पा जायग और दवा क लिए
कुछ खर्च न कर ना होगा। लवाटरी म पेशाव में ना मालूम शुगर
जांच में हुई। वहा ⟨गाइड फार?⟩ डायविटिक पुस्तक, अस्पताल हा क
डाक्टर न दी उसमें मन पढ़ कर हृदयगाम कर लिया। स्वस्थ होकर घर
आने पर वहु न वागात ⟨उत्तरांचक?⟩ व दक्षिणा नई ⟨आरा पिता?⟩ ८० ⟨वाध?⟩
     का ⟨कद्दा रुपायित नाग काटूरा तात न धमगा?⟩ ⟨उपम?⟩ खवता व वागात
     की तैयारी को ⟨वा के गृहा को कवला?⟩ वाजार व कलाम का प्रवन्ध
करन हेतु समय दिया और इस समय ⟨ऊरही?⟩ वागात को आय क कारण।
पूरा पीवार जो वड़ वड़ ⟨वतान?⟩ होकर समा अपन अपन परो पर चलन ⟨?⟩ाय
क नवाल स पास ⟨???⟩ रहा लावा लिटरेचर में हुआ गिलस ⟨परास्तात?⟩ क
लाकर क ⟨वलाड़ी गी?⟩ और पहा कुछ नहीं में ⟨उतनन कला सम्वदधी?⟩
⟨वसान?⟩ अब ⟨लिखव कर?⟩ जीवनी से सम्वद्ध वात हो लिखूंगा।

प्रातः पौ फटा दन क ⟨च्चूरा?⟩ रास्ता स वायु सवन ⟨सारव?⟩ नउ सीतापुर जिला
राजामार्ग तक वाता न ⟨?⟩ भाट रख दिन भर दोनों ⟨चवाणों?⟩ का भाग दौड़
स्वरूप मेरा मधुमेह जो जीवन पर्यन्त रहन वाला ⟨रोग?⟩ है दूर गया।
     जव तुम जीवन तो आगामी क चिकित्सक सीतापुर में पिता व ⟨?⟩
मुलानी को मे रेलवे डावर रहन से पेशल न ला न जाता था रखता था लिव्रोरी
थी जांच कर रात भ और शकर का कोई आता पता पेशाव व ⟨हाड़?⟩ में न ⟨मराता⟩
या तो पा तुमन सलाह दी अब तुम सव कुछ भोजनों शकर सो ले सकते
हो मगर मै कम भी शकर रहता जाड़ में तुलसी पत्ती काली मिच और
गुरुवच का ⟨गुड़ी?⟩ को चाय मिलाकर चाय पीता हूँ और रोग का
नाश हो गया।
२८— (बीच में: 18. 9-04 चालू) कठिन · difficult
इस वीच पानी वरसना कव ⟨???⟩ हुआ मैं रिक्शे को ⟨मेहवाट?⟩ का को पान वादेल
⟨?⟩ का सउजाल में चया लिखता न जान सकना कि न जान सकना पर तु।
इतना वधा हो गई कि अव सवला गा कव्या न जान क पास ⟨लिजो सभाइ?⟩
⟨पा न?⟩ नहीं पात ⟨निगोर कावगी?⟩।

     अव आगे एक ⟨कोतम वा?⟩ गाड़ी का हाल लिखूंगा। मैं भी ⟨?⟩ हुआ
⟨इटौंजा?⟩ रेलवे क स्टेशन स ⟨लहान?⟩ का भार ⟨???⟩ रहा न कहा में
सिधौली आ रहा हूँ वहां का सह गांव का ⟨?⟩ अव हो पहुँच चावा पर
चला जाय व भला जो लाख न ऊ स काय प वह ⟨मुक्त?⟩ ल गया।
     वहां पहुंच कर ⟨रोगा?⟩ पौष्टिक चिकित्सा चला मगर ⟨हृ लवाच?⟩ मेरे
हिचकी ⟨?⟩ रहा पौष्टिकता या स्वास्थ्य आय आयुर्वेदिक अस्पताल
को आ ⟨पचिया?⟩ स का इ है रोक न हुई पूरा शरीर ⟨द्द कक्का?⟩ उछला वेठना
लाचार दूभर हुआ। मन ⟨लखान?⟩ स कह अव तो शायद जान ह हिचकी
⟨???⟩ न मे रेलवे क मुख्य मालगाड़ियां को लादी गाड़ियां को
जांच करन वाला हा ⟨म्या पंप?⟩ को फोन पर सूचना दो। वहु तुरन्त
आन का कह कर वाजार गय और ⟨पाड़ी गुड़ला?⟩ कर तव ⟨पानी?⟩ कर
रख वा दिया और हिचकी तुरन्त वन्द हो गई। सव ⟨समपट मणा?⟩ कर.
आधे घंटे वाद फिर हिचकी का हो ⟨म्या?⟩ पा ⟨?⟩ पक दवा सला ⟨गुह आ?⟩
और ⟨पंप?⟩ मिल गया। ⟨विद्रो न दो हाजो?⟩ जो के वहां ७ मील पर शाहजहांपुर
में व्यापारी था आना जाता रहा। ⟨हिटलर मोतार?⟩ मो ⟨पुवा?⟩ या मैं इंटर का लाज
क प्रति पल पे को आय और मुझे ⟨पुवा?⟩ या लिवाकर मेरा प्राण लवा
वीमारी का निवारण हुआ। इस वीच ४ वजे ⟨वाणा?⟩⟨मरर खोरा?⟩ और
आय अनार का ⟨दूस्तो?⟩ निवारक रस आ गया। ⟨???⟩
न हु के सलाह दी थी। कर दो वड़ो ⟨दा मला?⟩ लिया करो वहमे
वरावर कर रहा हो। आगे कल लिखूंगा।

                    18. 9-04 चालू

वावू वालगोविन्द श्रीवास्तव पड़ोस क गां व गण्डोली के
न एक ⟨प्यार?⟩ जो इरादतनगर में का ⟨?⟩ वड़ा ⟨पाउस?⟩ का सौदा
कानपुर में ⟨मेडिकल?⟩ कालेज व डाकर सीताराम कपूर स तवकर
एक ⟨कालाघर?⟩ टिंग हाउस ⟨?⟩ में को स्टाम्प ड्यूटी ⟨सहूर ह ढ?⟩
व नाउ उसमें ऊपर सदस्यों का नाम ⟨इसा?⟩ करा कर मुझ ⟨?⟩ भइया
गनपति और महेश्वर चारों भाइयों का शामिल किया
मूल्य जो पंद्रह हजार ⟨भा ग?⟩ और डालीगंज स्टेशन रेलवे ⟨वाड़ पड़ी?⟩ से
मिला था। भइया के पूरे रिटायर भाट ⟨स्री.⟩ P.F. और
⟨सरकांजित?⟩ ⟨?⟩ न सेवा व मंदिर ⟨रायंच?⟩ में था. लिया गया।
२९ आंशिक · partial
     गनपति व महेश्वर ने कुछ न दिया न मांग ही ⟨कोगड़ी?⟩
पहला महानगर पालिका लखनऊ को नक्शा पास करन
का अधिकार प्राप्त था और सव कर सदस्य का प्रभाव अध्यक्ष से
कालिन इंटर कालेज में पर रह था न ⟨?⟩ द्वारा पास करा या जाना
आसान था। इस वीच विकास प्राधिकरण का अधिकार लेना
और वहां क ⟨आर.रो.रे?⟩ वस द्वारा ⟨प्रहार?⟩ सड़क पांच का वनवाकर
नक्शा उस समय तक पास न करन को शर्त न पूरी करन स भी ⟨मलाहट?⟩ कर या
क्योंकि उसमें सड़क न भारी सिवर पाइप लाइन पानी का ⟨साला सजना?⟩ का
पूरी ⟨आतुम्मा नित?⟩ पान जमा नहीं नक्शा पास होगा ⟨आगड़?⟩ में पड़ा।
हार पंप कट और केवल कुछ सदस्या क पहलु पड़ उलझ में
का ध्यान गनपति व महेश्वर का रेलवे रोड पर मकान पर चारों क
नाम सव स अधिक को ⟨मता?⟩ सड़क किनारे दो आगे और
उसक पीछ एक प्लाट कहा ⟨उधारो?⟩ में का मिलाकर भविष्य में
तीनों का ⟨पू?⟩ में परिवर्तित कर सव मकान वनान का सोचा गया।
     इस वीच भाई महेश्वर का ⟨प्रमोशन?⟩ में ग्रामीण वैंक क अध्यक्ष हरदोई
को अध्यक्ष ⟨प्रतापगढ़?⟩ गय और मण्डी परिषद में सहायक अकाउण्टेंट
की नियुक्ति भी मिली। उत्तर मण्डी परिषद का ⟨चेयरमैन?⟩ ⟨?⟩ दो।
न ⟨भारा?⟩ का ये सड़क आदि मण्डी परिषद क वहत चला रहे पर वाला
पास करन सीनियर अकाउण्टेंट में ⟨मुगता?⟩ समय कमीशन का
धन का आ मिला और सीनियर न इनका ⟨कापी?⟩ धान दिया हुआ
इनका निवाह हुआ और मकान ⟨सनान?⟩ को समस्या हुई। विमल न रोड ⟨रूप?⟩
कर ९ हजार खर्च कर ⟨नाहर?⟩ विकास प्राधिकरण ⟨रास?⟩ से
प्राप्त किया तो मैंने ⟨वड़हान?⟩ का ⟨???⟩ पान जमा किया
और सामने का वड़ा ⟨मुरेना भव?⟩ छोड़ा मइया को नाम नक्शा पास
हुआ और पीछे वाला प्लाट को छोड़ दिया गया कि गनपति व
महेश्वर जव चाहें दो छोटे मकान वाला गो। गनपति न
लखीमपुर में ⟨प्रास पला?⟩ डिग्री कालेज राजा ⟨आयल?⟩ क
व न ⟨क्वारे?⟩ कालेज से सटे सीतापुर लखनऊ स कालेज का जोड़े
वाली सड़क किनारे ⟨निर्माण?⟩ कराकर किराए ⟨कम का न स?⟩
उस भवन में महेश्वर राजा साहव आ मलाकर ⟨टूर रंगा जीयन?⟩
⟨पंडुजन?⟩ का ट्रम्पररी वीच में हेतु ⟨फास्टर?⟩ केवल मकान ⟨वनाइ?⟩ पर
को हो जीवन न पर ⟨हुडवा?⟩ कर इंट रोड़ा व ⟨काड़ियां?⟩ खिड़की दरवाजे
आदि दे दिया और ⟨उठ हो न?⟩ कालेज से सटे प्लाट में घर वनाया
⟨आरता?⟩ व गनपति ह एक सहायक कहा व ⟨चन्द्र सिंह?⟩
⟨?⟩ पर व भइया क मना करने पर
३० कठिन · difficult
भी ⟨कुछ ड़ाके?⟩ नाम से सोसाइटी से ⟨मोन?⟩ वर वताना कर वेच ना आ
⟨???⟩ नोगा ⟨हा?⟩ तारी ⟨??? — पंक्ति फीकी, अपठनीय ???⟩
⟨??? — पंक्ति फीकी, अपठनीय ???⟩
वाले थ न ⟨प?⟩ न कर आपस करा कर ⟨निर्माण?⟩ कार्य चालू किया
⟨तुव?⟩ लहान ⟨जो वातो?⟩ भी थीं वह कारण कर ⟨हालत?⟩ कवि का रो न सलाह
⟨??? — पंक्ति फीकी, अपठनीय ???⟩
हुक्का ⟨रखनाना?⟩ हो हो ⟨उसो?⟩ तव ना कर छुहरा जाह
⟨जनवाका?⟩ और ⟨रुक?⟩⟨न?⟩ लहान को रोका। ⟨मन?⟩ क गणपति
को लागी हो मेरे पास न था फिर ना ⟨लि?⟩ जो से ⟨क?⟩ लाया दो न
⟨??? — पंक्ति फीकी, अपठनीय ???⟩
सुलझान को कहा। मन वह को राजी किया और प्रकाश जो
⟨नान्दा?⟩ में वकालत कर रह थे आपन सीनियर दीवानी के
वकील से मसविदा वना कर भेजा मगर मैंने इस विचार
से कि गणपति आश्वासन हो न से ⟨हारु न?⟩ ⟨कुञ्ज?⟩ मकान
न वनवायेंगा नक्शा पास करा वद को राजी कर महेश्वर की
देख रेख में विमल वाला हान की पांच की ⟨ईंट?⟩ की दीवार
और वाकी एक ईंट की दीवारें वना कर भवन ⟨निर्माण?⟩ शुरू हुआ

⟨हुआ?⟩ और तव गणपति ने इच्छा जाहिर की कि ⟨मुन्नू?⟩ जो
विजली विभाग में नौकरी पर है उनके लिए मकान वाला
का आपने आश्वासन को दरकिनार कर जन चौहान का पुत्र ⟨M.A.?⟩
में आया तो उन हो न ⟨पुह?⟩ को वेचन का इरादा किया
गणपति को उन्होंने जो दान दिया था उससे कुछ अधिक
लेकर मांग को तो वह वाजार मूल्य पर आ गय और ⟨लहान?⟩ से
कहा कुछ मांग दो तो ⟨मुन्नू?⟩ को मकान वनवा दे। ⟨आव?⟩ तो
⟨कगड़ा?⟩ लागा और लहान ने उनके लिए आ ⟨गनव?⟩ ⟨कुछ?⟩
⟨आधा?⟩ ना ⟨निर्मित?⟩ इमारत का पीछे को ओर दे कर वह की
चिन्ता स आपस में शीतरीता ⟨रूपर?⟩ वाहुड़ रखन हुई
और मैं तो सह ⟨देखान?⟩ वाला न रहा। आता म
पीछे एक इंजीनियर कहा एक मकान न वना ने को
ध्यान म कर लहान को हुरी ⟨आधी?⟩ देती मगर मकान
का नक्शा विगड़ हो गया और वीच में एक वड़ा हाल
वनाया गया।
3117.9.04 कठिन · difficult
क्यों कि पत्नी को ⟨१५?⟩ उम्र में उस वध की नवावस्था में दबाव पर देना
और अपना वादे की प्रतिज्ञा और दूसरी शादी करने वालों को पहला शादी
की सन्तान की दुर्दशा का कड़ुआ सबूत तो गांव पर ⟨सरकारी?⟩ वाकिफ तो था
तो मैंने लड़कान के जन्म पूर्व व शादी के बाद उनको माता की ममता और
⟨आ चलस्व?⟩ गांव के कारण और ⟨शिशु?⟩ सही ⟨जह?⟩ पालन व ⟨स्नेह?⟩ ⟨???⟩ पर
युवजोश वाल लड़का जिनका पिता ⟨उन्नाल पाद?⟩ की गोद में सात ⟨???⟩
इसका आप न क्या वरीयता ⟨दो ह वहा रियां?⟩ और ⟨चावता पूर्व ब का?⟩
⟨क?⟩ अवस्था में हो पुरान प्रारब्ध वश चले गये उनका जीवन ⟨संपूराना?⟩ लेकर
मैं दूसरा विवाह नहीं किया। एक कारण विधवा सन्तान रहित विधवा
होकर घर पर ही रहने को दृढ़ ⟨सोच वली?⟩ और गणपति ने यह सब ⟨सुनकर?⟩
कि शायद तुम्हारी ⟨(बहू)?⟩ मौसी के कारण विवाह न करने का आरोप
⟨विधा काट न्हात?⟩ दिया। उस जमान में ऐसा विधवा ⟨आव?⟩ पुर्नविवाह का
⟨प्रचार?⟩ स्वामी दयानन्द सरस्वती आयसमाज के चलाने वाला गुरुओं का
पढ़कर गणपति को पत्र लिखा था कि वर्तमान समय का सामाजिक
व्यवस्था जिस से आप न परीवार का जेवार के प्रति ⟨यव?⟩ हित विचार कर सको
⟨यो मान सा च लो?⟩। पिताजी तो ऐसे व्यक्ति थे कि एक ⟨कवार?⟩ लखनऊ
में क्षत्रिय सभा की मीटिंग हुई और राजस्थान के मुस्लिम बन
क्षत्रियों को शामिल ⟨बनात्र?⟩ का प्रस्ताव ⟨ह प्र?⟩ उठवा कर पास कराया।
जब उनके हाथ का परोसा व कच्चा भोजन खाने का समय आया
जवार के ठाकुरों ने सब लोग ⟨टाल?⟩ व पिताजी ने कहा कि ⟨म्रह?⟩ हाथ
उठाकर प्रस्ताव को पास होने का ⟨प्रराण?⟩ किया तो कल भोजन
विना किए न उठूंगा। इस दृढ़ निश्चय से जवार के ठाकुरों की
प्रतिक्रिया हमलोगों पर किसी ने नहीं ⟨क्या?⟩। उसी से प्रभावित हो
विधवा के पुनर्विवाह को पहल करने का सुझाव दिया था।
⟨आव?⟩ में लड़ ⟨हुना?⟩ तो लहान को पत्नी को तुम्हारे परीवार से नम्रता
की लिखूंगा। मगर उनका इसका आभास मिला कि ⟨म राजी व नहीं स⟩
वह ⟨प्रमाहता?⟩ समझकर और किनारा ⟨कशत न हो हुआ साह⟩ कि उस
गणपति महेश्वर ⟨आ यहां में⟩ ⟨आशीर्वाद?⟩ गणपति लिखा ⟨???⟩ वाले जा
में ⟨प्रीपल?⟩ थे और मकान बनाकर रहने की ⟨???⟩ ⟨भावो वे रि यो⟩
का साथ रख कर ⟨गोगुरर?⟩ कराया तब दूध ⟨घूरन?⟩ पर घर ⟨भेजन⟩ का सिलसिला
⟨जारार?⟩ रख कर दूध ⟨सद्दू रखाही⟩ गांव को भेजने का ⟨???⟩ रहतो ⟨रोकवार⟩
⟨जाहा द सोई आ उभ के कारर⟩।। लहान को पत्नी को धक्का लगा और ⟨भार हुव⟩
⟨मेवा?⟩ देइके जो अब तक ऊपरी दिखावे का है ऽ।
32 आंशिक · partial
उका जो अपनी गाय को एक नव बछिया के व्याने पर अधिक दूध वाली
को लहान के यहां से मंगाकर एक छोटी कम दूध वाली गाय बदला दी।
इस छोटी गाय से पीवार को दोनो वक्त ⟨रोटी रोट⟩ और ⟨रगुड़िया⟩ सहित दोनो पति पत्नी को
कम हुआ। खैर लहान जो नौकर रखन के ⟨कादो वेऊहा⟩ सप्लाई किया
और मिली हुइ ⟨कड़ी⟩ काम से छोटी गाय को वापस किया तो
व्यान वाली हुई। ⟨मुनी⟩ और तुम्हार वहनोई सहायक कमांडेंट P.A.C
वन कर आये तो उस गाय को ⟨मुनी⟩ न दो सिपाही ⟨सवा हु⟩ के ⟨संवर्त⟩ म
हाला कि ⟨खभा करर⟩ पहला ता गाय को अदला बदली गणपति न आधिक दूध
वाली आपने ⟨साट⟩ के यहा भेजी और कम ⟨मुनी⟩ को दिलाकर लहान के पीवार
को दूध से वंचित कर दिया। मैं ⟨आसमस्तास⟩ मे ⟨गइया⟩ से सलाह कर गाय तो ⟨मंजा⟩
दो ⟨गार⟩ गांठ बहुत उलझ गई। संयोग से गाय बछिया का जनम दिया तथा
आवा जाही जो ⟨सुतो⟩ के पास होती थी तो वह ⟨छिया⟩ को देख और ⟨गणमान⟩
⟨मुलाहिजा⟩ उठन को ⟨शाला⟩ गई। मैंने लहान को दूसरी तलाश कर लाने को
दे दिया था और वह हल लिखे।

यह सब घटना ये न कवल लहान को पत्नी पर भारी पड़ी तो
भी जीवन तव तक सामान्य ऊपरी तौर पर वना रहा। मगर ⟨उ व⟩ लहान
का नकशा गणपति को आश्वासन का ⟨समान करत⟩ गणपति के आश्वासन
को भूल कुछ भागो को मांग को वह हल हल पर ⟨दुखा⟩ लगा।

उसके बाद मकान के पूरब में वनने से आब किरायदार को वेदखली
दायर कर ने पर व्यय करने को होकर लहान को पत्ना तो मुझ से
बहुत रुष्ट है और बहुत मुझे कोसती है कि ⟨वच्घो⟩ में जोर देकर
⟨सामे⟩ द्वार में मकान वनवाकर संकट खड़ा कराया। उसने भी
मेरे ऊपर ⟨सौंप⟩ है।

यह सब व चालू हुआ और में आपने को कारण मान कर
चुप हूं। मुझे तो सिंहामऊ से रह कर जो सेवा मिल रहे है उस सेवा
का आगर दुर्घटना से ⟨मौन⟩ बटता तो लहान के साथ आ रहन ⟨वत⟩
साथ रहन का होता तो तो ⟨का हुलक⟩ ⟨सत्कारो⟩ वाली पुलिस न
आवकारी को ⟨पैदाव पला⟩ लड़का से आगर मेरे ⟨रह सुखान⟩
कि पुलिस व आवकारी विभाग वालो से विवाह न
कर वह ⟨आगी वशा⟩ होनहार ⟨हेता⟩ वलवान से ⟨सुधर उलप⟩ न होता
मुझे तो जैसा सन्तान न होन तक मेरी पत्नी मेरे बुढ़ापे
में सेवा से वंचित होन को वाता कि वह तो 35 वर्ष
को आयु में मर जायेंगी और में सेवा से वंचित रहूंगा और
मैं उन को आश्वासन देता रहो पीवार में कोई न
33 कठिन · difficult
कोई तो भाग्यवश सेवा देगा है। मीने दूसरा विवाह वाद में सन्तान होन पर
उनका लहान को 7 मास को आयु में ⟨विशा चिका⟩ मृत्य तथा मुझे सन्तान
को सेवा से वंचित होना पड़ा। मगर ऐसा न हो ता तो लहान को
पढ़ाइ प्रामरी ⟨हम⟩ में और लहान पालन ⟨मया⟩⟨गाजा⟩ हुइ तथा ⟨विटा⟩ जो
मेर साथ रहता था। 7 व वर्ष को ⟨पालहान⟩ को आपनो ⟨रसगा⟩ ⟨माऊ लाली⟩
स्नेह व पढ़ाइ मे ⟨I DM⟩ लाकर डाकटरी पढ़ान का अवसर न आता।
सरकारी नौकरी में तवादलो व पदोन्नत से शिशु ⟨पालो⟩ कम नहीं हो पाती।

अव इन सब कड़ुवी वातो को लिख ने के वाद आपनो ⟨नारय⟩ वा मु
धनन्जय को पत्नी द्वारा मिला रहे है ⟨उल्ल प्रकाशड़⟩ लाकर ⟨जावना⟩
को लिख समाप्त करूंगा। मेरा ⟨स्व. प्रालि⟩ पीवार का कोई न
कोई न सन्तान न होन पर भी ⟨मार⟩ लोगा। वृद्ध होन पर भी
उनका सेवा से वंचित सेवा पाकर ⟨भर⟩ कर ⟨भाऊन⟩ का ⟨शरणा⟩ हो
वन कर सम्भावित ⟨चे⟩ ⟨९८?⟩ वर्ष को आयु मृत्यु को वाट जोह रहाइ
इस समय ⟨अवर था⟩ पौन ⟨९८?⟩ वर्ष हो

धनन्जय को पत्नी तो सेवा को पराकाष्टा न कवला ⟨वहि छ⟩
महेश्वर के ⟨अउमान⟩ पर सत्य पाला ⟨करू आव⟩ पर कि धनन्जय
को हमन ⟨वक्तो⟩ न चार किलो मोटर के ⟨कर्त्व⟩ ⟨मडावरो⟩ का ⟨प्रवि रुप⟩
वांचतकर संयुक्त पीवार को जायदाद खेतो वागात आदि में मजदूर
सो सेवा करनो पड़ रहे है। पत्नी न ता मेर साथ ⟨बुढ़ा⟩, आर ⟨आय लागो⟩
को ⟨अवध वा आ ओ⟩ मइया को सेवा को ⟨उल⟩ आदर्श ही कहा जायगा।
उन्हो न तुम्हारो माता को सो सेवा ⟨गरा⟩ पति के स्वगवास पर को
मगर वह स्वयं सक्षम थीं और गृह वाटिका से तरकारी लाकर काटकर
चूल्ह को कड़ाही पर वना देतो था जो स्वादिष्ट होन के ⟨सा पहाना⟩
⟨कवो हतत्व⟩ को पूरा करता रही। संयोगवश मृत्यु के समय वह
लखनऊ मे ⟨हुनऊ⟩ के मकान पर रखन को ⟨उलही⟩ कर स्वगारोहरा।
कर गइ। में तो अव ⟨वहन⟩ का ⟨रखवास⟩ हो। ⟨वना⟩ किसो चिन्ता से
⟨1 वंथा⟩ से सभी कार्यो से ⟨धान⟩ ⟨रुजाप⟩ को ⟨मार खाय⟩ आराम से
जीवन काट रहा हूं और रामू के ⟨आ ओ रस⟩ धनन्जय व मुझे भी
उनका सेवा मिल रहे है।

एक बार मेरे रामू के ⟨आतरा⟩ ⟨म रहेन⟩ के समय लिखा चला कह:
में मध्य प्रदेश के इलाक में एक ऐसा ⟨मकतल हाला गुप⟩ को
कम्पनियो में सभी सुविधा ⟨रसाइ⟩ ⟨ड्रोनी⟩ चालक ⟨लाका⟩ ⟨प्रवर⟩ ⟨W⟩
है और ⟨नकट वती⟩ ⟨कवी⟩ तहसीला से पंशान लान को सुविधा से
३४ आंशिक · partial
वहां जाने की इच्छा की तो ⟨दान?⟩ ⟨रुआ?⟩⟨रंग?⟩ भाभि ⟨क?⟩ ⟨पणा?⟩ ⟨हरवादि?⟩
गांव वाले व था फिर एक सदर में यही वो ⟨रुक?⟩⟨लगा?⟩ ⟨वृ?⟩ रो ⟨क?⟩ ⟨भरी सेवा?⟩
से का सन्तुष्ट हो ⟨ग?⟩ जा रहा हूं। मैंने उनके ⟨दुख?⟩ देख कर ⟨मह?⟩ रह रहा हूं।
कितना ही सुविधाओं वाला ⟨आश्रम?⟩ न ही वह ⟨सभालो?⟩ ⟨रह?⟩
सव ता जो था ⟨निर?⟩ वाला ⟨रूगार?⟩ रख कर ⟨व नऊदा?⟩ ⟨प का?⟩ पत ना दे
⟨रहा हूं?⟩ कभी न मिलती मैं न वहां जान का इरादा छोड़ रह ⟨हुई?⟩
और उनकी सेवा से ही चिन्ता मुक्त जीवन व्यतीत कर ह।

अव लेखनी को विश्राम दे रहा हूं। आगे की जीवनी मरने तक
को तुम लिख सकते हो। अव तक सभी पोते परपोते जो पढ़ कर निकले है
को ⟨भरे का कहा?⟩ पिन के ⟨???⟩ पुत्र का रोजगार से वंचित रह मैं और
भी चिन्ता मुक्त हूं। ⟨???⟩ शायद भविष्य में
वह भी किसी तरह आपने पैरों पर खड़े हों। मैंने धनन्जय से कह
दिया है कि वह गणपति का लिख फेमिली सेटलमेण्ट के अनुसार
आपनी सेवा का पांचवां भाग। कृषि/जुताई को ⟨कृषि वर्ष?⟩ के अनुसार
पूरा हिसाव जो रखने और वचत होती है ले लिया करें। वह मइया के
चक्रपाल ⟨निष्ट?⟩ के रिटायर होन पर ब्रांच पोस्ट मास्टर वन और गइया ने
⟨कहा कि?⟩ उनको भी २०) देकर तम्वाकू व मांग जो वह सेवन करते थे
अव वंचित न हों। संयोग वश वह भोग छोड़ कर ⟨ह?⟩ गइया की मृत्यु के
ठीक २७ वें दिन जीवन लीला समाप्त की। यह संयोग ही तो है कि
उनका जन्म भी गइया के सेवा सा को दिन ह आ था और २५ ह
भी उनी हिसाव रह हुई। उन्हों न मरते समय आपने वड़े लड़के को
विधवा व पोतों को देख रख करने का भार सौंपा था।
उसका निवहन कर रहा हूं। आर्थिक सहायता देकर
पारिवारिक ⟨मंत्रीशान?⟩ में हो रे पातों का वकालत का शिक्षा भा
में आ भी कुछ प्राप्ति न हो कर उन की इच्छा को मरत क
पूरा कर रहा हूं। पुराने नौकर माताप्रसाद ⟨मुजाना?⟩ को
जो तुम्हार नाना के मकान पर १०) मासिक भोजन आदि
निजी सुविधा हो सन य पह से मइया को ⟨रएकुए?⟩ स
जमीनदारी के ⟨न?⟩ मुलाकत पहलाली गई भूमि थी ⟨उसका?⟩
वेवास्तौर पर भरखर को गहरे खो द ⟨निकालन?⟩
की सेवा भी भारे ⟨ल?⟩ का भाक साथि का थी वाद में
न कर देह व नारा म ⟨लंहा?⟩ का ⟨छगाटर?⟩ में उन का ⟨लाजी?⟩
इनको चार सेवा की और पह दारा से जीवन निवाह किया
३५17.9.2004 कठिन · difficult
उनका भी अव जव ⟨मो हिल?⟩ विवाह ⟨गइ?⟩ भव ⟨मिलत वलनपनी?⟩
⟨पुष्ठा?⟩ न का हो न पर ⟨लखा?⟩ ३०) मासिक ना ⟨वादो लगा?⟩ था और
⟨प शान हो?⟩ हजारो का पा ⟨जावद?⟩ कर ह रहे उसके पहलो ⟨रु पम ५०)⟩
तो न आव ३००) मासिक दे रहा हूं। ⟨आरो का मो गांव ह?⟩ आपनी ⟨पहा न प?⟩
⟨हो भाई वारो का तु?⟩ देकर आरे ना ⟨गोला रखा?⟩ पेंशन ⟨वा?⟩ गाड़ी ⟨रखाओ?⟩ व
होली दीवाला दो लोगों का ⟨पा तला चक्र दे का दो सोसाय क?⟩ कपड़ा
का देकर आपनी तहसीलदारी के पहले का ⟨कमाई सहाय कुरात?⟩ का ⟨सरामता?⟩
⟨कपड़ी?⟩ आयु ⟨धीन पूस?⟩ का ⟨वदोलत?⟩ का था आव सेवा कर रही हूं ⟨आरउलका?⟩
⟨वृक?⟩ आपने ⟨मरणा परान्त प्रारव्ध?⟩ का ⟨पुरख दस भोग?⟩ का आपा ⟨रुगमम?⟩
और स्वाध्याय केवल पर भावी मृत्यु का चिन्ता मुक्त गमन कि ⟨तारहह?⟩
इस सव का लेखनी का विश्राम दे रहा हूं।

                              शुभचिन्तक
                              अर्जुन सिंह
                              17.9.2004

ऊपर लेखनी का विश्राम दे नीचे लिखा
दो स्वास्थ्य सम्वन्धी घटनाएं जो मेरे ⟨सम?⟩ में ⟨सधु २ गइ?⟩ है
उनका उल्लेख कर रहा हूं।

(1) जव लहान कानपुर में M.D. के पहला साल में भर्ती हुई और
दो न गा का आ पश न डाक्टर म रहन वाला हार सजा ना म ⟨पड़ती?⟩
⟨सकपा?⟩ न M.D. करन वाला साथी के सहारा कर रह ⟨गोला तवाराभा?⟩ सह
खेला से करा या उन्हान जव वह ⟨शो?⟩ न ही का था ⟨हृदय?⟩ कर कह
इनका ता हाइड्रोसील भी हम ⟨गार?⟩ आपन नीच M.D. करन वाले
डाक्टरों को वताय इसको ⟨???⟩ यह हाइड्रोसील नहीं था एक ⟨गोलाम?⟩
फुटवाला खेला तरवगंज में फुटवाला की चोट से आ ⟨लिशयोटिंग?⟩
था वह गांठ थी जिसका ⟨उगा गया रोगा?⟩ ⟨मुरएटरावव?⟩ के समय
साथ में सिविल सर्जन का स्वास्थ्य सम्वन्धी प्रमाणपत्र ⟨लो मा या?⟩
तव ला खून ⟨कब?⟩ का ⟨भूज?⟩ सिविल सर्जन न सारी निकट देन ⟨समना?⟩
का कुछ ⟨नाकर?⟩ से वंचित हो कर निराशा मिली थी मगर गोलागंज
में पं० श्यामाविहारी मिश्र उन्नाव का जिलाधीश के पद से रिटायर आय थे
आरत वउन के कार लड़क जिस में कछ दिन ⟨१०)⟩ मासिक ट्यूशन पर
शिक्षा दो थी आ हाला पुका द मुझ उन्नाव के ⟨मुसहमा?⟩ भा जो न का
निवास जिलाधीश का निकट था इनके पास जान के लिए कोठी में
टिकन वाला देशी घी के सप्लाइ कर न वाल स ही उधार लेकर गया तो
विना किसी जांच पड़ताल या ⟨स्वरूपटो?⟩ न का प्रमाणपत्र दे दिया ⟨कसे?⟩
३६ कठिन · difficult
ठीक याद न ⟨है?⟩ किस ⟨गो लेकर?⟩ ⟨प्रगारगपन?⟩⟨कर?⟩ ⟨गेरी?⟩ निराशा ⟨क?⟩
⟨आशावदाई?⟩ ⟨मे?⟩ ⟨उन?⟩ हिन्दू लोगों ⟨मे?⟩ ⟨छपर?⟩ ⟨सहत?⟩ ⟨साउल?⟩ से ⟨न?⟩ ⟨दाव, नीच?⟩
⟨न?⟩ लोग नहीं ⟨चुन?⟩ गये।
⟨नेर?⟩ ⟨कीप्रशन?⟩⟨हेशंकर?⟩ ⟨कोसा?⟩ ⟨नोसी?⟩ ⟨निपटा?⟩। मेरा एक ⟨दांत?⟩
⟨हिल?⟩ ⟨रुपा?⟩ ⟨छेश?⟩ ⟨कान?⟩ पर ⟨लहान?⟩ को वताया कि ⟨दांत?⟩ ⟨ता गायव?⟩ ⟨है?⟩
तो ⟨उहान?⟩ ⟨कहा?⟩ वह न ⟨काली?⟩ ⟨दिया?⟩ गया होगा ⟨या?⟩ ⟨कु लगन?⟩ पर
जव ⟨घाव?⟩ भर न ⟨लगा?⟩ तो ⟨दन्त?⟩ ⟨चिकित्सा?⟩ ⟨वि?⟩ ⟨गाग?⟩ ⟨को म ल?⟩ ⟨सहित?⟩
⟨ल जा?⟩ कर ⟨दांतो?⟩ को जांच ⟨हेतु?⟩ ⟨ल?⟩ गया व ⟨छ?⟩ ⟨कातह?⟩ ⟨डाक्टर?⟩⟨लिखा?⟩
⟨सभी?⟩ ⟨दांत?⟩ ⟨पाइ?⟩ ⟨माग?⟩ ⟨सितह?⟩ ⟨कार?⟩ ⟨सभी?⟩ तव न त ⟨दोत?⟩ ⟨निकाल?⟩ ⟨दिया?⟩
में ⟨आचिकित्सा?⟩ दे न ⟨श्री?⟩ ⟨ग्रेवाला?⟩ ⟨करता?⟩ के कारण ⟨के?⟩ ⟨वाद?⟩ ⟨दांतो?⟩ ⟨कालावो?⟩
⟨हेतु?⟩ ⟨वेड?⟩ पर रहा क्योंकि अन्य स्थान पर रहन का ⟨सुविधा?⟩
⟨डाक्टर?⟩ ⟨अयोध्या?⟩ ⟨सिंह?⟩ ⟨2. ?⟩ ⟨म?⟩ ⟨प जगदीश?⟩ ⟨चाहत?⟩ ⟨ना?⟩ ⟨वह?⟩ ⟨क?⟩
⟨पति?⟩ कानपुर में नगरपालिका में ⟨सेनेटरी?⟩ ⟨इंस्पेक्टर?⟩ ⟨सह?⟩ ⟨ई?⟩ ⟨थी?⟩
⟨सभी?⟩ ⟨दांत?⟩ ⟨उखाड़?⟩ ⟨ना?⟩ ⟨गा?⟩ ⟨फारसख?⟩ ⟨लाट?⟩ मुसलमान ⟨दंत?⟩ ⟨ता?⟩ ⟨चिकित्सक?⟩⟨डाक्टर?⟩ लहू ⟨लक?⟩ पिता ⟨मुक्त?⟩ विना ⟨कुछ?⟩ ⟨लार?⟩ ⟨दांत?⟩ ⟨वनवा दिय?⟩
और ⟨ल?⟩ ⟨निया?⟩ ⟨क?⟩ ⟨साथ?⟩ ⟨व चो?⟩ ⟨सो?⟩ ⟨वन?⟩ ⟨पाही?⟩ ⟨था?⟩ ⟨संतुष्टी?⟩ मिली।

दूसरी जानलेवा वीमारी ⟨सन?⟩ २००१ में ⟨सितम्वर?⟩ मास में
वह हो ⟨ल?⟩ गई और ⟨फोन?⟩ ⟨द्वारा?⟩ सूचना पाकर वादशाहनगर के
डिवीजनल रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया। ⟨पांच?⟩ ⟨दिन?⟩ को ⟨भाग?⟩
रहन के वाद जव ⟨कुछ?⟩ ⟨होश?⟩ आया तो डाक्टरों न जो ⟨चौविसो?⟩ ⟨घण्टे?⟩ ⟨रहा न?⟩ के
रिटायर हो न के वाद देख भाल के वाद ⟨उहो?⟩ चिन्ता मुक्त किया कि
आव जीवनदान मिलेगा। यह वह रोग था जिसके कारण वावा साहव
⟨नितेन्द्र?⟩ स्वरूप ⟨सो?⟩ ⟨तिया?⟩ ⟨गांधी?⟩ से ⟨अध्यक्ष?⟩ ⟨पद?⟩ ⟨स सुच?⟩ ⟨लिया?⟩
था अपाला अस्पताल में परलोक सिधार गय थे।
यह प्राणदान ⟨हुए?⟩ ⟨मुझ?⟩ आव स्वस्थ जीवन दिला रहा है। २००१ में
⟨जुलाई?⟩ ⟨समेर?⟩ ⟨पेरो?⟩ में धीरे धीरे कमजोरी आ कर रहा न विना ⟨दूसरे?⟩
⟨क सहारे?⟩ रहला ⟨नावत?⟩ ⟨वुरा?⟩ का ⟨नावता?⟩ ⟨काड़?⟩ मगर ⟨सुन्दर?⟩ ⟨नाड़?⟩ ⟨जो?⟩
वेकार भी वाला भी न ⟨छ?⟩ ⟨वनोता?⟩ था ⟨५०)⟩ लाकर प्रातःकाल सहारा
देकर ⟨उठ?⟩ ⟨उ?⟩ के सहारे ⟨कमालपुर?⟩ ⟨तक?⟩ ⟨रहला?⟩ ⟨पण?⟩ ⟨मान?⟩ ⟨रहन?⟩
पास ⟨के?⟩ द्वार पर ⟨लाइ?⟩⟨धूप?⟩ ⟨सेवन?⟩ करन ⟨का?⟩ ⟨करती?⟩ ⟨वेवाहो?⟩
लाला प्यारेलाल ⟨मूर्ति?⟩ व पटवारी ⟨गोआखवार?⟩ देकर पढ़ न का
⟨मोका?⟩ ⟨भी?⟩ मिल गया। और सुन्दर ⟨कृत?⟩⟨हार?⟩ ⟨कलहो?⟩ ⟨करता व?⟩
⟨देहा?⟩⟨सा?⟩ ⟨नहीं?⟩ ⟨गया?⟩ ⟨उस?⟩ समय ⟨कालाकांकर?⟩ में मित्र का ⟨वड़ी?⟩ ⟨हड़?⟩ ⟨को?⟩

[नोट: यह पृष्ठ लेखक की सबसे अस्थिर लिखावट में है; बहुत से शब्द निश्चित रूप से नहीं पढ़े जा सके।]
३७17·9·2004 कठिन · difficult
मीतू के विवाह मे भारत वालो तो लागा हुआ । विमल के पापा छोड़ गया था |
गाँव तो कहे रहा ⟨???⟩ विवाह ⟨???⟩ नहीं ⟨???⟩
टहलाना कहे ⟨एक?⟩ ऊपर जीने से चढ़कर दो टांग ऊपर सहारे टहलाकर
होम्यो पैथिक दवा ले ⟨???⟩ कर गया है टहला कर ⟨?⟩ मे पहुंचा।
बिना आराम किये नीच आकर आपुनो गीता पाठ ६ बजे ⟨???⟩
पढ़ना और आठ बजे नाश्ता करला हुं |
आज शायद और कुछ नहीं ⟨सूझा?⟩ || जीवनी समाप्त किया।
                                        अर्जुन सिंह
                                        17·9·2004

                    पुनश्चः
ऊपर लिखता लिखता मेरे 4-5 बजे को बीच आये ⟨वड़?⟩ आनार
कार स्कूटी और साथ मे आ ⟨मरद?⟩ और ⟨खीरा?⟩ लाकर
⟨???⟩ को पता आ ⟨?⟩ । मेरे ⟨जार?⟩ का रिक्शा वाला ⟨???⟩ मेरे
⟨पहुंच?⟩ जबतक बरामदा मे ⟨???⟩ था । जात 2 धोती मे
पेशाब ⟨?⟩ न कला कर पर आ । ⟨???⟩ व स्नानागार जाकर
कपरा पहन घर आकर नई धोती धारित व नाश्ता किया।
यह वह ⟨???⟩ मारा ⟨कर पाय?⟩ नई जुड़ गई है । ⟨रिक्शा?⟩ वाला नहहु
⟨कारण?⟩ वश ही देरी हो जाता है । ⟨???⟩ है । यह
⟨???⟩ के ऊपर ⟨???⟩ मारे ⟨???⟩ रु ३००) ⟨मुकामी?⟩ कर
⟨???⟩ माल जा और उठ ⟨???⟩ विधि की X Ray
⟨???⟩ जान पर ⟨???⟩
4 हजार का ⟨?⟩ से देकर हुई । ⟨???⟩ म लाख ⟨???⟩
लाकर मिलाता ⟨???⟩ आपरेशन ⟨???⟩ यह समस्या हुऽ वाला
⟨???⟩ का व दिया और ⟨???⟩ जबतक मे यह करता व ⟨???⟩ बताया । राजकिशोर ⟨?⟩
⟨???⟩ बाद विवाह पहला ⟨???⟩
चला बस यह रहे रु-प ⟨???⟩
वापस ⟨???⟩ न कर पाता कैसा पहुंच आ ⟨???⟩
⟨पारन?⟩ कर ⟨पका?⟩ मजार ⟨???⟩ क्या ⟨???⟩ मे रात म
बना आय कर मे ⟨???⟩ सप्ताह द ⟨?⟩ साथ र ⟨???⟩ रहवा पा लाल
⟨???⟩ मे रोगना सप्ताह दुला ⟨???⟩ हु र मे कर रुपाय
⟨???⟩
३८⟨?⟩ कठिन · difficult
⟨???⟩ नगर ⟨???⟩ रह रहा है । ⟨???⟩ और साथ मे शौच पेशाब
⟨???⟩ करने पर धोती ⟨???⟩
है । आज जीवन ⟨???⟩ देरी ⟨???⟩ पेशाब से हो रहा
⟨???⟩
तब नाश्ता किया । ⟨???⟩
कुछ बात रहा है तो ⟨???⟩ करन के पहला
ठा० ⟨???⟩ सिंह का एक ⟨???⟩ बाबू के सह २३००)
कर बैठे पेशाब पहलो तिथि को हर ⟨?⟩ सुनता रहा जबतक
⟨???⟩
कुछ पुरानी ये ⟨?⟩ स्मरण ⟨???⟩
मे आपु ⟨?⟩ ही लिखा ।

                    ⟨???⟩

मै 1994 ई० मे ⟨पर्सनल?⟩ सीतापुर गया वहाँ ट्रेन से उतरकर हल्का ⟨?⟩
के कारण रुककर बूंदा बांदी ⟨???⟩
वहाँ ⟨???⟩ बैठ बाबू ⟨???⟩ का साथ चा पाकर ⟨???⟩
थी बात: कम से कम मै दूसरा सवारी के साथ रिक्शा पर नहीं जाता था । मगर
मजबूरी हुऽ तो रिक्शा पर बैठ व्यक्ति व व्यक्तित्व को ज्यादा कर सतर्क
बैठ ⟨???⟩ मे ⟨???⟩ एक होम्यो स्टोर
मे ⟨???⟩ दवाऽ देन को परचा लिख
कर दे दिया कि ⟨???⟩ मूल्य देकर लेकर स्टेशन जाऊंगा |
दुकान के सामने ⟨???⟩ टेलीग्राम विभाग ने ⟨???⟩ थी
उसमे पानी था । रिक्शा वाला न कहा बाबू जी तुम ⟨???⟩ पाओगे अत:
मै रिक्शा ⟨???⟩ उतरा ⟨???⟩ सहारा ले ⟨???⟩
⟨???⟩ मे पहिया ⟨?⟩ कर एक ओर ⟨?⟩ और मै दाहना ओर
लुढ़ककर गिर गया ⟨???⟩ व दुकान वालो
न हुऽ ⟨???⟩ मे ⟨???⟩ एक चोट लग गई ।
⟨???⟩ पर रख ⟨???⟩ अत: पर ⟨???⟩ शरीर सहित एक बार ⟨???⟩
⟨???⟩ कपड़ा को धोकर पहन ⟨???⟩ कपड़ा सुखाना को
फैलाया । थोड़ी देर ⟨?⟩ दद ⟨?⟩ पर स्नान ⟨?⟩ बाजार से मंगा कर
⟨???⟩ से रो आराम मिला मगर ⟨???⟩ फिर दिन ⟨???⟩
न हो उठ ता था और गर्दन ⟨?⟩ कि न मुड़ती थी | मै ⟨???⟩
३९⟨?⟩ कठिन · difficult
परेशान हो डाक्टर के पास न जाकर ⟨???⟩ गया गाम मे ⟨???⟩
के पास गया ⟨???⟩ ठीक धार पर जाने वाली सड़क का किनारे न लगे ⟨???⟩ सहारे डाल
व तखत रख स्वयं ना चारपाई पर लेट रखते ⟨???⟩ रान के पास होकर
स्वयं वो सी को ⟨?⟩ चाय बनाकर लोगो को पहिला वो चा रहा था । पास मे डाक्टर जी
अस्पताल मे ला गया था । और ⟨???⟩ पर ठीक न बैठा या ⟨???⟩
पास आकर हो कर ⟨???⟩ मे तखत पर बैठा मेरी वात सुनकर
तो चलाइ ⟨?⟩ को पहिचाना तो हाथ ⟨???⟩ न कर न कहा ⟨???⟩
ताड़ गया कि परखा ⟨?⟩ न हुऽ गर्दन को ⟨???⟩ हो ⟨?⟩ हुऽ |
तखत पर बैठे मेरी और ⟨?⟩ बार २ ⟨???⟩ कर रही गर्दन का
सोचा कि ⟨?⟩ नस टली या ⟨???⟩ और सोचा गर्दन का साथ
परखो सो ठीक कहूँ आ । मेने डेढ रु०) ⟨???⟩ वह किसी से मांगन करता
⟨???⟩ देता ⟨?⟩ धाता या । उसने ⟨???⟩ बताया कि सड़क का ⟨?⟩ पास
गंगा जी वाले पकड़ ⟨???⟩ के पत्ता मे रखने वाला का ⟨???⟩
मे दवाइ देकर कहा वाला मे मालिश ⟨?⟩ का करान हेतु व रहके पत्ता मे
⟨???⟩ सहजन का पत्ता ⟨?⟩ ऊपर रख पट्टा बांधने का
बताया । कहा ⟨???⟩ कष्ट रहता आजाना । मैने यह सब किया
और सराहा ⟨?⟩ नाम ⟨?⟩ हुआ । आ भी सो परखो के जोड़ पर दद होता है
खास कर ⟨???⟩ चलने पर ⟨???⟩
रिटायर होना था मे ⟨???⟩ मे अपने सारे ⟨???⟩ का चक्कर
⟨???⟩ पहुंचा ⟨???⟩
⟨???⟩ २०० ⟨?⟩ हजार ⟨???⟩ मरता होन का
सकता था और ⟨?⟩ मे P·र० ⟨?⟩ मे मता होन वाला का ⟨???⟩
किया जाता ⟨???⟩ भारतीय ⟨???⟩ का कसर का अस्पताल
⟨???⟩ आसपताल है । मेरी पूरी ⟨???⟩
⟨???⟩ जान को X Ray करा कर कह ⟨???⟩
मिला कर कहा कोई ⟨?⟩ फर्क नहीं । ⟨???⟩ कसरत वाता
कर ⟨???⟩ बराबर कसरत करता हूँ ⟨?⟩ है पर साल का ⟨?⟩
कर रहा हूँ ।

    एक और बात और ⟨???⟩
आज ⟨?⟩ किसी स्थान का तीर्थ या ⟨?⟩ करन नहीं गया था ।
आया समाजो चारो ⟨???⟩ ही न करा समय दस वर्ष तक हो ⟨?⟩
मे ⟨?⟩ तब खरीद उस समय का ⟨???⟩ को हो ⟨?⟩ मे
⟨पत्ना?⟩ का मृत्यु के बाद वेद शास्त्र ⟨???⟩ पाठक
1935 से ⟨?⟩ वेद ⟨?⟩ नन्द सरस्वती, तुलसीदास को ⟨?⟩ रचित पुस्तके
४० कठिन · difficult
स्वामी रामतीर्थ जी की पुस्तक पर जाने को उनकी जानकारी
तथा स्वामी शिष्यालो ⟨???⟩ के ऊपर लिखी पुस्तके ⟨?⟩ रखी है । वो को
गी पुस्तक प्रयागराज मे राजा साहब गद्दी के समय ⟨???⟩
की गीता के माध्य स्वामी शंकराचार्य और ⟨???⟩
अन्य स्वामी के और राजा तो ⟨???⟩ के प्रशासन राज्य के भाग करने
लोप हो के, अंग्रेजी की ⟨?⟩ के कारागार मे लिखा गीतारहस्य ग्रन्थ को भी
पढ़ा तथा नीति ग्रन्थो चालवृत्तो ⟨???⟩
ग्रन्थ ⟨भर्तृहरि?⟩ श्रृंगार शतक, वैराग्य शतक, और ⟨???⟩ नीति
नहीं स्वामी रामतीर्थ जी का कोई ग्रन्थ मेरे पास नहीं ⟨???⟩
स्वामी दयानन्द सरस्वती का ऋग्वेद, यजुर्वेद का ⟨???⟩
दो का काव्य का माध्य ⟨?⟩ सभी ग्रन्थ मेरे ⟨???⟩
⟨???⟩ मे आयुर्वेदिक चिकित्सा को चरक संहिता, ⟨शारंगधर?⟩ ⟨???⟩
साहित्य और भाव प्रकाश आदि पढ़ा । सभी पुस्तकालय मे
है । मगर कोई ⟨रियायत?⟩ ⟨???⟩ बाबू और राम के
⟨???⟩ न है । ⟨?⟩ बाबू ⟨???⟩ डिस्ट्रिक्ट ⟨???⟩ किया
जिसे मे न ⟨???⟩
और उनसे तो ⟨???⟩ होतो है
    एक और घटना जो मद्रास ⟨याना?⟩ जाकर सागर को ⟨???⟩
⟨???⟩ जाने का अवसर
मिला गया इस इच्छा से गया कि रामेश्वरम व विवेकानन्द ⟨???⟩
मे मूर्ति ⟨दोरे?⟩ द्वीप मे किनारे को ⟨???⟩ रखने को
लालसा को पूर्ति के लिए गया । हुआ यह ⟨???⟩ के हाट मे
⟨???⟩ अवसर मद्रास मे सभी भारतीय
⟨???⟩ जात है । ⟨???⟩
⟨???⟩ को देख रख को ⟨???⟩ शहर जाकर
पास लिया गया । ⟨???⟩ देकर ⟨???⟩
⟨सुभाव?⟩ देकर भेजा दिया । उसकी पूर्ति के लिए गया ।
⟨???⟩ आदि का ही देखन का
मौका मिला और ⟨लहान?⟩ का दो दिन बाद ⟨???⟩ बताया
⟨???⟩ वापस कर दिया
मद्रास मे ⟨???⟩
मिला गया ⟨???⟩ पड़ा । कोई तो ⟨???⟩
विवेकानन्द को ⟨याना?⟩ का मौका ही मिला । मै हटल मे ⟨साता?⟩ था
4118· 9· 2004 स्पष्ट · clear
मद्रास मे ⟨???⟩ के से चू, मवा देकर लोको ने पुर लोकर गया था वहाँ गया
और वहा न तो रेलवे व आन्ध्र होटल का भोजन पा गये मगर मे दाल चावल
रोटी सब्जी के लिए तरस रहा था । संयोग वश लोको मे विहार के एक
⟨???⟩ लोको का लक्ष्मी ⟨शापक?⟩ समाजसेवी ⟨???⟩ सड़क पर आ ⟨???⟩ रहतो
मिले और उऽ होन आपन होटल मे चावल मे भोजन कराया |
वापस लौट न ऽ आये ⟨लखनऊ?⟩ को ⟨हुरवार?⟩ आये रेलवे अस्पताल
नागपुर को फान पहुंचा तो रेलवे ⟨डाक्टर?⟩ व कम्पाउंडर आगये
दवाइयां समेत नागपुर के ⟨???⟩ रेलवे से ⟨?⟩ मेरे सन्तरे क
वागो को आनन्द ⟨???⟩ हातो आगया |
    मै वहाँ का तो ही बीमार हुआ । हिचकी भी शुरू हुऽ दवा से ठीक
हो कर आ गया।
अब आगे कोई मेरे स्मरण मे बात अब बाकी नहीं है।

                              शुभचिन्तक
                              अर्जुन सिंह
                              18· 9· 2004
भाग तीन · Part Three

मूल पृष्ठThe Original Pages

The manuscript itself, in his hand. Tap any page to open it full size. The original is held by Vikram Singh Parmar.

दादू वाणी, मूल पृष्ठ १
जन्माष्टमी 6 ९/२००4
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 2
27.9.004
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ३
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 4
48.9.04
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ५
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ६
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ७
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 8)
8)9.9.04
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 9
9
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 10
1010.9.04
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ११
११
दादू वाणी, मूल पृष्ठ १२
१२११/९/०४ (पृष्ठ के मध्य में)
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 13
13
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 14
14
दादू वाणी, मूल पृष्ठ १५
१५
दादू वाणी, मूल पृष्ठ १६
१६
दादू वाणी, मूल पृष्ठ १७
१७
दादू वाणी, मूल पृष्ठ १८
१८१२.९.०४ (पृष्ठ के मध्य में)
दादू वाणी, मूल पृष्ठ १९
१९
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २०
२०14.9.04
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २१
२१
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २२
२२12.9.2004 (पृष्ठ के अन्त में हस्ताक्षर के साथ)
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २३
२३
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २४
२४15·9·04
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २५
२५
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २६
२६16.9.04
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २७
२७
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २८
२८— (बीच में: 18. 9-04 चालू)
दादू वाणी, मूल पृष्ठ २९
२९
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ३०
३०
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 31
3117.9.04
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 32
32
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 33
33
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ३४
३४
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ३५
३५17.9.2004
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ३६
३६
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ३७
३७17·9·2004
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ३८⟨?⟩
३८⟨?⟩
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ३९⟨?⟩
३९⟨?⟩
दादू वाणी, मूल पृष्ठ ४०
४०
दादू वाणी, मूल पृष्ठ 41
4118· 9· 2004
भाग चार · Part Four

वंशावलीThe Lineage

The genealogy Dadu Baba promised twice in the letter and never wrote — kept instead by the family, and set here beside his words. 383 people across 11 generations. Living members appear by name only; dates are shown for those who have passed.

११पीढ़ियाँ · Generations
३८३व्यक्ति · People
१०४स्त्रियाँ · Women
१४९परिवार · Families
१७०चित्र · Photographs

सीधी वंश-रेखाThe direct line — eleven generations

From Ram Singh, at the head of the record, down to the present. Dadu Baba stands one step off this line: he was the younger brother of Bharat Singh.

  1. मूल
    Ram Singh
  2. Man Chitrasingh Singh
  3. Makrand Singh
  4. Rasali Singh
  5. Chandi Singh
  6. Ram Dayal Singh
  7. Guru Baksh SinghGuru Baksh Singh
    = Badi Dadi
  8. Bharat SinghBharat Singh1899 – 1991
    = Amma Singh
    दादू बाबा के बड़े भाई · Dadu Baba's elder brother — and Vikram's great-grandfather
  9. Veer Bhadra SinghVeer Bhadra Singh1923 – 1999
    = Sarla Devi
  10. Vimal Prakash SinghVimal Prakash Singhजीवित · living
    = Rita Singh
  11. १०
    Vikram Singh ParmarVikram Singh Parmar“Shishir”जीवित · living
    = Charu Singh

घरानाThe household of Guru Baksh Singh

This is the world the memoir is written from — the four brothers, and their children. Rajju, to whom the whole letter is addressed, is Ganpat Singh's son.

Guru Baksh SinghGuru Baksh Singh
Bharat SinghBharat Singh1899 – 1991
= Amma Singh
  • Dheer Bhadra SinghDheer Bhadra Singh1932 – 2007
  • Bindu Mati Singh
  • Sheel Bhadra SinghSheel Bhadra Singh
  • Indu Mati Singh
  • Veer Bhadra SinghVeer Bhadra Singh1923 – 1999
Arjun SinghArjun Singh1907 – 2005
लेखक · the author
= Dharma Singh
  • Janmajai SinghJanmajai Singh1938 – 2012
Maheshwar SinghMaheshwar Singh1910 – —
  • Rananjai Singh ParmarRananjai Singh Parmar1941 – 1999
  • Dhananjai SinghDhananjai Singh
  • Damyanti SinghDamyanti Singh
  • Shobha Singh ChauhanShobha Singh Chauhan
  • Maya SinghMaya Singh
  • Mritunjai Singh Parmarदिवंगत · deceased
Ganpat Singh
= Ranjana Singh
  • Raj Bhanu SinghRaj Bhanu Singh— – 2025
  • Vijay Bhanu SinghVijay Bhanu Singh

चित्र-संग्रहThe gallery — 170 photographs

Every photograph the family has kept on Geni, rescued before the links expired. 5 of them are group photographs: Geni files one picture under everyone tagged in it, so they are shown here once, with all the names attached. Who is actually in a frame, and where, is what the record says — no more than that. Tap a photograph to see it whole.

Dheer Bhadra Singh, Gyan Prakash Singh, Janmajai Singh, PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow, Raj Bhanu Singh, Rajeev Parmar, Sheel Bhadra Singh, Veer Bhadra Singh, Vijay Prakash Singh, Vimal Prakash Singh
Dheer Bhadra Singh, Gyan Prakash Singh, Janmajai Singh, PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow, Raj Bhanu Singh, Rajeev Parmar, Sheel Bhadra Singh, Veer Bhadra Singh, Vijay Prakash Singh, Vimal Prakash Singh
१० लोग · 10 people
A Person who is Always Smiling doesn't means that he has no problem But d Smile Shows that he has the Ability to Overcome all d Problems Always keep Smiling ............................Good Day................. · Sukhi Vivahit Jeevan Ka raaz-Khud ko Sher samjho....................................aur biwi ko shero wali mata.
Akanksha Singh, Rita Singh, Vikram Singh Parmar, Vimal Prakash Singh
Akanksha Singh, Rita Singh, Vikram Singh Parmar, Vimal Prakash Singh
४ लोग · 4 people
no repeated · Good & Excellent Pose in the Hall. All the best Dear .
Abhishek Parmar, Akshat Parmar, Amitabh Parmar, Rachna Parmar
Abhishek Parmar, Akshat Parmar, Amitabh Parmar, Rachna Parmar
४ लोग · 4 people
Abhishek Parmar, Akshat Parmar, Amarthya Singh, aditya raj Singh
Abhishek Parmar, Akshat Parmar, Amarthya Singh, aditya raj Singh
४ लोग · 4 people
Dhananjai Singh, Vijay Bhanu Singh, Vimal Prakash Singh
Dhananjai Singh, Vijay Bhanu Singh, Vimal Prakash Singh
३ लोग · 3 people
Hamara tumahra sath h Dil bilkul saf hai .
Rita Singh, Vimal Prakash Singh
Rita Singh, Vimal Prakash Singh
nice one
Roli Singh, Vikram Singh Parmar
Roli Singh, Vikram Singh Parmar
Mere Dil Me Dhadkan Teri Sunai Deti Hai, Aankhon Me Surat Teri Dikhai Deti Hai, Raah Chalte Toh Hum hai, Lekin Parchhai Teri Dikhai Deti Hai.
Akanksha Singh, Veer Bhadra Singh
Akanksha Singh, Veer Bhadra Singh
You should try to mention the year also for memories.
Abhishek Parmar, Akshat Parmar
Abhishek Parmar, Akshat Parmar
Abhishek Parmar, Akshat Parmar
Abhishek Parmar, Akshat Parmar
Abhishek Parmar, Akshat Parmar
Abhishek Parmar, Akshat Parmar
Sandeep Parmar, Vimal Prakash Singh
Sandeep Parmar, Vimal Prakash Singh
GREAT THOUGHT BY LORD MAHAVEER: Insaan ko Bolna Sikhne Me 2 Saal Lagte hai....Lekin Kya Bolna hai....Yeh Sikhne Me Puri Jindagi Nikal Jati Hai.........................
Manoj Kumar Singh Parmar, Sarita Singh
Manoj Kumar Singh Parmar, Sarita Singh
old pur coin · Hello Sir ,How are you at there?
Snigdha Singh
Snigdha Singh
Satyendra Narayan Singh
Satyendra Narayan Singh
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
Dyana mic Personality
Dheer Bhadra Singh
Dheer Bhadra Singh
Vijay Prakash Singh
Vijay Prakash Singh
yeh to teacher no no no
Ram Gopal Singh
Ram Gopal Singh
Varun Parmar
Varun Parmar
lawala
Harnam Singh
Harnam Singh
Tejaswini Kalhans
Tejaswini Kalhans
chalega
Hemant Singh
Hemant Singh
shanshah
Tejaswini Kalhans
Tejaswini Kalhans
Gyanwati Singh
Gyanwati Singh
oh know · Miss in my whole life in every steps when I will need .This is my personal loss for her death. I am not in a position to express my sentiments on the day of this event.
Manju Singh
Manju Singh
orey pranam
Dheer Bhadra Singh
Dheer Bhadra Singh
oh no · I miss you too on every steps in my life.
Sheel Bhadra Singh
Sheel Bhadra Singh
godless
Rashmi Singh
Rashmi Singh
Ritu Singh
Ritu Singh
Kiran Singh
Kiran Singh
Indian lady
Anand Prakash Singh
Anand Prakash Singh
bechara
Vinay Prakash Singh
Vinay Prakash Singh
delhi uncle
Indu Singh
Indu Singh
Mahima Singh
Mahima Singh
Garima Singh
Garima Singh
Badi Dadi
Badi Dadi
old is pure gold
Maheshwar Singh
Maheshwar Singh
Subhadra Singh
Subhadra Singh
Sandeep Parmar
Sandeep Parmar
lomady
Shubhankar Singh
Shubhankar Singh
Praveen Singh
Praveen Singh
Dushyant Singh
Dushyant Singh
Anju Singh
Anju Singh
jama nahi
Ashish Singh
Ashish Singh
no comment---comment sey parey
Dhananjai Singh
Dhananjai Singh
last
Raj Bhanu Singh
Raj Bhanu Singh
life gainer
Archana Parmar
Archana Parmar
no no no
Prakhar Parmar
Prakhar Parmar
chingum
Rajeev Parmar
Rajeev Parmar
jinda dil
Vineet Singh Parmar
Vineet Singh Parmar
Raj kumar
Mithilesh Singh
Mithilesh Singh
jai ho
Sangeeta Singh
Sangeeta Singh
no comment
Runjhun Singh
Runjhun Singh
IT
Vipin Prakash Singh
Vipin Prakash Singh
yehi hai right choice whishky
Shaurya Bhadra PARMAR
Shaurya Bhadra PARMAR
Rita Singh
Rita Singh
sorry
Damyanti Singh
Damyanti Singh
Beena Singh Chauhan
Beena Singh Chauhan
Satya Pal Singh
Satya Pal Singh
Shalini Singh
Shalini Singh
Manjari Singh
Manjari Singh
Monika Singh
Monika Singh
Namaste mausi, Babloo
Pratima Singh
Pratima Singh
Shivam Parmar
Shivam Parmar
sekhu
Rimjhim Singh
Rimjhim Singh
love
Sanjay Singh Chauhan
Sanjay Singh Chauhan
Vanshika Chauhan
Vanshika Chauhan
Devanshi Chauhan
Devanshi Chauhan
Pradeep Kumar Singh
Pradeep Kumar Singh
gd
Pradeep Kumar Singh
Pradeep Kumar Singh
namaskar sir ji
Aabhas Singh
Aabhas Singh
Anubhav Singh
Anubhav Singh
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
Aryan Singh Parmar
Aryan Singh Parmar
Vibhu Chauhan
Vibhu Chauhan
Arpita Chauhan
Arpita Chauhan
Vasu Singh
Vasu Singh
Vikram Singh Parmar
Vikram Singh Parmar
just like buffalo but gentleman
Aryan Singh Parmar
Aryan Singh Parmar
Vikram Singh Parmar
Vikram Singh Parmar
कोई परिवर्तन नहीं
Purnima Singh
Purnima Singh
Sivangi Singh
Sivangi Singh
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
Mafia Don
Virat Singh Parmar
Virat Singh Parmar
अच्छा है , बधाई
Shakuntala Parmar
Shakuntala Parmar
Vimal Prakash Singh
Vimal Prakash Singh
sir ji
Sandhya Singh
Sandhya Singh
no comment
Nidhi Singh
Nidhi Singh
all right
Gyan Prakash Singh
Gyan Prakash Singh
bhism
Shaurya Bhadra PARMAR
Shaurya Bhadra PARMAR
Alpana Parmar
Alpana Parmar
no no
Ratna Singh
Ratna Singh
Virat Singh Parmar
Virat Singh Parmar
Vinay Singh
Vinay Singh
Tejaswini Kalhans
Tejaswini Kalhans
Janmajai Singh
Janmajai Singh
purmeshwar · Death dated 05/04/2012 at AIMS,Delhi at 1.20pm
Ashutosh Parmar
Ashutosh Parmar
demandless
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
Akanksha Singh
Akanksha Singh
no
Akshy Kumar Singh
Akshy Kumar Singh
Kriti Parmar
Kriti Parmar
Dev Singh
Dev Singh
Neha Singh
Neha Singh
teak hai agey · Sum relations nvr demand Sweet conversationsas it is d confidence in d relation which makes u aware dat wen U need that person would always b wid u........Wish you all the best fr Happy birthday in advance in view of 11th Nov.2010...........yr brother'S family.....DR.P.K.SINGH
Shakti Singh Chauhan
Shakti Singh Chauhan
Bhupendra Singh
Bhupendra Singh
Prabhat Singh
Prabhat Singh
Vikramaditya Singh Parmar
Vikramaditya Singh Parmar
nice one after a long time for parmar family
Abhishek Parmar
Abhishek Parmar
Anusha Singh
Anusha Singh
Pushpa Singh
Pushpa Singh
Akshat Parmar
Akshat Parmar
bad raha hai badney do na
Aruna Singh
Aruna Singh
Roli Singh
Roli Singh
purdesy
Harnam Singh
Harnam Singh
Duniya me yaad badi khaas hoti hai, jo dur hai unke dil ke paas hoti hai, yaad karne ke liye wajah zaruri nahi, yaad to do dilo ke beech ka ehsaas hoti h. gd 9it .
MANSI PARMAR
MANSI PARMAR
Shobha Singh Chauhan
Shobha Singh Chauhan
Vikram Singh Parmar
Vikram Singh Parmar
repeated
Bharat Singh
Bharat Singh
Mahan
Guru Baksh Singh
Guru Baksh Singh
samrat
Arjun Singh
Arjun Singh
Great
Abhishek Parmar
Abhishek Parmar
Akshat Parmar
Akshat Parmar
Akshat Parmar
Akshat Parmar
VIDUSHI PARMAR
VIDUSHI PARMAR
Ratna Gopal Singh
Ratna Gopal Singh
Meenakshi Singh
Meenakshi Singh
Veer Bhadra Singh
Veer Bhadra Singh
bhism pita mah
Sarla Devi
Sarla Devi
jai ho Bharat mata ki
Seep Singh
Seep Singh
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
Rudra Gopal Singh
Rudra Gopal Singh
Rananjai Singh Parmar
Rananjai Singh Parmar
Maya Singh
Maya Singh
Meena Singh
Meena Singh
Satya Bhama Singh
Satya Bhama Singh
Beenu Singh
Beenu Singh
Avdhesh Kumar Singh
Avdhesh Kumar Singh
Mayank Parmar
Mayank Parmar
Sweta Singh
Sweta Singh
Siddhartha Singh
Siddhartha Singh
Ajay Singh
Ajay Singh
Shiva Singh
Shiva Singh
Anju Singh
Anju Singh
Lakhchhita Parmar
Lakhchhita Parmar
Angad Parmar
Angad Parmar
Ananya Singh
Ananya Singh
Rudhransh Pratap Singh
Rudhransh Pratap Singh
Devansh Pratap Singh
Devansh Pratap Singh
Vandana Singh
Vandana Singh
no no
Yashkant singh somvanshi
Yashkant singh somvanshi
fraud and wrong maintain by all
Vinay Prakash Singh
Vinay Prakash Singh
Anju Singh
Anju Singh
It is correct but true is true. Pray to Narayan Hari.....................................P.K.Singh · I miss you very much.
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
PRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
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Ravi Gopal Singh
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I am in Tashkent today- Babloo · Seria Kay mal main dum Nahi Hai Bhai,Laut Aao Bhai.
Raj Gopal Singh
Raj Gopal Singh
Rachna Parmar
Rachna Parmar
captan with so
Vaishali Singh
Vaishali Singh
jai bhawani
Amarthya Singh
Amarthya Singh
grew up
aditya raj Singh
aditya raj Singh
same grew up
Abhishek Parmar
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pita mohra-bhojan karao
Sangeeta Singh
Sangeeta Singh
VIDUSHI PARMAR
VIDUSHI PARMAR
Shivam Parmar
Shivam Parmar
Amitabh Parmar
Amitabh Parmar
bal saf
Sarita Singh
Sarita Singh
yehi hai right choice baby ha ha ha
Kamla Singh
Kamla Singh
end
Sangeeta Singh
Sangeeta Singh
—

अनुक्रमणिकाIndex of all 383 people

Sorted by generation, oldest first. Type to search by name.

  • +10Ram Singh
  • +9Man Chitrasingh SinghRam Singh
  • +8Makrand SinghMan Chitrasingh Singh
  • +7Rasali SinghMakrand Singh
  • +6Chandi SinghRasali Singh
  • +5Ram Dayal SinghChandi Singh
  • +4Badi DadiBadi Dadi
  • +4Guru Baksh SinghGuru Baksh SinghRam Dayal Singh
  • +3Amma Singh
  • +3Bharat SinghBharat SinghGuru Baksh Singh1899 – 1991
  • +3Shiv Narayan Singh
  • +2Sarla DeviSarla DeviShiv Narayan Singh1928 – 1994
  • +2Shyam Dulari Singh
  • +2Sukhendra Vijay Singh
  • +2Veer Bhadra SinghVeer Bhadra SinghBharat Singh1923 – 1999
  • +1Rita SinghRita SinghSukhendra Vijay Singh
  • +1Vimal Prakash SinghVimal Prakash SinghVeer Bhadra Singh
  • +0Vikram Singh ParmarVikram Singh ParmarVimal Prakash Singh
  • -1Virat Singh ParmarVirat Singh ParmarVikram Singh Parmar
  • ?Aabhas SinghAabhas SinghPradeep Kumar Singh
  • ?Aashtha SinghAvdhesh Kumar Singh
  • ?Abhimanyu SinghGajraj Singh
  • ?Abhishek ParmarAbhishek ParmarAmitabh Parmar
  • ?Abhishek Singh (Deepak)Rajesh Kumar Singh
  • ?Achchut SinghHem Prakash Singh
  • ?Achint SinghBhupendra Singh
  • ?Adamyavir Singh ParmarVinay Prakash Singh
  • ?Aditya SinghLalta Bakhsh Singh
  • ?Ajay Pal Singh ChauhanJ S Chauhan
  • ?Ajay Pratap SinghAbhimanyu Singh
  • ?Ajay SinghAjay Singh
  • ?Ajit SinghDev Sharan Singh
  • ?Ajraiel SinghDeena Singh
  • ?Akanksha SinghAkanksha SinghVimal Prakash Singh
  • ?Akhil Kumar Singh
  • ?Akshat ParmarAkshat ParmarAmitabh Parmar
  • ?Akshy Kumar SinghAkshy Kumar Singh
  • ?Alok SinghYash Pal Singh
  • ?Alpana ParmarAlpana ParmarVijay Prakash Singh
  • ?Amar Pal SinghRameshwar Singh
  • ?Amarthya SinghAmarthya SinghRajeev Parmar
  • ?Amber SinghShankar Singh
  • ?Ameer Pratap SinghDev Sharan Singh
  • ?Amitabh ParmarAmitabh ParmarJanmajai Singh
  • ?Anand Prakash SinghAnand Prakash SinghGyan Prakash Singh
  • ?Ananya SinghAnanya SinghSunil Singh
  • ?Angad ParmarAngad ParmarMayank Parmar
  • ?Aniket SinghAvdhesh Kumar Singh
  • ?Anju SinghAnju SinghDheer Bhadra Singh— – 2004
  • ?Anju SinghAnju Singh
  • ?Anju SinghAnju Singh
  • ?Ankit SinghSantosh Singh
  • ?Ankit Singh ChauhanAjay Pal Singh Chauhan
  • ?Ankur SinghBhupendra Singh— – 2011
  • ?Ansul SinghBhupendra Singh
  • ?Anubhav SinghAnubhav SinghPradeep Kumar Singh
  • ?Anuj Singh
  • ?Anukrati SinghAjay Singh
  • ?Anup SinghYash Pal Singh
  • ?Anusha SinghAnusha SinghManoj Kumar Singh Parmar
  • ?Archana ParmarArchana Parmar— – 2025
  • ?Archit SinghVijay Bhanu Singh
  • ?Arjun SinghArjun SinghGuru Baksh Singh1907 – 2005
  • ?Arjun SinghAmber Singh
  • ?Arpita ChauhanArpita ChauhanSanjai Singh Chauhan
  • ?Aruna SinghAruna Singh
  • ?Aryan Singh ParmarAryan Singh ParmarManoj Kumar Singh Parmar
  • ?Ashish Pratap SinghRajesh Pratap Singh
  • ?Ashish SinghAshish Singh
  • ?Ashok Kumar Singh
  • ?Ashok SinghBhim Singh
  • ?Ashutosh ParmarAshutosh ParmarRaj Bhanu Singh1979 – 2014
  • ?Avantika SinghPramod Kumar Singh
  • ?Avdhesh Kumar SinghAvdhesh Kumar Singh
  • ?Ayodhya SinghChavinath Singh
  • ?Babblu SinghMahendra Pratap Singh
  • ?Badri Singh[[[[[ Singh
  • ?Bahadur SinghBajrang Singh
  • ?Bairisal SinghMakrand Singh
  • ?Bajrang SinghShiv Deen Singh
  • ?Baldev SinghChandi Singh
  • ?Balwant SinghTriloki Singh
  • ?Batukeshwar Dutt SinghSharda Baksh Singh
  • ?Beena Singh ChauhanBeena Singh ChauhanRananjai Singh Parmar
  • ?Beenu SinghBeenu SinghJogendra Singh Chauhan
  • ?Bhagwan Baksh SinghShankar Singh
  • ?Bhagwant SinghDeena Singh
  • ?Bhagwati SinghRaghuvir Singh
  • ?Bhairav Singh\\\\\ Singh
  • ?Bheekh SinghHari Singh
  • ?Bhim SinghLalta Bakhsh Singh
  • ?Bhoop SinghDurga Baksh Singh
  • ?Bhopal SinghKailash Singh
  • ?Bhupendra SinghBhupendra SinghSatya Pal Singh
  • ?Bindu Mati SinghBharat Singh
  • ?Bitiya SinghHimanshu Singh
  • ?Brajendra SinghChakra Pal Singh
  • ?Brajesh Kumar SinghBrajendra Singh
  • ?Bramha Pratap SinghYash Pal Singh
  • ?Chakar SinghKhushaal Singh
  • ?Chakra Pal SinghLalta Bakhsh Singh
  • ?Chanda SinghJ S Chauhan
  • ?Chandi SinghDuniya Pati Singh
  • ?Chandrika Baksh SinghBhagwant Singh
  • ?Charu Singh
  • ?Chavinath SinghDurga Baksh Singh
  • ?Damyanti SinghDamyanti SinghMaheshwar Singh
  • ?Deena SinghDurga Baksh Singh
  • ?Deshraj SinghSuraj Singh
  • ?Dev Sharan SinghMuneshwar Singh
  • ?Dev SinghDev SinghPraveen Singh
  • ?Devadhra Rai Singh
  • ?Devansh Pratap SinghDevansh Pratap SinghSunil Singh
  • ?Devanshi ChauhanDevanshi ChauhanVivek Chauhan
  • ?Devendra Pratap SinghBhim Singh
  • ?Devesh Kumar SinghBatukeshwar Dutt Singh
  • ?Dhananjai SinghDhananjai SinghMaheshwar Singh
  • ?Dharma Singh
  • ?Dharmendra SinghSatya Pal Singh
  • ?Dheer Bhadra SinghDheer Bhadra SinghBharat Singh1932 – 2007
  • ?Dilip Kumar Singh
  • ?Dolly SinghS P Singh Raghav
  • ?Duniya Pati SinghChavinath Singh
  • ?Durga Baksh SinghShiv Baksh Singh
  • ?Durga SinghChakra Pal Singh
  • ?Durvijay SinghBajrang Singh
  • ?Dushyant SinghDushyant SinghPraveen Singh
  • ?Dwarika BhadoriaChandi Singh
  • ?Dwarika SinghDuniya Pati Singh
  • ?Gajraj SinghRamjiyavan Singh
  • ?Ganga Baksh Singh.... Singh
  • ?Ganpat SinghGuru Baksh Singh
  • ?Garima SinghGarima SinghHarnam Singh
  • ?Gaurav SinghYogendra Singh
  • ?Gyan Prakash SinghGyan Prakash SinghVeer Bhadra Singh1946 – 2025
  • ?Gyanwati SinghGyanwati SinghVeer Bhadra Singh1945 – 2011
  • ?Hari SinghMan Chitrasingh Singh
  • ?Harnam SinghHarnam Singh
  • ?Harsh SinghPramod Kumar Singh
  • ?Harsh SinghDevesh Kumar Singh
  • ?Harshit SinghHemant Singh
  • ?Hem Prakash Singh
  • ?Hemant SinghHemant Singh
  • ?Himanshu Singh
  • ?Himanshu Singh
  • ?Indu Mati SinghBharat Singh
  • ?Indu SinghIndu Singh
  • ?J S Chauhan— – 2019
  • ?Jaganath Singh[[[[[ Singh
  • ?Jagat Pal SinghChandrika Baksh Singh
  • ?Jagdamba SinghLalta Bakhsh Singh
  • ?Jageshwar SinghAmber Singh
  • ?Jai Prakash SinghRajveer Singh
  • ?Jalim SinghVikramaditya Singh
  • ?Janmajai SinghJanmajai SinghArjun Singh1938 – 2012
  • ?Jogendra Singh Chauhan
  • ?Juhi SinghYogendra Singh
  • ?Jwala ChauhanChandi Singh
  • ?Jyotiraditya Singh ParmarVipin Prakash Singh
  • ?Kailash SinghNarpati Singh
  • ?Kamini Singh
  • ?Kamla SinghKamla Singh
  • ?Karan SinghAditya Singh
  • ?Khushaal SinghBajrang Singh
  • ?Kiran SinghKiran Singh1955 – 2023
  • ?Kirti Prakash SinghShatrughan Singh
  • ?Koili SinghRam Prasad Singh
  • ?Krishna Gopal SinghRam Gopal Singh
  • ?Krishna Pal SinghBhopal Singh
  • ?Kriti ParmarKriti ParmarManoj Kumar Singh Parmar
  • ?Kushal Pal SinghRajendra Singh
  • ?Lakhchhita ParmarLakhchhita ParmarMayank Parmar
  • ?Lalta Bakhsh SinghShiv Dayal Singh
  • ?Layak SinghSuraj Singh
  • ?MANSI PARMARMANSI PARMARPRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
  • ?Mahabal SinghGanga Baksh Singh
  • ?Mahendra Pratap SinghJagdamba Singh
  • ?Mahesh SinghAmber Singh
  • ?Maheshwar SinghMaheshwar SinghGuru Baksh Singh1910 – —
  • ?Mahima SinghMahima SinghHarnam Singh
  • ?Manjari SinghManjari SinghMritunjai Singh Parmar
  • ?Manju SinghManju SinghVeer Bhadra Singh
  • ?Manoj Kumar Singh ParmarManoj Kumar Singh ParmarRananjai Singh Parmar
  • ?Matai SinghBahadur Singh
  • ?Matau SinghBairisal Singh
  • ?Mathura SinghRam Prasad Singh
  • ?Maya SinghMaya SinghMaheshwar Singh
  • ?Mayank ParmarMayank ParmarMritunjai Singh Parmar
  • ?Meena SinghMeena SinghRananjai Singh Parmar
  • ?Meenakshi SinghMeenakshi Singh
  • ?Meenu SinghS P Singh Raghav
  • ?Mithilesh SinghMithilesh Singh
  • ?Mohit SinghSatyendra Singh
  • ?Moni SinghHari Singh
  • ?Monika SinghMonika SinghMritunjai Singh Parmar
  • ?Moti SinghRasali Singh
  • ?Mritunjai Singh ParmarMaheshwar Singhदिवंगत · deceased
  • ?Mummum Singh
  • ?Muneshwar SinghKailash Singh
  • ?Munish Pratap SinghRajesh Pratap Singh
  • ?Narpati SinghMoni Singh
  • ?Neha SinghNeha SinghVijay Bhanu Singh
  • ?Nidhi SinghNidhi Singh
  • ?Nishi SinghJ S Chauhan
  • ?Onkar Singh
  • ?PRAMOD KUMAR SINGH LucknowPRAMOD KUMAR SINGH LucknowDheer Bhadra Singh
  • ?Pallavi SinghAjay Singh
  • ?Pooja SinghAvdhesh Kumar Singh
  • ?Poonam Singh Chauhan
  • ?Prabhat SinghPrabhat Singh
  • ?Prabhuta KalhansAshish Singh
  • ?Pradeep Kumar SinghPradeep Kumar SinghSukhendra Vijay Singh
  • ?Prakhar ParmarPrakhar ParmarSandeep Parmar
  • ?Pramod Kumar SinghSukhendra Vijay Singh
  • ?Pratima SinghPratima Singh
  • ?Praveen SinghPraveen Singh
  • ?Purnima SinghPurnima SinghHarnam Singh
  • ?Pushpa SinghPushpa Singh
  • ?Rachna ParmarRachna Parmar
  • ?Raghuvir SinghVishvashwar Singh
  • ?Raghvendra Pratap SinghJagdamba Singh
  • ?Rahul SinghAvdhesh Kumar Singh
  • ?Raj Bhanu SinghRaj Bhanu SinghGanpat Singh— – 2025
  • ?Raj Gopal SinghRaj Gopal SinghRavi Gopal Singh
  • ?Raj Kishor SinghMuneshwar Singh
  • ?Raj Narayan SinghShiv Narayan Singh
  • ?Rajeev ParmarRajeev ParmarJanmajai Singh
  • ?Rajendra Pal Singh ChauhanJ S Chauhan
  • ?Rajendra SinghJageshwar Singh
  • ?Rajesh Kumar SinghBrajendra Singh
  • ?Rajesh Pratap SinghRaj Kishor Singh
  • ?Rajveer SinghChakra Pal Singh
  • ?Ram Chandra SinghBhopal Singh
  • ?Ram Gopal SinghRam Gopal Singh
  • ?Ram Prakash SinghRajveer Singh
  • ?Ram Prasad Singh?? Singh
  • ?Rameshwar SinghJageshwar Singh
  • ?Ramjiyavan SinghVikramaditya Singh
  • ?Rananjai Singh ParmarRananjai Singh ParmarMaheshwar Singh1941 – 1999
  • ?Ranjana Singh
  • ?Rashmi SinghRashmi SinghRam Gopal Singh
  • ?Rashmi SinghJogendra Singh Chauhan
  • ?Ratna Gopal SinghRatna Gopal SinghRavi Gopal Singh
  • ?Ratna SinghRatna Singh
  • ?Ravi Gopal SinghRavi Gopal SinghRam Gopal Singh
  • ?Renu Chauhan
  • ?Rimjhim SinghRimjhim SinghVineet Singh Parmar
  • ?Rishabh Singh ChauhanRajendra Pal Singh Chauhan
  • ?Rita Singh Chauhan
  • ?Ritu SinghRitu SinghRam Gopal Singh
  • ?Ritu SinghAjay Pal Singh Chauhan
  • ?Rohit Singh
  • ?Rohit Singh RaghavS P Singh Raghav
  • ?Roli SinghRoli SinghVijay Bhanu Singh
  • ?Rudhransh Pratap SinghRudhransh Pratap SinghSunil Singh
  • ?Rudra Gopal SinghRudra Gopal SinghRavi Gopal Singh
  • ?Rudra Pratap SinghYash Pal Singh
  • ?Runjhun SinghRunjhun SinghVinay Singh
  • ?S P Singh Raghav
  • ?Sandeep ParmarSandeep ParmarSheel Bhadra Singh
  • ?Sandhya SinghSandhya SinghSheel Bhadra Singh
  • ?Sangeeta SinghSangeeta Singh
  • ?Sangeeta SinghSangeeta Singh
  • ?Sangeeta Singh Chauhan
  • ?Sanjai Singh Chauhan
  • ?Sanjay SinghKaran Singh
  • ?Sanjay Singh ChauhanSanjay Singh Chauhan
  • ?Santosh SinghKrishna Pal Singh
  • ?Sardar SinghBahadur Singh
  • ?Sarita SinghSarita Singh
  • ?Satendra Singh
  • ?Satendra SinghAmar Pal Singh
  • ?Satya Bhama SinghSatya Bhama Singh
  • ?Satya Pal SinghSatya Pal Singh
  • ?Satyendra Narayan SinghSatyendra Narayan SinghTej Narayan Singh
  • ?Satyendra SinghSatya Pal Singh1955 – 1990
  • ?Seep SinghSeep Singh
  • ?Shailendra SinghSatya Pal Singh
  • ?Shailendra Singh
  • ?Shakti Singh ChauhanShakti Singh ChauhanSanjay Singh Chauhan
  • ?Shakuntala ParmarShakuntala Parmar
  • ?Shalini SinghShalini SinghSatya Pal Singh
  • ?Shankar SinghGanga Baksh Singh
  • ?Sharda Baksh SinghShiv Mangal Singh
  • ?Shashi SinghJ S Chauhan
  • ?Shatrughan SinghGajraj Singh
  • ?Shaurya Bhadra PARMARShaurya Bhadra PARMARPRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
  • ?Sheel Bhadra SinghSheel Bhadra SinghBharat Singh
  • ?Sheenu SinghS P Singh Raghav
  • ?Sheetal Singh.... Singh
  • ?Sheetal SinghKailash Singh
  • ?Shishir Singh
  • ?Shiv Baksh SinghMan Chitrasingh Singh
  • ?Shiv Dayal SinghChandi Singh
  • ?Shiv Deen SinghMoni Singh
  • ?Shiv Dulare SinghShiv Mangal Singh
  • ?Shiv Gulam Singh\\\\\ Singh
  • ?Shiv Mangal SinghChandi Singh
  • ?Shiv Prasad SinghTriloki Singh
  • ?Shiv Raj SinghChandi Singh
  • ?Shiv Ratan SinghNarpati Singh
  • ?Shiva SinghShiva SinghAjay Singh
  • ?Shivam ParmarShivam ParmarVineet Singh Parmar
  • ?Shobha Singh ChauhanShobha Singh ChauhanMaheshwar Singh
  • ?Shresth Singh ParmarAnand Prakash Singh
  • ?Shri Prakash SinghRajveer Singh
  • ?Shubham Singh ChauhanRajendra Pal Singh Chauhan
  • ?Shubhankar SinghShubhankar SinghPrabhat Singh
  • ?Shubhendra SinghSatyendra Singh
  • ?Shubhi SinghHemant Singh
  • ?Siddhartha SinghSiddhartha SinghShailendra Singh
  • ?Siddhartha SinghShailendra Singh
  • ?Sivangi SinghSivangi SinghPrabhat Singh
  • ?Snigdha SinghSnigdha Singh
  • ?Subhadra SinghSubhadra Singh— – 2020
  • ?Subham SinghRajesh Pratap Singh
  • ?Sukhdev SinghBahadur Singh
  • ?Sumit SinghKushal Pal Singh
  • ?Sunil Singh
  • ?Suraj SinghShiv Prasad Singh
  • ?Suresh Kumar SinghBatukeshwar Dutt Singh
  • ?Surya Baksha SinghKhushaal Singh
  • ?Surya Prakash SinghShatrughan Singh
  • ?Sushila Singh
  • ?Swarajya Prakash SinghShatrughan Singh
  • ?Sweta SinghSweta SinghShailendra Singh
  • ?Tej Narayan SinghShiv Narayan Singh
  • ?Tejaswini KalhansTejaswini KalhansAshish Singh
  • ?Triloki SinghDurga Baksh Singh
  • ?Tripti Singh
  • ?Tushar SinghUmesh Kumar Singh
  • ?Umesh Kumar SinghBatukeshwar Dutt Singh
  • ?Upmanyu SinghGajraj Singh
  • ?VIDUSHI PARMARVIDUSHI PARMARPRAMOD KUMAR SINGH Lucknow
  • ?Vaishali SinghVaishali Singh
  • ?Vandana SinghVandana SinghDhananjai Singh
  • ?Vanshika ChauhanVanshika ChauhanVivek Chauhan
  • ?Varnika ParmarVarun Parmar
  • ?Vartika Singh
  • ?Varun ParmarVarun ParmarVijay Prakash Singh
  • ?Varush ParmarVarun Parmar
  • ?Vasu SinghVasu SinghVinay Singh
  • ?Veer Pal SinghRajendra Singh
  • ?Vibhu ChauhanVibhu ChauhanSanjai Singh Chauhan
  • ?Vijay Bhanu SinghVijay Bhanu SinghGanpat Singh
  • ?Vijay Pal SinghChandrika Baksh Singh
  • ?Vijay Prakash SinghVijay Prakash SinghVeer Bhadra Singh1949 – 2021
  • ?Vikramaditya SinghBheekh Singh
  • ?Vikramaditya Singh ParmarVikramaditya Singh ParmarVipin Prakash Singh
  • ?Vinay Prakash SinghVinay Prakash SinghGyan Prakash Singh
  • ?Vinay Pratap SinghAbhimanyu Singh
  • ?Vinay SinghVinay Singh
  • ?Vineet Singh ParmarVineet Singh ParmarDhananjai Singh
  • ?Vinit Singh Rathaud
  • ?Vipin Prakash SinghVipin Prakash SinghVijay Prakash Singh
  • ?Vishal SinghSantosh Singh
  • ?Vishnu Pratap SinghYash Pal Singh
  • ?Vishvashwar SinghSheetal Singh
  • ?Vivek ChauhanJogendra Singh Chauhan
  • ?Yamini SinghSatya Pal Singh
  • ?Yash Pal SinghChandrika Baksh Singh
  • ?Yash Pal Singh ChauhanJ S Chauhan
  • ?Yashkant singh somvanshiYashkant singh somvanshiAshok Kumar Singh
  • ?Yogendra Singh
  • ?Yogesh Pratap SinghRaj Kishor Singh
  • ?YogyetaAnand Prakash Singh
  • ?Yugantar SinghRohit Singh
  • ?aditi SinghDilip Kumar Singh
  • ?aditya raj Singhaditya raj SinghRajeev Parmar
  • ?gunjan(binni) SinghRaj Bhanu Singh
  • ?richa SinghJanmajai Singh
  • ?shilpi Singh RathaudSatyendra Singh